लाइव टीवी

ANALYSIS: कांग्रेस से जुड़ रहे हैं 'सवर्ण' ?

News18 Rajasthan
Updated: November 20, 2019, 4:28 PM IST
ANALYSIS: कांग्रेस से जुड़ रहे हैं 'सवर्ण' ?
राजस्थान में शहरी निकाय चुनाव नतीजों में कांग्रेस को मिली आशातीत सफलता ने बीजेपी के लिए एक सवाल खड़ा कर दिया है.

राजस्थान में शहरी निकाय चुनाव (Urban Bodies Election Results 2019) के नतीजों में कांग्रेस (Rajasthan Congress) को मिली आशातीत सफलता ने बीजेपी (BJP) के लिए एक सवाल खड़ा कर दिया है. सवाल, अब तक सवर्णों की पार्टी मानी जाने वाली बीजेपी से सवर्णों के छिटकने से जुड़ा है.

  • Share this:
श्रीपाल शक्तावत
जयपुर. राजस्थान में शहरी निकाय चुनाव (Urban Bodies Election Results 2019) के नतीजों ने केंद्र समेत देश के ज्यादातर राज्यों की सत्ता संभाल रही बीजेपी (BJP) के लिए एक सवाल खड़ा कर दिया है. सवाल, अब तक सवर्णों की पार्टी मानी जाने वाली बीजेपी से सवर्णों के छिटकने से जुड़ा है. वजह है, राजस्थान के निकाय चुनावों में कांग्रेस (Rajasthan Congress) को मिली आशातीत सफलता. 49 निकायों के चुनावों में यूं तो निर्दलीयों ने भी जमकर बाजी मारी है. लेकिन कांग्रेस ने बीजेपी के शहरी आधार को जोर का झटका धीरे से दे दिया है. इन 49 शहरी निकाय चुनावों में कांग्रेस बीस निकायों में अपना बोर्ड बनाने में कामयाब रही है, तो देश की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी महज छह निकायों में ही अपनी जीत दर्ज करा पायी है. बाकी 23 निकायों में किसका बोर्ड बनेगा यह निर्दलीय तय करेंगे.

हरियाणा और महाराष्ट्र के बाद राजस्थान की शहरी सरकार के चुनावों में कांग्रेस को मिले इस समर्थन से कांग्रेस की बांछें खिली हुई हैं. कांग्रेस इसे सरकार और संगठन के काम पर मुहर मान रही है वहीं राजनीति के जानकारों का मानना है कि गरीब सवर्णों को आरक्षण में जमीन और भूखंड जैसी जटिल शर्तों को खत्म करने का अशोक गहलोत सरकार का फैसला इन चुनावों में सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा. जाहिर है इस फैसले का फायदा कांग्रेस को हुआ है.

राजस्थान राज्य बीज निगम के पूर्व अध्यक्ष और कांग्रेस नेता धर्मेंद्र राठौड़ कहते हैं, 'ये फैसला लेते वक्त सरकार कि निगाह किसी वोट बैंक पर नहीं थी. सरकार का मकसद उन जटिल शर्तों से जरूरतमंद सवर्णों को निजात दिलाना था, जिसकी वजह से वह आरक्षण के हकदार होते हुए भी उसका लाभ नहीं ले पा रहे थे'. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के करीबी नेताओं में शुमार राठौड़ इस फैसले के पीछे के राजनीतिक मकसद से भले ही इनकार करें. सच यही है कि चुनावी वेला में उन्होंने एक-एक कर सवर्णों के कई संगठनों द्वारा इस फैसले पर सरकार के आभार प्रदर्शन की रणनीति बनाई और मुख्यमंत्री गहलोत का आभार जताने आए सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चुनाव में इसका ईनाम देने का एलान भी किया.

Urban Bodies Election Results 2019, ashok gehlot
निकाय चुनाव से पहले ईडब्ल्यूएस आरक्षण में अचल संपत्ति की बाधाएं समाप्त करने पर प्रदेशभर से आभार व्यक्त करने लोग सीएमआर पहुंचे थे.


अब तक बीजेपी का सबसे स्थायी वोटबैंक माने जाने वाले राजपूत समुदाय के सबसे बड़े संगठन 'श्री क्षत्रिय युवक संघ' के प्रमुख भगवान सिंह रोलसाहबसर तो सरकार के इस फैसले से इतने गदगद थे कि खुद मुख्यमंत्री का आभार जताने गहलोत के पास गए. रोलसाबसर ही नहीं, गरीब सवर्णों के आरक्षण के केंद्र सरकार के फैसले के बावजूद शर्तें इतनी जटिल थी कि सवर्ण संगठनों के कई नेताओं ने लगातार भीड़ के साथ मुख्यमंत्री आवास जाकर सरकार का शुक्रिया कहा. स्पष्ट है कि इस अभियान के चलते अब तक बीजेपी के करीबी रहे सवर्ण मतदाताओं का कांग्रेस के प्रति झुकाव बढ़ा और उसका असर चुनाव के नतीजों पर भी पड़ा.

गौरतलब है कि शहरी आबादी में ज्यादा आबादी सवर्ण समुदाय की मानी जाती है और इसी के चलते बीजेपी शहरी मतदाताओं में बड़ी पैठ भी रखती आयी है. सामाजिक कार्यकर्ता यशवर्धन सिंह शेखावत इन नतीजों को एक नजरिए से देखते हैं. शेखावत कहते हैं, 'बीजेपी की केंद्र सरकार ने सवर्ण आरक्षण का फैसला भले ही लिया हो. वह कई कारणों से इस फैसले का सियासी फायदा नहीं उठा पायी'. शेखावत के मुताबिक पहली वजह है, अशोक गहलोत के शासन में गरीब सवर्णों के लिए चौदह फीसदी आरक्षण की केंद्र को की गई सिफारिश. केंद्र ने इस तबके को आरक्षण तो दिया लेकिन चौदह नहीं दस फीसदी. दूसरी वजह है, इस आरक्षण के लिए किए गए जमीन और भूखंड जैसे ऐसे प्रावधान जिनकी वजह से गरीब सवर्णों के ईबीसी सर्टिफिकेट तक नहीं बने.सवर्ण आरक्षण की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए लगातार अभियान चला रहे श्री क्षात्र पुरुषार्थ फाउंडेशन के प्रमुख यशवर्धन सिंह कहते हैं, 'मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसे गंभीरता से लिया और मुद्दे को समझ जनहित में आरक्षण की शर्तों का सरलीकरण कर दिया. अब जरूरतमंदों को न अचल सम्पति के झमेले में उलझना होगा और न ही प्रशासन को लम्बी प्रक्रिया से गुजर सर्टिफिकेट देने की कवायद करनी होगी'. तो क्या इस मुद्दे पर सवर्ण कांग्रेस के करीब आ रहे हैं? यशवर्धन सिंह कहते हैं, 'करीब ही नहीं आए, उन्होंने निकाय चुनाव में दिल खोल कर कांग्रेस की मदद कर यह भी जता दिया कि यह वोट बैंक अब किसी की जागीर नहीं'.

उल्लेखनीय है कि यशवर्धन सिंह आरटीआई कानून के जरिए सीकर से लोहारू तक के चार टोल बंद करवाने और शेखावाटी क्षेत्र के लिए हुए यमुना समझौते के पालन न हो पाने को अदालत में ले जाने जैसे कार्यों को अंजाम देने के बाद गरीब अगड़ों की आरक्षण की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए श्री क्षात्र फाउंडेशन के बैनर तले लगातार अभियान चला रहे हैं.

राजनैतिक विश्लेषण के लिए पहचाने जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार ओम सैनी कांग्रेस की इस जीत के लिए अगड़ों के रुझान को तो अहम कारक मानते ही हैं, अशोक गहलोत सरकार की प्रो-पीपल स्कीम को भी जीत का क्रेडिट दे रहे हैं. लेकिन बीजेपी के नेता भी दबे स्वर में मान रहे हैं कि पार्टी गरीब अगड़ों को आरक्षण देने जैसे फैसले का क्रेडिट नहीं ले पायी. नाम न छापने की शर्त पर बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, 'बीजेपी को इन नतीजों से यह भी सबक ले लेना चाहिए कि राजस्थान में वसुंधरा राजे को "इग्नोर" करना ठीक नहीं. जमीनी पकड़ के बावजूद राजे की चुनाव प्रक्रिया से दूरी से जिस तरह के संकेत गए, उससे भी बीजेपी को अपने ही प्रभाव क्षेत्र में झटका झेलना पड़ा है'.

फिलहाल, कांग्रेसी खेमे में एक नए वोटबैंक के करीब आने के संकेतों से राहत है वही बीजेपी इन नतीजों से बुरी तरह आहत है. यह दीगर बात है कि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया इन नतीजों में ऐसा कोई संकेत नहीं देखते. पूनिया कहते हैं, 'निकाय चुनावों में सत्ताधारी दल को समर्थन मिलता रहा है और ये चुनाव भी इसी को रेखांकित कर रहे हैं'. चुनावों में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के आरोप लगते हुए पूनिया कहते हैं, 'मशीनरी के दुरुपयोग के बावजूद मत प्रतिशत के लिहाज से बीजेपी कांग्रेस में कोई ज्यादा अंतर नहीं'. हालांकि, सरकार की रीति-नीति को जनता के बीच ले जाने वाले जनसम्पर्क विभाग के मुखिया और राज्य के चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा बीजेपी के हर आरोप को ख़ारिज करते हुए कहते हैं, 'जनता ने बीजेपी के झूठ, फरेब को नकार सरकार के कामकाज पर मुहर लगाई है. सरकार अब अपनी नीतियों के जरिए अपने काम को और गति देगी'.

बहरहाल, ख़ुशी का माहौल कांग्रेस के भीतर ही नहीं, अब तक ग्रामीण और दलित आधार के लिए पहचाने जानी वाली मायावती की बहुजन समाज पार्टी में भी है, जिसने पहली बार शहरी निकाय चुनाव में शिरकत की और कोई आधा दर्जन वार्डों में जीत दर्ज कर अपनी उपस्थिति जता दी. अब बसपा बाकी बचे निकायों के चुनाव में भाग्य आजमाने का सपना संजो रही है तो कांग्रेस सवर्ण आरक्षण की जटिल शर्तों को हटाने के लिए केंद्र पर और दबाव की रणनीति बना रही है. उल्लेखनीय है कि खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इस मुद्दे पर बीते कई दिनों से आक्रामक अंदाज में बीजेपी को घेर रहे हैं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख अचल सम्पति के प्रावधान को सरल करने का आग्रह कर चुके हैं.

ये भी पढ़ें- 
सचिन पायलट ने कहा, BJP का भ्रम टूटा, राममंदिर पर राजनीति पर पूर्ण विराम
गहलोत के सर्वण आरक्षण पर मास्टर स्ट्रोक ने लगाई कांग्रेस की नैया पार!

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए जयपुर से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: November 20, 2019, 4:23 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर