झालावाड़: माता-पिता उधार पर दे रहे अपने बच्‍चों का बचपन, रेबाडी करवा रहे बंधुआ मजदूरी का काम
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झालावाड़: माता-पिता उधार पर दे रहे अपने बच्‍चों का बचपन, रेबाडी करवा रहे बंधुआ मजदूरी का काम
झालावाड़ (Jhalawar) से गुजरने वाले रेबाड़ी काफिले (Rebari Convoys) छोटे बच्‍चों को अपनी भेड़ (Sheep) चराने के लिए अनुबंध (Contract) पर रखते हैं.

झालावाड़ (Jhalawar) से गुजरने वाले रेबाड़ी काफिले (Rebari Convoys) छोटे बच्‍चों को अपनी भेड़ (Sheep) चराने के लिए अनुबंध (Contract) पर रखते हैं.

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झालावाड़. राजस्‍थान (Rajasthan) के झालावाड़ (Jhalawar) जिले में आज भी बच्‍चों से बंधुआ मजदूरी (Bonded Labor) खुले आम कराई जाती है. जिले से गुजर रहे रेबाड़ी काफिलों (Rebari Convoys) अपनी भेड़ों (Sheep) को चराने के लिए छोटे बच्‍चों को पसंद करते हैं. वहीं, रुपयों के लालच में आकर इन बच्‍चों को माता-पिता बंधुआ मजदूर के तौर पर रेबाड़ी काफिलों को सौंप देते हैं.

आपको यह जानकार हैरत होगी कि बच्‍चों को बंधुआ मजदूर बनाने से पहले रेबाड़ी काफिलों और अभिभावकों के बीच एक कागजी अनुबंध (Contract) भी होता है. जिसमें, बंधुआ मजदूरी की अवधि और उसके एवज में मिलने वाले रुपयों का जिक्र भी होता है. इसी अनुबंध के बाद मासूम बच्‍चों के बचपन को रेबारियों की भेंड़ चराने में गुजर जाता है. हालांकि, अब इस इलाके के कुछ बच्‍चों ने व्‍यवस्‍था की खिलाफत करना शुरू कर दिया है. ऐसे ही कुछ बच्‍चों की कोशिश के चलते बीते दिनों गस गोरखधंधे का खुलासा हो सका है.

इस तरह हुआ इस गोरखधंधे का खुलासा
उल्‍लेखनीय है कि झालावाड़ में चल रहे इस गोरखधंधे का पता उस समय चला, जब माता-पिता को पैसे देकर उनके बच्चों को अनुबंध पर भेंड़ो के झुंड चराने के लिए लाए गए दो बच्चे रेबारियों के चंगुल से भाग निकले. ये दोनों बच्‍चे भागकर चाइल्ड लाइन पहुंचे. जिनके माध्यम से सारा प्रकरण बाल कल्याण समिति के सामने आ गया. जिसके बाद, बच्चों के परिजनों को बुलाकर दोनों बच्चे उन्हें पाबंद करते हुए सौंप दिए हैं.
रेबारियों की गिरफ्त से भागे बच्‍चों ने किया यह खुलासा


झालावाड बाल कल्याण समिति अध्यक्ष मुकेश उपाध्याय ने बताया कि चाइल्डलाइन द्वारा दो बच्चों को किशोर न्यायालय में प्रस्तुत किया गया. जहां बच्चों ने बताया कि उनमें से एक बांसवाड़ा क्षेत्र तथा एक राजपुर (मध्‍य प्रदेश) का रहने वाला है. उनके माता-पिता ने पैसे लेकर पाली जिले के रेबारियों को सौंप दिया था. उन्‍होंने बताया कि उनको रेबारियों के साथ काफिला में चलते हुए भेड़े चराना तथा सुरक्षा करना पड़ती थी. इसके एवज में उन्हें सिर्फ खाना दिया जाता है, तथा कोई भेड़ गुम हो जाने पर डांट फटकार व मारपीट भी की जाती थी.

यातनाओं से परेशान होकर भागे दोनों बच्‍चे
मुकेश उपाध्याय ने बताया कि यातनाओं से परेशान होकर दोनों बच्चे रेबारियों के चंगुल से निकल कर भाग निकले. सारे मामले मे  बच्चों के परिजनों का कहना है कि गर्मी के दिनों में रेबारियों के डेरे के काफिले दक्षिण पूर्वी राजस्थान वह सीमावर्ती मध्य प्रदेश के इलाकों में होते हैं. बारिश का मौसम शुरू होते ही रेबारियों के काफिले वापस पश्चिमी राजस्थान की ओर लौट जाते हैं. ऐसे में, साल भर या उस से भी अधिक समय तक के लिए रेबाडी गरीब परिवारों के बच्चों को रास्तों में आने वाले गांव से अपनी भेड़ों की देखभाल करने व भेड़ों के झुंड को चढ़ाने के लिए उनके परिजनों से कुछ भेड़ों की एवज या रुपयों बदले उधार पर ले लेते हैं.
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