Rajasthan Crisis: सियासी संग्राम के इस खेल में छिपे हैं गहरे राज, पढ़ें इनसाइड स्टोरी
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Rajasthan Crisis: सियासी संग्राम के इस खेल में छिपे हैं गहरे राज, पढ़ें इनसाइड स्टोरी
आंकड़ों के गणित में फिलहाल गहलोत गुट के पास 100 ही विधायक माने जा रहे हैं.

Rajasthan Crisis: राज्यपाल और गहलोत सरकार के बीच विधानसभा सत्र बुलाने को लेकर लगातार गतिरोध चला आ रहा है. विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने के पीछे गहलोत सरकार की खास रणनीति भी है.

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जयपुर. राजस्थान में राज्यपाल और गहलोत सरकार (Governor and Gehlot Government) के बीच सियासी घमासान फुटबॉल मैच की तरह चल रहा है. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत विधानसभा का इमरजेंसी सत्र बुलाना चाहते हैं, लेकिन राज्यपाल को इसका कारण नहीं बताना चाहते. वह राज्यपाल की शिकायत प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक से कर रहे हैं, लेकिन राज्यपाल को कागज पर यह लिखकर बताने को तैयार नहीं कि वे बहुमत (Majority) साबित करना चाहते हैं और इसके लिए सत्र बुलाना जरुरी है.

राज्यपाल कलराज मिश्र ने सपाट कहा कि अगर आप बहुमत साबित करना चाहते हैं तो सत्र बुलाने के प्रस्ताव में लिख दीजिए. जब चाहें सत्र बुलाइये. अगर नहीं तो फिर विधानसभा सत्र बुलाने की इमरजेंसी क्यों? नियमानुसार 21 दिन का नोटिस देकर सत्र बुलाइये. गहलोत सरकार ने मंगलवार को फिर राज्यपाल को जबाब भेजा. उसमें राज्यपाल की ओर से पूछे गये तीन सवालों के सीधे जबाब के बजाय संविधान और अधिकार की बातें की गई हैं. 31 जुलाई को ही सत्र क्यों चाहते हैं और एजेंडा क्या है, इसका सीधा जबाब नहीं दिया.

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क्या गहलोत बहुमत को लेकर आश्वस्त नहीं?
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उनके सहयोगी मंत्री लगातार मीडिया में दावा कर रहे हैं कि उनके पास 102 विधायक हैं. यानी बहुमत से भी एक अधिक. राजस्थान विधानसभा में विपक्ष के नेता गुलाबचंद कटारिया सवाल उठा रहे हैं कि अगर बहुमत होता तो राज्यपाल से सवाल जबाब करने की बजाय सरकार सीधे प्रस्ताव भेजती कि उसे बहुमत साबित करने के लिए सत्र बुलाना है. राज्यपाल इनकार कर ही नहीं सकते. सीधे अनुमति मिलती. एक दिन में ही बहुमत साबित कर सरकार सुरक्षित हो जाती और बाड़ेबंदी की जरूरत नहीं रहती. कटारिया कह रहे हैं कि गहलोत बहुमत को लेकर आश्वस्त नहीं हैं. इसलिए बहुमत परीक्षण के बजाय विधानसभा सत्र बुलाकर 19 बागी कांग्रेस विधायकों की सदस्यता खारिज करने के रास्ते खोज रहे हैं.

थोड़ी से गड़बड़ी से गिर सकती है सरकार
राजस्व मंत्री हरीश चौधरी कहते हैं कि बहुमत को लेकर तो खुद राज्यपाल ही संतुष्ट हैं. ऐसे में बहुमत परीक्षण की जरूरत कहां है. वे कहते हैं कि राज्यपाल को यह अधिकार ही नहीं है पूछने का कि ऐजेंडा क्या है? जानकारों का कहना है कि अगर प्रस्ताव में बहुमत परीक्षण का जिक्र हो तो सरकार को सीधे फ्लोर टेस्ट पर जाना होगा. ऐसे में पायलट समेत 22 विधायकों के साथ अगर दो विधायकों ने भी क्रॉस वोटिंग कर दी या सहयोगी दल बीटीपी या सीपीएम के विधायक अनुपस्थित रहे तो सरकार के गिरने का खतरा है.

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गहलोत गुट के पास 100 ही विधायक माने जा रहे हैं
आंकड़ों के गणित में फिलहाल गहलोत गुट के पास 100 ही विधायक माने जा रहे हैं. एक विधायक समाज कल्याण मंत्री मास्टर भंवरलाल इतने बीमार हैं कि मतदान नहीं कर सकते हैं. विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी तब ही मतदान कर सकते हैं, जब पक्ष और विपक्ष के मतों की संख्या समान हो. यानी जोशी गहलोत सरकार को टाई होने पर ही बचा सकते हैं. ऐसे में गहलोत शक्ति परीक्षण के बजाय कुछ बिल पर चर्चा के बहाने सत्र बुलाकर व्हिप जारी करवा सकते हैं.

व्हिप की आड़ में यह हो सकता है
व्हिप जारी होने पर पायलट समेत 19 विधायकों को विधानसभा-सत्र में आना होगा, लेकिन ऐसा मुमकिन लग नहीं रहा है. तब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पास व्हिप के उल्लंघन का नोटिस जारी करवाकर पायलट समेत 19 विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्रवाई स्पीकर से करवाने का मौका रहेगा. अगर ऐसा होता है तो सीधे 19 विधायक 200 सदस्यों वाली विधानसभा में कम हो जाएंगे. तब गहलोत को बहुमत साबित करने के लिए 101 मतों की जरुरत नहीं होगी. महज 91 मतों की जरुरत होगी बहुमत साबित करने के लिए. लेकिन, इस रास्ते में राज्यपाल आड़े आ रहे हैं. इस खेल को बीजेपी भी समझ रही है और राज्यपाल भी.
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