ANALYSIS: क्‍या राष्‍ट्रीय राजनीति में BJP के लिए संकटमोचक बन सकती हैं वसुंधरा राजे

कांग्रेस में अशोक गहलोत जिस तरह केंद्रीय राजनीति में बतौर संगठन महासचिव अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे, ठीक उसी तरह का करिश्मा चंद दिनों पहले तक राजस्थान में मुख्यमंत्री का पद संभालती रही वसुंधरा राजे भी कर सकती हैं.

Shripal Shaktawat | News18 Rajasthan
Updated: January 11, 2019, 11:33 PM IST
ANALYSIS: क्‍या राष्‍ट्रीय राजनीति में BJP के लिए संकटमोचक बन सकती हैं वसुंधरा राजे
वसुंधरा राजे.
Shripal Shaktawat | News18 Rajasthan
Updated: January 11, 2019, 11:33 PM IST
राजस्थान की राजनीति से निकलकर यूं तो भैरों सिंह शेखावत पहले भी उप राष्ट्रपति तक का सफर तय कर चुके हैं. जसवंत सिंह ठेठ रेतीले थार से निकल देश के वित्त और रक्षा मंत्री रह चुके हैं. लेकिन कांग्रेस में अशोक गहलोत जिस तरह केंद्रीय राजनीति में बतौर संगठन महासचिव अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे, ठीक उसी तरह का करिश्मा चंद दिनों पहले तक राजस्थान में मुख्यमंत्री का पद संभालती रही वसुंधरा राजे भी कर सकती हैं. ऐसा दावा राजे के सितारों को ज्योतिषीय आंकलन के जरिए पढ़ने वाले जयपुर के जाने माने ज्योतिषी पंडित मुकेश भारद्वाज, पाली के प्रसिद्ध ज्योतिषी अनिल दहिया करते हैं. इनके अलावा राजे का राजनीतिक गणित भी ऐसा ही इशारा करता है.

राजनीति के जानकार बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा वसुंधरा राजे को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के साथ ही बीजेपी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाये जाने के पीछे उन्हें राज्य की राजनीति से बाहर कर प्रदेशों में नया नेतृत्व उभारने की मंशा बता रहे हैं. एक हद तक यह आंकलन सही भी है. क्योंकि, बतौर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने न बीजेपी आलाकमान को उसकी पसंद का प्रदेश अध्यक्ष (गजेंद्र सिंह शेखावत) बनाने दिया और न ही हाईकमान प्रदेश की राजनीति में कभी राजे पर हावी हो सका. वजह - राजे को नाराज करने का जोखिम उठाना बीजेपी के लिए खतरे से खाली नहीं था.

तो क्या अब बीजेपी वसुंधरा राजे की नाराजगी के डर से बाहर आ गयी है ? इस सवाल का जवाब है - हां, कुछ हद तक. लेकिन, राजे की अनदेखी बीजेपी के लिए उतनी ही हानिकारक होगी जितनी सत्ता में रहते हुए थी. कारण? वसुंधरा राजे सत्ता में भले ही न हो, उनका आकर्षण जनता में पहले की तरह बरक़रार है और राजे खुद भी जनता के बीच से बाहर निकल राजस्थान से दूर जाने के मूड में नहीं है. अंदाज़ ठीक कांग्रेस सरकार के मुखिया - मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरीखा है -"म्ह थांसू दूर नहीं !"

गहलोत ने राष्ट्रीय राजनीति में सक्रियता के साथ ही राजस्थान की जनता को साफ़ सन्देश दे दिया था जबकि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इस सन्देश को सार्वजनिक तौर पर कहने की बजाय उस पर अमल के मूड में हैं.


बहरहाल, बात हो रही थी राष्ट्रीय फलक पर वसुंधरा राजे के असर की. राष्ट्रीय राजनीति के हिसाब से देखें तो राजे के पक्ष में एक दो नहीं कई समीकरण ऐसे हैं, जो उन्हें न केवल राजस्थान बल्कि कई राज्यों में स्वीकार्य बनाते हैं. मसलन - ग्वालियर राजघराने की बेटी होने के नाते वह मध्यप्रदेश के ग्वालियर अंचल ही नहीं बल्कि मध्यप्रदेश के ज्यादातर हिस्सों में अपना प्रभाव रखती हैं. साथ ही मध्यप्रदेश से सटे राजस्थान के धौलपुर राजघराने की बहू के नाते राजे देश के कई राज्यों में प्रभावी जाट वोट बैंक पर भी अपना असर रखती हैं. मराठी भाषी होने के नाते महाराष्ट्र में राजे की स्वीकार्यता है सो अलग.

राजे के साथ राजसी परिवार से जुड़ाव के चलते "ग्लेमर" भी जुड़ा है तो भाषाई पकड़ के चलते दक्षिणी राज्यों में भी पकड़ बनाने में राजे को शायद ही दिक्कत हो. राजनीतिक गणित के हिसाब से देखें तो लुटियंस के दौर से वसुंधरा राजे नवीन पटनायक सरीखे नेताओं के लिए तो स्वीकार्य हैं ही, मराठी मानुस का मुद्दा शिवसेना के उद्धव ठाकरे के लिए भी वसुंधरा राजे को स्वीकार्य बनाता है.
ये बात भी किसी से छिपी हुई नहीं है कि उद्धव ठाकरे के पिता शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे के बीजेपी की संस्थापक सदस्य रहींं ग्वालियर की पूर्व राजमाता स्वर्गीय विजयाराजे सिंधिया से मधुर सम्बन्ध रहे हैं. जाहिर है वसुंधरा राजे के लिए उद्धव ठाकरे को साधना मुश्किल बात नहीं.


राजे के यही समीकरण उन्हें एनडीए के नेताओं में स्वीकार्य बनाते हैं. जानकर मानते हैं कि राजे भले ही राजस्थान की राजनीति में खुद को सहज मानें, संपर्कों और स्वीकार्यता के लिहाज से वह मोदी की गैरमौजूदगी में एनडीए में नितिन गडकरी के बाद सबसे ज्यादा असर वाली नेता हो सकती हैं. यानि, बीजेपी को पूर्ण बहुमत न मिलने की सूरत में एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री के बतौर वसुंधरा राजे को एक बेहतर विकल्प मानने वालों की भी कमी नहीं.
Loading...

लेकिन राजे हैं कि राष्ट्रीय फलक पर संभावना तलाशने की बजाय भैरों सिंह शेखावत ओर अशोक गहलोत की तरह अपने घर -राजस्थान में ही सुकून तलाशती हैं. यह दीगर बात है कि टि्वटर के जरिए राजे ने अमित शाह का इस बात के लिए आभार जता दिया है कि उन्होंने बीजेपी में राजे को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है.

एक क्लिक और खबरें खुद चलकर आएगी आपके पास, सब्सक्राइब करें न्यूज़18 हिंदी WhatsApp अपडेट्स
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर