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Live-In रिलेशनशिप में धोख़े से बचाने के लिए मानवाधिकार आयोग ने सरकार से कही ये 7 बातें

जब आप एक-दूसरे के साथ ईमानदार होते हैं, तो आपस में विश्वास बढ़ता है.

जब आप एक-दूसरे के साथ ईमानदार होते हैं, तो आपस में विश्वास बढ़ता है.

राज्य मानवाधिकार आयोग (Rajasthan State Human rights Commission) ने लिव इन रिलेशनशिप (Live In Relationship) को महिलाओं की गरिमा और सम्मान के खिलाफ बताते हुए इस पर सेल्फ कन्टेन्ड कानून (Self Contented Law) बनाये जाने की जरुरत बताई है.

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जयपुर. राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग (Rajasthan State Human Rights Commission) ने लिव इन रिलेशनशिप (Live-In Relationship) को महिलाओं की गरिमा और सम्मान के खिलाफ बताते हुए इस पर सेल्फ कन्टेन्ड कानून (Self Contented Law) बनाये जाने की जरुरत बताई है. आयोग ने इस संबंध में आदेश पारित करते हुये राज्य सरकार से 7 बिंदुओं पर अनुशंसा की है. राज्य के मुख्य सचिव और अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह को आदेश की प्रति भिजवाते हुए कहा गया है कि राज्य सरकार अपनी विधायकीय शक्तियों का प्रयोग करते हुए खुद कानून बना सकती है. या फिर इस संबंध में केंद्र सरकार से कानून बनाने का अनुरोध किया जा सकता है.

आम तौर पर केवल महिलाओं का नुकसान 

आयोग ने अपने आदेश में कहा है कि लिव इन रिलेशनशिप का नुकसान आम तौर पर केवल महिलाओं को ही होता है और रखैल के रूप में किसी महिला का जीवन सम्मानपूर्वक नहीं कहा जा सकता है. इतना ही नहीं इस रिश्ते से पैदा होने वाले बच्चों के भविष्य की सुरक्षा की भी व्यवस्था नहीं होती. आयोग ने पूछा कि क्यों नहीं इस रिश्ते को शादी घोषित कर दिया जाए.

आम लोग शादी के समान रिश्ते और लिव इन रिलेशनशिप में अंतर नहीं जानते, और लिव इन रिलेशनशिप में पुरुष के साथ रहने वाली महिला अपनी गलत धारणा के चलते 2005 के अधिनियम के लाभ से भी वंचित हो सकती है. 
जस्टिस प्रकाश टाटिया, अध्यक्ष, राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग


आयाेग के अनुसार कानून में इन बातों का स्पष्ट हो उल्लेख
- इस रिश्ते के पक्षकारान की क्या योग्यता होगी?
- कौन व्यक्ति ऐसे रिश्ते स्थापित करने के अयोग्य होंगे?
- कैसे ये रिश्ते आमजन की जानकारी में रहेंगे ताकि धोखा ना हो सके
- ऐसे रिश्तों के पंजीकरण की प्रक्रिया निर्धारित कर इसे अनिवार्य बनाया जाए
- ऐसे रिश्ते के खत्म होने से पूर्व काउंसलिंग का प्रावधान किया जाए
- विवादों का निस्तारण (रद्द) जिला न्यायाधीश से नीचे के स्तर पर नहीं हो
- यह रिश्ता शादी का एक प्रकार है इसे अधिनियम 2005 में घोषित किया जाए

कई तरह की भ्रांतियां पैदा हुईं

आयोग द्वारा मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत इस प्रकरण पर विचार किया जा रहा था. इस संबंध में बड़े स्तर पर आयोग को आम लोगों के सुझाव प्राप्त हुये थे. आयोग का मत है कि प्रत्येक धर्म, जाति और समाज में विश्वास, चरित्र, अधिकार, कर्तव्य, समर्पण और जिम्मेदारियां विवाह के लिए आवश्यक तत्व हैं और इन्हें समाज के कल्याण के लिए जरूरी माना गया है. आयोग के सामने एक भी मत ऐसा नहीं आया जिसमें पुरुषों द्वारा ऐसे रिश्तों की महिलाओं को बिना किसी कारण छोड़ना उचित बताया जा सके. जबकि 2005 में आए अधिनियम से कई तरह की भ्रांतियां पैदा हो रही हैं.

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तीन तलाक की तरह रिश्ते भंग करने का अधिकार

आयोग का कहना है कि इस अधिनियम से पुरुष को पूरी तरह स्वेच्छाचारी बनने और महिलाओं के प्रति अमानवीय रूप से रिश्ते भंग करने का अधिकार मिल रहा है. जिन आधार पर तीन तलाक को नागरिकों के मूल अधिकार के विरुद्ध घोषित किया गया वही अधिकार इस अधिनियम से सभी पुरुषों को अधिकार प्राप्त हो गए हैं.

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