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राजस्‍थान उपचुनाव: BJP के सतीश पून‍िया की होगी अग्‍न‍िपरीक्षा तो कांग्रेस की राह भी आसान नहीं

इसका खामियाजा उप चुनाव में भुगतना पड़ सकता है.  (सांकेतिक फोटो)

इसका खामियाजा उप चुनाव में भुगतना पड़ सकता है. (सांकेतिक फोटो)

Rajasthan Assembly By-Polls: राजस्थान में 4 विधानसभा सीटों के उपचुनाव से पहले बीजेपी और कांग्रेस की अंदरूनी सियासत चरम पर. किसान सम्मेलनों और महापंचायत के बहाने कांग्रेस ने अशोक गहलोत और सचिन पायलट को एक किया तो बीजेपी के सामने अंदरूनी संघर्ष से निपटने की चुनौती.

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(हरीश मलिक)
जयपुर. राजस्थान में हुए पंचायत चुनावों में भले ही भाजपा (BJP) ने सत्तारूढ़ कांग्रेस को टक्कर दी हो, लेकिन भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया (Satish Punnia) के राजनीतिक कौशल की असली अग्निपरीक्षा चार विधानसभा क्षेत्रों के लिए होने वाले उपचुनाव में ही होगी. पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की सियासी सरगर्मियों के बीच यदि उपचुनाव में पार्टी को हार मिली तो इसका सारा ठीकरा पुनिया पर फूटेगा. उनके नेतृत्व पर सवाल उठेंगे. जीतने की स्थिति में जरूर वे विरोधियों पर भारी पड़ेंगे.

भाजपा इन उपचुनावों को बहुत गंभीरता से ले रही है. इसीलिए केंद्रीय संगठन ने उपचुनाव को खुद की निगरानी में कराने का निर्णय लिया है. पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा उपचुनाव को लेकर दो मार्च को राज्य का दौरा करेंगे और उपचुनाव जीतने के लिए नेताओं और कार्यकर्ताओं में उत्साह और एकजुटता का संचार करेंगे. नड्डा ने हाल ही में पूनियां को दिल्ली में तलब करके उपचुनाव में जीत के फार्मूले पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी. पार्टी चाहती है कि जीत के ब्लूप्रिंट पर पूरी एकजुटता के साथ अमल हो.

पूनिया के सामने कई चुनौतियां


प्रदेश अध्यक्ष पूनियां को एक ओर चारों विधानसभा क्षेत्रों में जातिगत समीकरणों को साधना होगा, दूसरी ओर ​भाजपा में चल रही सियासी उथल-पुथल पर भी अंकुश लगाना होगा. धार्मिक यात्रा की आलाकमान से शिकायत के बावजूद वसुंधरा राजे ने रविवार को जयपुर आराध्य गोविन्द देवजी और काले हनुमान मंदिर से मंदिर दर्शन यात्रा ​की सांकेतिक शुरुआत कर दी. राजे समर्थकों का तर्क है कि मंदिर दर्शन व्यक्तिगत है और इससे पार्टी लाइन पर कोई विपरीत असर नहीं आएगा. यह दीगर है कि इस मंदिर दर्शन में पार्टी के कई ​बड़े नेताओं की मौजूदगी से राजे ने अपनी ताकत का अहसास कराया. पूनियां के लिए मुश्किल यही भी है कि जहां वर्तमान में कांग्रेस में एकजुटता दिख रही है, वहीं भाजपा में खेमेबंदी और गुटबाजी धीरे- धीरे जोर पकड़ रही है. इसका खामियाजा उप चुनाव में भुगतना पड़ सकता है.

राजस्थान की राजनीति




कांग्रेस किसान सम्मेलनों और महापंचायत में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट को एक मंच पर लाने में सफल रही है. राहुल गांधी के दौरे के बाद से ही अशोक- सचिन एक मंच पर नजर आने लगे हैं. सचिन ने अपने कांग्रेस सम्मेलन में अशोक गहलोत के पोस्टर लगवाए तो रिश्तों में तल्खी कम करने के लिए गहलोत की ओर से भी प्रयास हुए. कांग्रेस के मुख्य सचेतक महेश जोशी ने सचिन पायलट समेत 19 विधायकों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर एसएलपी को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार को पत्र भेजा कि वह एसएलपी वापस लेना चाहते हैं. एसएलपी इन विधायकों के खिलाफ अयोग्यता नोटिस को लेकर दायर की गई थी.

गहलोत-पायलट की एकता पर बीजेपी हमलावर


दरअसल, कांग्रेस में सियासी संकट को चरम पर ले जाने के बावजूद सचिन पायलट अपने मंसूबों में कामयाब नहीं रहे थे. तत्कालीन प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे ने पायलट को मनाने के लिए जो भी समझौता कराया, वह अमली रूप में नजर नहीं आया. वर्तमान प्रदेश प्रभारी अजय माकन ने साफतौर पर दोनों को एकजुट रहने की ताकीद कर दी है, क्योंत्कि बहुमत के मुहाने पर बैठी सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिए भी उपचुनाव महतत्वपूर्ण हैं. ऐसे में सचिन पायलट भी फिलवक्त एकला चलो की रणनीति को तिलांजलि देकर गहलोत के साथ नजर आने लगे हैं. हालांकि, नेता प्रतिप्रक्ष गुलाब चंद कटारिया ने गहलोत- पायलट की एकजुटता को दिखावा मात्र बताया है. (डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं)
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