Rajasthan Crisis: सियासी संकट के बीच केंद्रीय मंत्री ने CM गहलोत को दी संविधान पढ़ने की सलाह
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Rajasthan Crisis: सियासी संकट के बीच केंद्रीय मंत्री ने CM गहलोत को दी संविधान पढ़ने की सलाह
अर्जुन मेघवाल ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बयान को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राजनीति में कई बार तनावपूर्ण परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं. (फाइल फोटो)

अर्जुन राम मेघवाल (Arjun Ram Meghwal) ने कहा कि राज्यपाल ने एक बार भी ऐसा नहीं कहा है कि वह सेशन नहीं बुलाएंगे. लेकिन लीगल और टेक्निकल एग्जामिन कराना उनकी ड्यूटी है

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जयपुर. केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल (Arjun Ram Meghwal) ने प्रदेश में चल रहे सियासी संकट के बीच विधानसभा सत्र बुलाने को लेकर राज्यपाल की भूमिका और अधिकारों को लेकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) को संविधान पढ़ने की सलाह दी है. मेघवाल ने खासतौर पर संविधान (Constitution) के आर्टिकल 163 का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्यपाल को स्वविवेक से निर्णय लेने का पूरा अधिकार है. केंद्रीय संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन मेघवाल ने कहा कि प्रदेश में कैबिनेट ने स्पेशल सत्र बुलाने की डिमांड राज्यपाल के सामने रखी है, लेकिन डिमांड करने के साथ ही सरकार और उनके विधायक इतना अधीर हो गए कि उन्होंने राज्यपाल (Governor) को लीगल और टेक्निकल एग्जामिन कराने का समय देना भी मुनासिब नहीं समझा.

मेघवाल ने कहा कि राज्यपाल ने एक बार भी ऐसा नहीं कहा है कि वह सेशन नहीं बुलाएंगे लेकिन लीगल और टेक्निकल एग्जामिन कराना उनकी ड्यूटी है. इस वक्त मुख्यमंत्री और उनके सलाहकारों को संविधान के आर्टिकल 163 को पढ़ना चाहिए. मुझे नहीं पता कि मुख्यमंत्री ने आर्टिकल 163 पूरा पढ़ा है या नहीं. लेकिन ऐसा करने की बजाय उन्होंने राजभवन को बड़ी चौपड़ समझ लिया है और वहां जाकर धरना दे रहे हैं, नारेबाजी कर रहे हैं.

आर्टिकल 163 बी में स्वविवेक से निर्णय का अधिकार
मेघवाल ने कहा कि मैंने प्रदेश के मंत्रियों के बयान सुने हैं जो यह कह रहे हैं कि राज्यपाल कौंसिल ऑफ मिनिस्टर्स की राय मानने के लिए बाध्य है. ऐसा कहते हुए यह सभी लोग संविधान के आर्टिकल 163 का उल्लेख कर रहे हैं. आर्टिकल 163 ए में यह बात कही गई है कि राज्यपाल महोदय कौंसिल ऑफ मिनिस्टर्स की सलाह पर काम करेंगे. लेकिन प्रदेश के मंत्रियों ने संविधान का आर्टिकल 163 बी नहीं पढ़ा जो राज्यपाल को विवेकीय शक्तियां देता है. इस आर्टिकल के अनुसार मंत्रिपरिषद राज्यपाल को बात मानने के लिए फोर्स नहीं कर सकता है. संविधान निर्मात्री सभा में भी यह बात हुई थी कि इस तरह की कोई परिस्थिति आ सकती है जब राज्यपाल को स्वविवेक से काम करने की आवश्यकता पड़े. इसी लिए राज्यपाल को विवेकीय शक्तियां दी गई है. मेघवाल ने कहा कि यह मामला न्यायालय में भी है. एक-दो दिन इंतजार करें तो अदालत का निर्णय भी आ ही जाएगा. ऐसे में अधीर होने की कोई जरूरत नहीं है.
मुख्यमंत्री के बयान को लेकर भी साधा निशाना


वहीं, अर्जुन मेघवाल ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बयान को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राजनीति में कई बार तनावपूर्ण परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं, लेकिन चाहे मुख्यमंत्री ही क्यों न हो, संविधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों को अपनी भाषा मर्यादित रखनी ही पड़ेगी. एक तरफ तो मुख्यमंत्री राज्यपाल महोदय को संविधान की शपथ याद दिला रहे हैं लेकिन शपथ तो उन्होंने भी संविधान की ली है और धमकी दे रहे हैं राज्यपाल को. उन्हें देखना होगा कि उनका आचरण संविधान के अनुसार है या नहीं. अगर ऐसा हुआ तो कानून व्यवस्था इतनी बिगड़ जाएगी की सुरक्षा के लिए सीआरपीएफ को तैनात करना पड़ेगा. भैरौंसिंह शेखावत के जमाने में राजभवन में धरना देने के मुख्यमंत्री के बयान पर पलटवार करते हुए अर्जुन मेघवाल ने कहा कि उन्होंने सिर्फ राज्यपाल को अपने विधायकों की संख्या बताई थी राजभवन में नारे नहीं लगाए थे.
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