Side Effects of Corona: प्रदेश की 14 हजार सहकारी संस्थाओं के चुनाव फिर अधर में
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Side Effects of Corona: प्रदेश की 14 हजार सहकारी संस्थाओं के चुनाव फिर अधर में
प्रदेश में चुनाव से संबंधित पंजीकृत सहकारी समितियों की संख्या करीब 25 हजार है.

प्रदेश में सहकारी संस्थाओं (Co-operative institutions) के चुनाव बार-बार अवरोधों की भेंट चढ़ रहे हैं. पहले पंचायतीराज चुनाव और अब कोरोना (COVID-19) संक्रमण के चलते सहकारी चुनाव एक फिर टल गए हैं. ये अब कब सम्पन्न होंगे कुछ कहा नहीं जा सकता.

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जयपुर. प्रदेश में सहकारी संस्थाओं (Co-operative institutions) के चुनाव बार-बार अवरोधों की भेंट चढ़ रहे हैं. सीएम अशोक गहलोत (CM Ashok Gehlot) ने पिछले दिनों सहकारी समितियों के चुनाव समयबद्ध रूप से करवाने का संकल्प जाहिर किया था. इसे देखते हुए राज्य सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण ने चुनाव प्रक्रिया की शुरुआत भी कर दी थी. लेकिन पहले पंचायतीराज चुनाव और अब कोरोना (COVID-19) संक्रमण के चलते सहकारी चुनाव एक फिर टल गए हैं. प्रदेश में करीब 14 हजार सहकारी समितियों के चुनाव लम्बित है. ये अब कब सम्पन्न होंगे कुछ कहा नहीं जा सकता.

दूसरे और तीसरे चरण पर संकट
प्रदेश में चुनाव से संबंधित पंजीकृत सहकारी समितियों की संख्या करीब 25 हजार है. इनमें से करीब 18 हजार समितियों के चुनाव तीन चरण में सम्पन्न करवाये जाने थे. पहले चरण की अधिकांश समितियों के चुनाव सम्पन्न भी करवाये जा चुके हैं. लेकिन फरवरी में होने वाले दूसरे चरण का अभी तक नंबर नहीं आया है. पहले पंचायतीराज चुनाव के चलते ये चुनाव टाल दिए गए और अब कोरोना संक्रमण के चलते इन पर संकट आ गया. दूसरे चरण में करीब साढ़े 6 हजार ग्राम सेवा सहकारी समितियों के चुनाव होने थे. मई माह में तीसरे चरण के चुनाव सम्पन्न करवाया जाना प्रस्तावित है लेकिन इनका टलना पूरी तरह तय है.

कैसे कायम होगा लोकतंत्र ?
सीएम की मंशा थी कि इन सहकारी समितियों के चुनाव समय पर करवाये जाएं ताकि इनमें लोकतंत्र की फिर से बहाली हो सके. प्रदेश की ज्यादातर ग्राम सेवा सहकारी समितियों में चुनाव नहीं हो पाने के चलते अभी तक पुराने बोर्ड ने ही व्यवस्था संभाली हुई है. वहीं ज्यादातर शीर्ष संस्थाओं में चुने हुए बोर्ड की जगह प्रशासक जिम्मा संभाल रहे हैं. प्रदेश में सहकारी संस्थाओं का त्रिस्तरीय ढांचा है. जब तक प्राथमिक स्तर की समितियों के चुनाव नहीं हो जाते हैं तब तक दूसरे और तीसरे स्तर की संस्थाओं में भी लोकतंत्र की बहाली नहीं हो पाएगी. गौरतलब है कि कई सहकारी समितियों के चुनाव तो बरसों से लंबित हैं.



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