राजस्थान हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, पहली बार IAS अधिकारियों की जिम्मेदारी तय


Updated: August 29, 2017, 5:29 PM IST
राजस्थान हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, पहली बार IAS अधिकारियों की जिम्मेदारी तय
फोटो-(ईटीवी)

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आईएएस अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की है. संभवत यह पहला मौका है जब कोर्ट ने आईएएस अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से दोषी मानते हुए उनसे वसूली के आदेश दिए हैं.

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राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आईएएस अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की है. संभवत यह पहला मौका है जब कोर्ट ने आईएएस अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से दोषी मानते हुए उनसे वसूली के आदेश दिए हैं, लेकिन यह फैसला सुनाने में अदालत को करीब 16 साल का समय लग गया और इस दौरान याचिकाकर्ता ने भी दुनिया छोड़ दी.

राजस्थान स्टेट हैंडलूम डवलपमेंट कॉरपोरेशन में जूनियर अस्सिटेंट के पद पर काम करने वाले शशिमोहन माथुर को अपनी मौत के 11 साल बाद हाईकोर्ट से न्याय मिला है. मामले में संभवतः पहली बार कोर्ट ने किसी आईएएस अधिकारी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी तय की है.

मामले में जस्टिस एसपी शर्मा ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि याचिकाकर्ता को उनकी नियुक्ति के पहले दिन से सभी परिलाभ दिए जाएं. वहीं यह पूरी राशि सेवानिवृत आईएएस अधिकारी दामोदर शर्मा और उमराव सालोदिया की पेंशन व पीडीआर अकाउंट से वसूलने के निर्देश दिए हैं.

पूरे मामले में हाईकोर्ट ने कई गंभीर टिप्पणियां की हैं. अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि इन दो आईएएस अधिकारियों ने अगर नियमों के तहत काम किया होता तो आज यह मामला अदालत में नहीं पहुंचता.

कोर्ट ने कहा कि ऐसे अधिकारियों की लापरवाही से ही अदालतों में मामले बढ़ रहे हैं इसलिए यह पूरी राशि इन्हीं अधिकारियों से वसूली जाए.

हाईकोर्ट से याचिकाकर्ता को न्याय तो मिल गया, लेकिन इसमें करीब 21 साल का समय लग गया. कड़े संघर्षों के बाद मिली इस जीत पर याचिकाकर्ता की पत्नी अलका माथुर कहती हैं कि मेरे पति की मौत 2008 में हो गई थी, लेकिन आज उन्हें सच्ची श्रृद्धांजलि मिली है. यह कहते हुए उनके आंखे भर आती हैं.

वे बताती हैं कि बिना गलती किए इतने साल तक दोषी बने रहने का दुख उनके पति के साथ पूरे परिवार ने झेला है, लेकिन आज अब न्यायपालिका ने यह दाग धो दिया.
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क्या है यह पूरा मामला
- 11 अक्टूबर 1991 को शशिमोहन माथुर की हैंडलूम डवलपमेंट कॉरपोरेशन में ज्वाइनिंग हुई.
- उसके बाद 7 दिसम्बर 1994 को उनका प्रोबेशन पीरियड बढ़ गया.
- 8 अक्टूबर 1996 को उन्होंने अपना प्रोबेशन खत्म कर लिया.
- लेकिन विभाग ने उन्हें स्थायी करने के बजाए उन पर गबन का आरोप लगाया.
- वहीं 17 अक्टूबर 1996 को उन्हें एमडी दामोदर शर्मा ने बर्खास्त कर दिया.
- उसके बाद उन्होंने तत्कालीन चैयरमेन उमराव सालोदिया को अपील की.
- लेकिन यहां उन्हें सुनवाई का मौका दिए बगैर 24 दिसम्बर 1999 को अपील को खारिज कर दिया.
- इस पर उन्होंने साल 2000 में हाईकोर्ट में रिट दायर की.
- इस दौरान 24 अगस्त 2008 को उनकी मौत हो गई.

(जयपुर से सचिन शर्मा की रिपोर्ट)

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First published: August 29, 2017, 5:28 PM IST
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