पर्यावरण दिवस विशेष: जैसलमेर के वो इलाके जहां पेड़ काटना तो दूर, टहनी उठाना भी है पाप!

जैसेलमेर के ओरण.

जैसेलमेर के ओरण.

World Environment Day 2021: कोरोना काल में उत्पन्न हुई ऑक्सीजन की कमी ने आम जनता को पर्यावरण संरक्षण का महत्व बताया है, लेकिन थार मरुस्थल के बीच बसे सरहदी जिले जैसलमेर में पर्यावरण संरक्षण लोक जीवन का अभिन्न हिस्सा है.

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रिपोर्ट - श्रीकांत व्यास

जैसलमेर. कोरोना काल में उत्पन्न हुई ऑक्सीजन की कमी ने आम जनता को पर्यावरण संरक्षण का महत्व बताया है, लेकिन थार मरुस्थल के बीच बसे सरहदी जिले जैसलमेर में पर्यावरण संरक्षण लोक जीवन का अभिन्न हिस्सा है. हजारों वर्षों से यहां के महत्वपूर्ण भौगोलिक क्षेत्रों जैसे कुछ घास मैदानों, घने कंटीले वृक्षों से आच्छादित क्षेत्रों, बरसाती नदियों के कैचमेंट, यहां के विशेष खड़ीन खेतों के आसपास, मन्दिरों और वीर झुंझारों के देवस्थानों के चारों तरफ की जमीन को ओरण के नाम से सुरक्षित छोड़ने की परम्परा रही है. परंपरा व मान्यताओं के अनुसार यहां पेड़ों को काटना तो दूर टहनी तक उठाना पाप माना जाता है.

दरअसल 'ओरण' शब्द संस्कृत भाषा के अरण्य शब्द का अपभ्रंश है, जिसे वैदिक काल में ऋग्वेद के दसवें मण्डल के अरण्यनी सूक्त में अरण्यनी नामक देवी से सम्बंधित देखा गया था. जहां वह बिना हल चलाये भी मानव व पशु कल्याण के लिये सालभर फलों व चारे की आपूर्ति सुनिश्चित करती थीं. प्राचीन वैदिक काल की यह परम्परा समय गुजरने के साथ पूरे भारत में विभिन्न वैदिक, पौराणिक, लोक देवी-देवताओं व संतों के नाम पर जंगलों को सुरक्षित छोड़े जाने की परम्परा में बदल गई थी, देश के विभिन्न क्षेत्रों में इन्हें रुन्ध, देवबनी, देवराय आदि नामों से जाना जाता रहा है.

देशी फल खाकर जिंदा थे ओरणवासी
इस प्रकार से सुरक्षित यह ओरण सदियों से अपने आसपास के गांवों को मौसमी बेर, कैर, सांगरी, कुम्भट जैसे देसी फलों, शहद, गोंद, पत्तियों, छाल, जड़ी-बूटियों, चारा, घास इत्यादि की उपलब्धता को सुनिश्चित करने का काम करते रहे हैं. इन ओरणों के होने के कारण यहाँ पर प्राचीन समय में लोग, कई-कई वर्षों तक पड़ने वाले अकालों में भी पेड़ों की छाल और जंगली घासों के बीज खाकर जिंदा रहते थे.

...तो झेलना पड़ता है प्रकोप

लोकजीवन में प्रचलित मान्यताओं में इन ओरणों में पेड़ काटने और खेती करने पर प्रतिबंध रहा है, इस बात पर विश्वास नहीं करने पर माना जाता है कि ओरण से सम्बंधित देवी-देवताओं का प्रकोप किसी प्रकार की अनहोनी लाता है. जिसको शांत करने के लिये देवस्थानों पर चांदी के पेड़ चढ़ाने का प्रचलन भी रहा है. अधिकांश ओरणों के देवस्थानों से जुड़े होने के कारण, रियासतकाल में इनमें वन्यजीवों का शिकार भी प्रतिबंधित था, इस कारण आज भी कुछ ओरणों में गोडावण, चिंकारा और प्रवासी पक्षियों की आवाजाही बनी रहती है. जैसलमेर जिले की अधिकांश बरसाती जल धाराएं व नदियां, किसी न किसी ओरण से ही निकल कर रस्ते के विभिन्न गांवों के भू-जलस्तर, तालाबों और खडीनों में वर्षाजल को नियंत्रित करती हैं. इन ओरणो में मौजूद प्राचीन पेड़ आंधियों व बरसातों में भी मिट्टी के अपरदन को रोकने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं.



100 से ज्यादा उड़न पेड़ काटने और खेती पर प्रतिबंध

पिछले कुछ महीनों से इंटैक नई दिल्ली, जोधपुर व जैसलमेर अध्यायों द्वारा जैसलमेर में सामुदायिक पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी संस्था ERDS फॉउंडेशन संस्था के साथ मिलकर जैसलमेर के प्राचीन ओरणों का सर्वे व पहचान का कार्य जैसलमेर के पर्यावरण प्रेमी पार्थ जगाणी व अमिताभ बालोच द्वारा करवाया जा रहा है. पहले चरण में 35 और उन चयनित किए गए हैं जो कि 500 वर्षों से अधिक पुराने हैं. कहीं पर 700 से 800 वर्ष पुराने विशाल वृक्ष भी मौजूद है. जानकारों की माने तो 100 से अधिक वन क्षेत्र में थे और इन सभी में पेड़ काटने और खेती करने पर प्रतिबंध था.

इको पर्यटन के रूप में हो सकता है विकसित

पर्यावरण से जुड़े लोग मानते हैं कि जैसलमेर के प्राचीन ओरण महत्वपूर्ण ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पर्यावरण धरोहर हैं, जिन्हें उनके सुझाव पर सर्वे कर भावी पीढ़ियों के लिये सुरक्षित रखना और इन्हें नेचर हेरिटेज के रूप में मान्यता दिलवाकर ईको पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित करना महत्वपूर्ण है. इंटेक जैसलमेर संयोजक ठाकुर विक्रम सिंह नाचना बताते हैं कि संस्था द्वारा जैसलमेर में ओरणों के सर्वे के प्रथम फेज का कार्य सम्पन्न हो चुका है, इनमें से कुछ ओरण राजस्व रेकॉर्ड में दर्ज नहीं हैं, जिस पर सम्बन्धित विभागों से चर्चा की जायेगी.

यह सभी है जैसलमेर प्राचीन और विशेष ओरण, सैकड़ों साल पुराने

भादरियाराय ओरण, देगराय औरण, आशापुरा ओरण देवीकोट,श्रीपाबूजी ओरण, मालणबाई ओरण, कालेडूंगरराय ओरण, पन्नोधराय ओरण, आईनाथजी ओरण, हड़बूजी ओरण, नागणेची ओरण, नागाणाराय ओरण, जियादेसर ओरण, सोहड़ाजी ओरण, डूंगरपुरजी औरण, बिकनसी जी ओरण, भोपों की ओरण, पाबूजी ओरण करियाप मुख्य है. इनके अलावा जिले के हर क्षेत्र में ओरण मौजूद है. सोनू गांव में स्थित योद्धा बिकनसी जी भाटी के 13वी सदी के ओरण में स्थित मन्दिर में उनके पालतू कुत्ते व घोड़े के पूजनीय स्मारक मौजूद है, मोकला गांव में स्थित योद्धा डुंगरपीर जी का ओरण, जैसलमेर की स्थापना के कुछ समय बाद से मौजूद है और जानरा गांव में स्थित मालण बाई जी का ओरण जैसलमेर की स्थापना से भी पुराना है.

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