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आखिर कहां गुम हो रहे हैं होनहार, क्‍या है इसकी वजह?

आखिर कहां गुम हो रहे हैं होनहार, क्‍या है इसकी वजह?

गुमशुदगी कोई अपराध नहीं है, लेकिन इसकी बढ़ती संख्या से प्रदेश के नाम पर दाग लगने के साथ ही पुलिसिया व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हैं। लेकिन क्या हम में से किसी ने कभी सोचा है कि आखिर बच्चे और व्यस्क लोग गुम क्‍यों होते हैं?

गुमशुदगी कोई अपराध नहीं है, लेकिन इसकी बढ़ती संख्या से प्रदेश के नाम पर दाग लगने के साथ ही पुलिसिया व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हैं। लेकिन क्या हम में से किसी ने कभी सोचा है कि आखिर बच्चे और व्यस्क लोग गुम क्‍यों होते हैं?

गुमशुदगी कोई अपराध नहीं है, लेकिन इसकी बढ़ती संख्या से प्रदेश के नाम पर दाग लगने के साथ ही पुलिसिया व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हैं। लेकिन क्या हम में से किसी ने कभी सोचा है कि आखिर बच्चे और व्यस्क लोग गुम क्‍यों होते हैं?

गुमशुदगी कोई अपराध नहीं है, लेकिन इसकी बढ़ती संख्या से प्रदेश के नाम पर दाग लगने के साथ ही पुलिसिया व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हैं। लेकिन क्या हम में से किसी ने कभी सोचा है कि आखिर बच्चे और व्यस्क लोग गुम क्‍यों होते हैं?

क्या बच्चों या बुजुर्गो को परिवार में वो स्नेह नहीं मिलता, जिसकी उन्हें खास जरूरत होती है? सरकार की ओर से नाबालिग बच्चे की गुमशुदगी को गम्भीर मानते हुए इसे तत्काल अपहरण की धारा में दर्ज किया जाता है। ये इसलिए की पुलिस तत्काल कड़े कदम उठाते हुए गुमशुदा की छानबीन में लग जाए।

पिछले कुछ सालों के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में दर्ज हुई गुमशुदगी कि रिपोर्ट में से 90-92 प्रतिशत लोग खुद की पहल या पुलिस के प्रयास के बाद वापस आ जाते हैं, लेकिन इन्हीं आंकड़ों में 8 से 10 प्रतिशत हिस्सा वह बच जाता है जो हमेशा के इन्तज़ार छोड़ जाता है।

चिंताजनक बात यह है कि आखिर वे 10 प्रतिशत लोग वापस क्यों नहीं लौटते? ये वे लोग है जो इतने परेशान है कि वह खुदकुशी का रास्ता अपना लेते हैं। जीवन में मिले डाउनफॉल से ये लोग जीवन समाप्त सा मान लेते हैं।

पुलिस मुख्यालय में बनी मिसिंग सेल का भी मानना है कि प्रदेश में बच्चों की काउंसलिग नहीं होने का कारण बच्चे गलत ट्रैक पर चलने लगते हैं। परिवार के सदस्यों और स्कूल के अध्यापकों को इस ओर जिम्मेदारी से काम करने की जरूरत है।

कई बार माता-पिता के बीच अलगाव तो घर में रोज़ाना की गाली-गलौच या फिर मारपीट जैसे अनेक कारण है जो घर से कहीं दूर जाने को मजबूर करते है। ऐसे लोगों को सही समय पर काउंसलिंग की जरूरत है।

आंकड़ों पर एक नजर:

वर्ष----गुमशुदगी----लौटे----शेष
2011----3757----3583----174
2012----3548----3156----392
2013----2491----2318----173
2014 ----1919----1517----402
2015----133 ----72----61 (जनवरी तक)

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