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नाथद्वारा के श्रीनाथजीः मुगल बादशाह औरंगजेब भी तुड़वा नहीं पाया था मूर्ति, भगवान की कृपा से लौटी आंखों की रोशनी

नाथद्वारा के ऐतिहासिक श्रीनाथजी मंदिर की ख्याति देश-विदेश में है.

नाथद्वारा के ऐतिहासिक श्रीनाथजी मंदिर की ख्याति देश-विदेश में है.

राजस्थान अपने राजघरानों, किलों और विरासत को सहेजने के लिए तो मशहूर है ही, यहां कई मंदिर भी हैं जिनकी ख्याति भगवान के घर के रूप में है. इन्हीं में से एक है नाथद्वारा के भगवान श्रीनाथजी का मंदिर. इस मंदिर से के ऐतिहासिक और पौराणिक आख्यान पर आइए डालते हैं एक नजर.

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हरीश मलिक

जयपुर. राजस्थान किलों और विरासत के रूप में तो प्रख्यात है ही, यह कई धार्मिक संप्रदायों और उनके श्रद्धेय व पवित्र तीर्थ स्थलों का घर भी है. अरावली की गोद में बनास नदी के किनारे नाथद्वारा में ऐसा ही एक तीर्थ स्थल है. इस प्रमुख वैष्णव तीर्थस्थल पर श्रीनाथजी मंदिर में भगवान कृष्ण सात वर्षीय 'शिशु' अवतार के रूप में विराजित हैं. औरंगजेब भी मथुरा जिले में बाल रूप श्रीनाथजी की मूर्ति को तुड़वा नहीं पाया था. तब मेवाड़ के राणा द्वारा चुनौती स्वीकारने के बाद यहां गोवर्धनधारी श्रीनाथजी की मूर्ति स्थापित हुई और मंदिर बना.

नाथद्वारा में स्थापित भगवान श्रीनाथजी के विग्रह को मूलरूप से भगवान कृष्ण का ही स्वरूप माना जाता है. राजसमंद जिले में स्थित नाथद्वारा के आसपास का क्षेत्र प्राकृतिक रूप से बहुत समृद्ध है. यह शहर अरावली पर्वतमाला के पास में स्थित है और बनास नदी के किनारे पर बसा हुआ है. नाथद्वारा, उदयपुर से मात्र 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. नाथद्वारा, भगवान श्रीनाथजी के मंदिर की वजह से देश—विदेश में प्रसिद्ध धार्मिक पर्यटक स्थल के रूप में जाना जाता है.



नाथद्वारा मंदिर का इतिहास
मुगल शासक औरंगजेब मूर्ति पूजा का विरोधी था. इसलिए उसने अपने शासनकाल में मंदिरों को तोड़ने के आदेश दिए. अनेक मंदिरों की तोडफ़ोड़ के साथ मथुरा जिले में स्थित श्रीनाथ जी के मंदिर को तोड़ने का काम भी शुरू हो गया. इससे पहले कि श्रीनाथ जी की मूर्ति को कोई क्षति पहुंचे, मंदिर के पुजारी दामोदर दास बैरागी मूर्ति को मंदिर से बाहर निकाल लाए. दामोदर दास वल्लभ संप्रदाय के थे और वल्लभाचार्य के वंशज थे. उन्होंने बैलगाड़ी में श्रीनाथजी की मूर्ति को रखा और उसके बाद कई राजाओं से आग्रह किया कि श्रीनाथ जी का मंदिर बनाकर उसमें मूर्ति स्थापित करा दें, लेकिन औरंगजेब के डर से किसी ने उनका प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया. अंत में दामोदर दास बैरागी ने मेवाड़ के राजा राणा राजसिंह के पास संदेश भिजवाया, क्योंकि राणा राजसिंह पहले भी औरंगजेब को चुनौती दे चुके थे.

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बनास नदी के किनारे नाथद्वारा में है भगवान श्रीनाथ जी का विशाल मंदिर.


यह बात 1660 की है. जब किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमती से विवाह करने का प्रस्ताव औरंगजेब ने भेजा तो चारुमती ने साफ इनकार कर दिया. तब रातों-रात राणा राजसिंह को संदेश भिजवाया गया. राणा राजसिंह ने बिना कोई देरी किए चारुमती से किशनगढ़ में विवाह किया. औरंगजेब इससे राणा राजसिंह को अपना शत्रु मानने लगा. यह दूसरा मौका था जब राणा राजसिंह ने खुलकर औरंगजेब को चुनौती दी और कहा कि उनके रहते हुए बैलगाड़ी में रखी श्रीनाथजी की मूर्ति को कोई छू तक नहीं पाएगा. मंदिर तक पहुंचने से पहले औरंगजेब को एक लाख राजपूतों से निपटना होगा.

कोटा के पास रखी हैं श्रीनाथजी की पादुकाएं
उस समय श्रीनाथजी की मूर्ति बैलगाड़ी में जोधपुर के पास चौपासनी गांव में थी और चौपासनी गांव में कई महीने तक बैलगाड़ी में ही श्रीनाथजी की मूर्ति की उपासना होती रही. यह चौपासनी गांव अब जोधपुर का हिस्सा बन चुका है और जिस स्थान पर यह बैलगाड़ी खड़ी थी, वहां आज श्रीनाथजी का एक मंदिर बनाया गया है. बताते चलें कि कोटा से 10 किमी दूर श्रीनाथजी की चरण पादुकाएं उसी समय से आज तक रखी हुई हैं, उस स्थान को चरण चौकी के नाम से जाना जाता है.

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कोटा से 10 किमी दूर श्रीनाथजी की चरण पादुकाएं रखी हुई हैं, उस स्थान को चरण चौकी के नाम से जाना जाता है.


बाद में चौपासनी से मूर्ति को सिहाड़ लाया गया. दिसंबर 1671 को सिहाड़ गांव में श्रीनाथ जी की मूर्तियों का स्वागत करने के लिए राणा राजसिंह स्वयं गांव गए. यह सिहाड़ गांव उदयपुर से 30 मील एवं जोधपुर से लगभग 140 मील की दूरी पर स्थित है जिसे आज हम नाथद्वारा के नाम से जानते हैं. फरवरी 1672 को मंदिर का निर्माण संपूर्ण हुआ और श्री नाथ जी की मूर्ति मंदिर में स्थापित कर दी गई.

श्रीनाथ मंदिर के बारे 10 रोचक तथ्य

कृष्ण जन्मोत्सव पर 21 तोपों की सलामीः नाथद्वारा में जहां भगवान कृष्ण बालरूप में विराजे हैं, वहां श्रीकृष्ण जन्माष्टमी काफी धूमधाम से मनाई जाती है. आधी रात को ठीक 12 बजे कृष्ण जन्मोत्सव पर यहां 21 तोपों की सलामी दी जाती है. सुबह 4 बजे मंगला के शंखनाद से जन्माष्टमी के कार्यक्रम शुरू होते हैं. सभी प्रहर के शृंगार के बाद रात 11.30 बजे दर्शन बंद. लेकिन आधे घंटे बाद यानी रात 12 बजे पट खुलते ही नाथद्वारा मंदिर भगवान के जयकारों से गूंज उठता है. तभी होती है गाजे-बाजे के साथ 21 तोपों की सलामी. भगवान के मंदिर मोती महल में बिगुल और बैंड बजाकर खुशियां मनाई जाती हैं.
बालरूप में गोवर्धन पर्वतधारी हैं श्रीनाथजीः नाथद्वारा के मंदिर में स्थापित श्रीनाथजी के विग्रह को भगवान कृष्ण का ही दूसरा रूप माना जाता है. मंदिर में स्थित श्रीनाथजी का विग्रह बिल्कुल उसी अवस्था में खड़ा हुआ है, जिस अवस्था में बाल रूप में कृष्ण ने गोवेर्धन पर्वत को अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी उंगली पर उठाया था. भगवान श्रीनाथजी का विग्रह दुर्लभ काले संगमरमर के पत्थर से बना हुआ है. विग्रह का बायां हाथ हवा में उठा हुआ है और दाहिने हाथ की मुट्ठी को कमर पर टिकाया हुआ है. श्रीनाथजी के विग्रह के साथ में एक शेर, दो-दो गाय, तोता व मोर भी दिखाई देते हैं. इन सबके अलावा तीन ऋषि मुनियों की चित्र भी विग्रह के पास रखे हुए हैं.
श्रीनाथजी की​ दिन में आठ बार पूजाः भगवान श्रीनाथजी वैष्णव संप्रदाय के प्रमुख देवता है और इस संप्रदाय को कुछ लोग पुष्टि मार्ग, वल्लभ संप्रदाय और शुद्धद्वैत नाम से भी जानते हैं. इस संप्रदाय की स्थापना वल्लभाचार्य ने की थी. भक्ति योग के अनुयायी और गुजरात, राजस्थान व महाराष्ट्र के वैष्णव प्रमुखता से श्रीनाथजी को मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं. भाटिया लोग भी श्रीनाथजी के बड़े भक्त हैं. वल्लभाचार्य के बेटे विट्ठल नाथजी भगवान श्रीनाथजी के बड़े भक्त थे और भगवान की निस्वार्थ रूप से सेवा और भक्ति करते थे. नाथद्वारा शहर में उन्होंने ही श्रीनाथजी की भक्ति को चरम सीमा पर पहुंचाया. यहां पर भगवान श्रीनाथजी की दिन में आठ बार पूजा की जाती है.
श्रीनाथ की ठोढ़ी में हीरा सुशोभितः भगवान के होठों के नीचे एक हीरा भी लगा हुआ है. भले ही यह प्रसंग इतिहास में न हो किन्तु इसे जन-श्रुति या लोक-श्रुति कह सकते हैं. श्रीनाथजी की ठोढ़ी पर जो मूल्यवान हीरा सुशोभित है, वह मुगल शासक औरंगजेब की मां ने ही भेंट किया था. एक बार औरंगजेब श्रीनाथद्वारा मन्दिर को ध्वस्त करने आया था तो मन्दिर की सीढ़ियां चढ़ते ही उसकी नेत्र-ज्योति कम हो गई. उसने भयभीत होकर वहीं से श्रीनाथ जी से अपने कुकृत्यों की क्षमा मांगी. इसके बाद उसकी नेत्र ज्योति वापस आई. औरंगजेब सेना सहित वापस लौट गया. जब यह घटना उसकी मां को पता लगी तो उसने यह हीरा मूर्ति के श्रृंगार के लिए अर्पित किया.
श्रीनाथ से जुड़ी सभी संपत्ति मंदिर कीः उदयपुर के तत्कालीन शासक ने 1934 में यह आदेश जारी किया कि श्रीनाथजी मंदिर से जुड़ी सभी प्रकार की सम्पति पर पूर्णतया मंदिर का ही अधिकार होगा. उस समय के श्रीनाथजी मंदिर के मुख्य पुजारी श्री तिलकायत जी महाराज जो मंदिर का सरंक्षक, ट्रस्टी और प्रबंधक नियुक्त किया गया. मंदिर से जुड़ी हुआ 562 प्रकार की सम्पत्ति का दुरुपयोग न हो, इसलिए उदयपुर के शासक ने श्रीनाथजी मंदिर की देखरेख का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखा.
पिछवई कला का प्रमुख केंद्रः हिन्दू धर्म की कला और संस्कृति मे श्रीनाथजी के भक्तों ने पिछवई कला में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दिया है. पिछवई कला में कपड़े, कागज और दीवारों पर रंगों का इस्तेमाल करके बहुत ही सुन्दर पेंटिंग बनायीं जाती है. भगवान श्रीनाथजी के कई सारे चित्र इसी पिछवई शैली में बनाये गए हैं. नाथद्वारा इस पिछवई कला का मुख्य केंद्र माना जाता है. नाथद्वारा मंदिर की जो दीवार बनाई गयी है उसे राजस्थान की प्रसिद्ध शैली पिछवई पेंटिंग में बनाया गया है. इन सभी पेंटिंग को नाथद्वारा के कारीगरों ने ही बनाया है.
अर्पित किए जाते हैं 56 प्रकार के भोगः बताते हैं कि इस मन्दिर में 125 मन चावल का भोग नित्य लगता है. क्षेत्र के वनवासी बंधु भोग प्राप्त करते हैं जिसे “लूटना” कहा जाता है. भोग में उपयोग होने वाली कस्तूरी को सोने की चक्की से पीसा जाता है. इसके अतिरिक्त 56 प्रकार के भोग भी श्रीनाथ जी को अर्पित किए जाते हैं. मन्दिर गृह को नन्द बाबा का भवन कहा जाता है. भंडार घर में घी-तेल का भण्डार रहता है. कुछ राज्यों के 30 गांव मन्दिर को दान में मिले हुए हैं.
देश के अमीर मंदिरों में से एकः यहां श्रीनाथजी का भव्य मंदिर स्थित है जो कि पुष्टिमार्गीय वैष्णव सम्प्रदाय का प्रधान (प्रमुख) पीठ है. नाथद्वारा का शाब्दिक अर्थ श्रीनाथ जी का द्वार है. श्री कृष्ण यहां श्रीनाथ जी के नाम से विख्यात हैं. वैष्णव पंथ का यह मंदिर शिर्डी स्थित सांईबाबा, तिरुपति स्थित बालाजी और मुंबई स्थित सिद्धी विनायक मंदिर जैसे भारत के सबसे अमीर मंदिरों की श्रेणी में आता है.
भगवान के लिए लाते हैं खेलने की चीजेंः यूं तो श्रीनाथ जी के मंदिर देश-विदेश में कई जगह हैं, लेकिन श्रीनाथ जी के हर मंदिर में इतने श्रद्धालु नहीं उमड़ते. नाथद्वारा कस्बे की तंग गलियां मथुरा-वृंदावन का अहसास कराती हैं. श्रीनाथ जी के प्रति लोगों की इतनी गहरी आस्था और श्रद्धाभाव है कि साल भर यहां भक्तों का हुजूम लगा रहता है. जो श्रीनाथजी में आस्था रखते हैं वे मानते हैं कि यहां जो भी मन्नत मांगी जाती है, वह जरूर पूरी होती है. इस मंदिर के भगवान छोटे बच्चे के रूप में होने के कारण कई बार भक्त भगवान के लिए छोटे बच्चों की खेलने के चीजें भी लाते हैं. कुछ भक्त चांदी से बनाये हुए जानवर, गाय और गाय चरानेवाले छोटी-छोटी लाठी पूजा के दौरान भगवान को चढ़ाते है.
श्रीनाथजी की यात्रा पर मिलता है फलः अर्थात् जो व्यक्ति भारत के चारों कोणों पर स्थित रंगनाथ, द्वारिकानाथ तथा बद्रीनाथ की यात्रा करके श्रीनाथद्वारा की यात्रा नहीं करता, उसे यात्रा का फल नहीं मिलता है.
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