आपके लिये इसका मतलब: हनुमान बेनीवाल ने NDA से तोड़ा नाता, सियासत के नये समीकरण बनेंगे

बेनीवाल के इस कदम से किसान वर्ग की उनके प्रति सहानुभूति जागना स्वाभाविक है.

नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल (Hanuman Beniwal) की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) द्वारा एनडीए से गठबंधन तोड़े जाने से प्रदेश की सियासत में एक बार फिर हलचल मच गई है. आने वाले समय में किसान वर्ग (Farmers) पर इसका खासा असर देखने को मिल सकता है.

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जयपुर. केन्द्रीय कृषि कानूनों (Central agricultural laws) के विरोध को लेकर नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (National democratic party) ने एनडीए से हाल ही में अपना नाता तोड़ लिया है. हनुमान बेनीवाल (Hanuman Beniwal) के इस कदम से प्रदेश की राजनीति में फिर से नये समीकरण बनने की संभावायें हो गई हैं. राजनीति के ये समीकरण किसान वर्ग के मतदाताओं को प्रभावित करेंगे. हालांकि बेनीवाल की पार्टी के अभी विधानसभा में तीन ही विधायक हैं. लेकिन पार्टी का पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीण इलाकों अच्छा खासा प्रभाव है. इसके कारण आने वाले पंचायती राज चुनाव और उसके बाद विधानसभा चुनावों में नये समीकरण कांग्रेस और बीजेपी को भी नुकसान पहुंचायेंगे.

गत विधानसभा चुनावों से पहले में अस्तित्व में आई आरएलपी ने वर्ष 2018 का विधानसभा का चुनाव स्वतंत्र रूप से लड़ा. इस चुनाव में बेनीवाल ने नागौर जिले की अपनी परंपरागत खींवसर विधानसभा क्षेत्र समेत तीन सीटों पर विजयी हासिल की थी. दो सीटों पर पार्टी के प्रत्याशियों ने अच्छी लीड ली थी. पार्टी के प्रभाव को देखते हुये एनडीए ने लोकसभा चुनाव में बेनीवाल की पार्टी को अपने खेमे में ले लिया. इसके लिये एनडीए ने नागौर लोकसभा सीट आरएलपी के लिये छोड़ दी थी. बेनीवाल के खुद के प्रभाव और बीजेपी के सहयोग से लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त जीत हासिल की. बेनीवाल के सांसद बनने के बाद खाली हुई खींवसर विधानसभा सीट को भी एनडीए ने गठबंधन के तहत आरएलपी के लिये छोड़ दिया था. इस पर आरएलपी ने फिर जीत दर्ज कराई. यहां से बेनीवाल के छोटे भाई नारायण बेनीवाल विधायक चुने गये.

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इसलिये एनडीए से तोड़ा नाता
हालांकि इस बीच बेनीवाल अपनी परंपरागत विरोधी पूर्व सीएम वसुंधरा राजे पर अपने चिर-परिचित अंदाज में लगातार हमला साधते रहे. इसकी पार्टी में अंदरखाने मामूली हलचल होती रही, लेकिन बीजेपी के किसी बड़े नेता ने इसके लिये बेनीवाल पर टिप्पणी नहीं की. उसके बाद हाल ही में आये कृषि कानूनों पर बेनीवाल ने पहले एनडीए के सामने आंखे तरेरी. कई बार बयानबाजी करते हुये केन्द्र से तीनों कृषि कानून वापस लेने की मांग की. अंतत: उन्होंने दो दिन पहले राजस्थान और हरियाणा के बॉर्डर पर स्थित शाहजहांपुर में एनडीए से नाता तोड़ने की घोषणा कर डाली.

यह पड़ेगा असर
इससे पूरे प्रदेश के मतदाताओं पर भले ही कोई खास असर नहीं पड़ेगा, लेकिन किसान वर्ग की उनके प्रति सहानुभूति जागना स्वाभाविक है. वहीं पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में किसान वर्ग के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ सकती है. इसका सीधा असर बीजेपी और कांग्रेस दोनों के वोट बैंक पर भी पड़ना तय है. वहीं बीजेपी और कांग्रेस से मतभेद रखने वाले राजनीति के शौकिनों के लिए संभावना का एक नया द्ववार भी खुल गया है.

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