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अपने ही अधिकारों के लिए तरस रहा है राजस्थान का मानवाधिकार आयोग

मानवाधिकार का प्रतीकात्मक चित्र

मानवाधिकार का प्रतीकात्मक चित्र

राज्य मानवाधिकार आयोग के पास आज भी अस्थाई कर्मचारियों की संख्या 70 है, जो आज के 19 साल पहले थी. पीड़ितों की सुनवाई के साथ आयोग पर मानव अधिकारों की रक्षा के लिए नीति बनाने की सिफारिश करने का दायित्व भी है, लेकिन आयोग के पास जगह नहीं होने के चलते सेमिनार, वर्कशॉप नहीं हो पाती और जगह के अभाव में विभाग के पास लाइब्रेरी तक नहीं है.

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राजस्थान के जयपुर स्थित मानव अधिकारों की रक्षा करने के लिए बना राज्य मानवाधिकार आयोग अपने ही मूलभूत अधिकारों को तरस रहा है. आयोग को बने लगभग 19 साल पूरे होने को है, लेकिन इन 19 सालों में आयोग का ना अपना दफ्तर है और ना ही स्थाई कर्मचारी है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सेवा नियम तक नहीं बने.

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पहले कार्यकाल यानी मार्च 2000 में कामकाज शुरू करने वाला राज्य मानवाधिकार आयोग भले ही अलगे माह 19 साल पूरे करने जा रहा है, लेकिन आयोग के पास अपना एक भवन तक नहीं है. सचिवालय के एसएसओ भवन के कुछ कमरों में चलने वाले इस आयोग के पास ना सुनवाई करने के लिए कोर्ट रूम है और न ही फाइलों को रखने के लिए पर्याप्त जगह है. इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के बाद भी आयोग को अब तक स्थाई स्टाफ नहीं मिला.

राज्य मानवाधिकार आयोग के पास आज भी अस्थाई कर्मचारियों की संख्या 70 है, जो आज के 19 साल पहले थी. पीड़ितों की सुनवाई के साथ आयोग पर मानव अधिकारों की रक्षा के लिए नीति बनाने की सिफारिश करने का दायित्व भी है, लेकिन आयोग के पास जगह नहीं होने के चलते सेमिनार, वर्कशॉप नहीं हो पाती और जगह के अभाव में विभाग के पास लाइब्रेरी तक नहीं है.

राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष प्रकाश टांटिया के अनुसार आयोग में लंबित शिकायतों की संख्या अब तक 9 हजार के पार पहुंच चुकी है. आयोग की इन्हीं मूलभूत सुविधाओं को लेकर उन्होंने मुख्य सचिव सहित विभिन्न विभागों के मुखियाओं के साथ बैठक की है. उन्होंने बताया कि अब मुख्य सचिव ने एक सप्ताह में आयोग की सुविधाओं पर काम करने का आश्वासन दिया है.

राज्य मानवाधिकार आयोग में हर साल करीब साढ़े पांच हजार नए परिवाद दर्ज होते हैं. स्टाफ की कमी के चलते फैसला आने में ही बरसों लग जाते हैं. जून2017 में जयपुर में हाईकोर्ट परिसर से सटे वन भवन में कुछ कुमरे आवंटित हुए, लेकिन आयोग ने करीब इतनी ही जगह की और आवश्यकता बताई. आयोग वृद्ध, निशक्त और चलने-फिरने में अक्षम लोगों की परेशानी को ध्यान में रखते हुए भूतल पर जगह चाहता है. अध्यक्ष टांटिया ने बताया कि आयोग को अब तक वन विभाग में आवंटिक कमरों का कब्जा नहीं मिल पाया है.

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