World Otter Day: राजस्थान में 'जलमानुष' की संख्या में हो रही सुखद बढ़ोत्तरी
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World Otter Day: राजस्थान में 'जलमानुष' की संख्या में हो रही सुखद बढ़ोत्तरी
राजस्थान में बढ़ रही है Otter की संख्या

कोटा के जाने माने जलीय जीव विशेषज्ञ और मानद वन्यजीव प्रतिपालक रविन्द्र सिंह तोमर ने चम्बल में दोबारा इस प्रजाति (Otter) को खोज निकाला और बाकायदा फोटो खींचकर इसकी पुष्टि की थी.

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जयपुर. तीन दशक पहले राजस्थान की नदियों (River of Rajsthan), तालाबों (Ponds) और जलाशयों (Water bodies) से रहस्यमयी तरीके से गायब हुए ऊदबिलाव (Otter) जिसे स्थानीय भाषा में जलमानुष भी कहा जाता है ने उसी खामोशी से वापसी की है जिस खामोशी से ये गायब हुआ था. पानी मे इंसानों की तरह तैरता और तरकीबें लगाता ये जीव बहुत ही जिज्ञासु होता है और इसकी इसी समझदारी की वजह से शायद इसका नाम जल मानुष पड़ा. 27 मई को  दुनियाभर में World Otter Day मनाया जा रहा है ताकि इस प्रजाति के संरक्षण के प्रभावी प्रयास किये जा सकें. राजस्थान में Otter का दिखना कम होने के कारणों के बारे में लोगों ने बस कयास ही लगाए, इस विषय को गम्भीरता से तब लिया गया जब चम्बल नदी में बहुतायत में नजर आने वाला Otter 1980 से 1985 के बीच पूरी तरह से गायब हो गया. राजस्थान में कभी चम्बल, माही, बनास, कालीसिंध समेत कई बांध और बड़ी झीलों में जलमानुष की मौजूदगी थी लेकिन राजस्थान में एक दौर ऐसा भी आया जब कि Otter बस जयपुर चिड़ियाघर में बचा.

2007 में हुई वापसी, 2012 में दिखा
कोटा में चम्बल नदी में साल 2007 से जलमानुष पर अध्ययन कर रहे कन्जर्वेशन बायोलॉजिस्ट आदिल सैफ बताते हैं कि लम्बे अरसे तक विलुप्त होने के बाद साल 2007 में एक दिन अचानक चम्बल में फिर एक Otter नजर आया था. कोटा के जाने माने जलीय जीव विशेषज्ञ और मानद वन्यजीव प्रतिपालक रविन्द्र सिंह तोमर ने चम्बल में दोबारा इस प्रजाति को खोज निकाला और बाकायदा फोटो खींचकर इसकी पुष्टि की थी. उसके बाद 2012 में चम्बल में ही रावतभाटा इलाके में जलमानुष परिवार नजर आया जिसमें नन्हे बच्चे भी साथ दिखाई दिए. अब कोटा, सवाई माधोपुर, धौलपुर, करौली, झालावाड़ समेत कई इलाकों में जलमानुष फिर से दस्तक दे चुका है साथ ही साथ और भी कई नए इलाकों में ये अपना घर तलाश कर रहा है. 2019 में रणथम्भौर में भी जलमानुष का एक परिवार नजर आया था. वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर सुरेंद्र चौहान के मुताबिक चम्बल में जलमानुष को देखने और उसकी फोटो लेना बहुत अनोखा अनुभव है. इसे बचाया जाना चाहिए. रणथम्भौर के इतिहास में पहली बार ये जलीय जीवों की दुर्लभ प्रजाति ऊदबिलाव नजर आई थी. इसे सामान्य स्थानीय भाषा में 'जल मानुष' भी कहा जाता है.

गंगा समेत चंबल, यमुना में है बादशाहत



ऊदबिलाव आमतौर पर गंगा, चंबल व यमुना नदी में पाया जाता है. सवाईमाधोपुर के पाली घाट और चंबल में कई बार ऊदबिलाव नजर आया है. उससे पहले चंबल किनारे रावतभाटा क्षेत्र में जल मानुष नजर आया था. वन्यजीव के रविन्द्र सिंह तोमर ने बताया कि यह एक लुप्तप्राय प्राणी है. 1970 तक इस प्रजाति की संख्या चम्बल में अच्छी थी, फिर शिकार, अवैध बजरी खनन, नदियों में जल प्रदूषित होने से इसकी संख्या लगातार घटने लगी और इन्हीं कारणों से ये राजस्थान से लुप्त हो गया. ये जीव सामान्यत: समूह में रहते हैं. नदी के किनारे घने पेड़ों के पास जड़ों में या नदी के किनारे ही मिट्टी में गुफा के घर बनाते हैं और इनके घर का एक सिरा पानी में होता है. जल मानुष मछली, सीप और केकड़े का भोजन करते हैं. रावतभाटा के आस-पास चंबल नदी में ऐसे जल मानुष और भी हो सकते हैं, जो यदा-कदा ही नजर आते हैं. इस इलाके में 2017 में जब रविन्द्र सिंह तोमर, आदिल सैफ और उनकी टीम ने इनकी गिनती की तो इनकी तादाद इस इलाके में करीब 35 थी. जानकारों के मुताबिक पूरे राजस्थान में वैज्ञानिक पद्धति से इनकी गणना करने की जरूरत है. राजस्थान के कई इलाकों में इनकी संख्या बढ़ रही हैं.



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