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झुंझनूं में चर्चा में है वह लोकसभा चुनाव, जब गुमनाम किसान ने नामी उद्योगपति बिरला को हराया

झुंझनूं में चर्चा में है वह लोकसभा चुनाव, जब गुमनाम किसान ने नामी उद्योगपति बिरला को हराया

कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव को लेकर खास तौर से राजस्थान में सियासी उठापटक का दौर चल रहा है. 70 के दशक में जब पार्टी में अंदरूनी उथल-पुथल मची थी, तब राजस्थान में एक लोकसभा चुनाव इतिहास बन गया था. इन सियासी हलचलों के बीच जानिए एक ऐतिहासिक चुनाव की रोचक कहानी.

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रिपोर्ट – इम्तियाज अली

झुंझुनूं. लोकसभा चुनाव 2024 में होना है पर एक चुनाव आज भी लोगों की ज़ुबान पर है. लोग भूलते ही नहीं 1971 के लोकसभा चुनाव के दौरान झुंझनूं का रण, जिसमें एक गरीब किसान और एक नामी उद्योगपति के बीच मुकाबला था और जनता ने उद्योगपति को हरा दिया था. बताते हैं कि उद्योगपति केके बिरला ने चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाया था, लेकिन इंदिरा गांधी की लहर के आगे वह टिक नहीं पाए. कांग्रेस प्रत्याशी किसान शिवनाथ सिंह गिल करीब एक लाख मतों से चुनाव जीत गए थे. हालांकि बिरला लगातार 18 साल तक राज्यसभा के सदस्य रहे, पर उनकी हार देश भर में सुर्खियाें में रही थी.

झुंझुनूं लोकसभा सीट से 1952 से 1962 तक के चुनाव में लगातार कांग्रेस के राधेश्याम आर मोरारका तीन बार जीते. चौथे चुनाव में वह हार गए. इसके बाद 1971 में कांग्रेस ने पहली बार मोरारका की जगह गिल को प्रत्याशी बनाया. गिल मूल रूप से ज़िले के गुढ़ागौड़जी क्षेत्र स्थित गिलों की ढाणी के रहने वाले थे. पिलानी में जन्मे केके बिरला के पिता घनश्यामदास बिरला की गिनती उस समय देश के शीर्ष उद्योगपतियों में थी. वह महात्मा गांधी के भी करीबी थे. स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर बिरला चुनाव मैदान में थे. पूरे देश की नज़र झुंझुनूं के इस चुनाव के नतीजे पर थी.

नतीजा आया तो पूरे देश में एक हंगामा सा हो गया कि एक किसान ने एक उद्योगपति को हरा दिया. वह भी करीब एक लाख मतों के अंतर से. गिल काे तब 2 लाख 23 हजार 286 मत मिले थे जबकि बिरला को 1 लाख 24 हजार 337. मतदान का प्रतिशत 63.02 रहा था. इस ऐतिहासिक जीत के बाद भी गिल का राजनीतिक करियर बहुत आगे तक नहीं पहुंचा बल्कि अगले चुनाव ने एक कहावत और गढ़ी.

फिर कभी संसद नहीं पहुंचे गिल

गिल फिर कभी संसद नहीं पहुंचे. जनता के विश्वास पर गिल ज्यादा खरे नहीं उतरे इसलिए अगले ही चुनाव यानी 1977 में करीब 1,06,783 वोटों पर सिमट गए. 1971 के चुनाव की तुलना में आधे वोट भी उन्हें नहीं मिले. तब यहां कहावत चली ‘यह जनता है, आसमां पर बैठाती है तो नीचे भी गिराती है.’ 1977 में गिल को भारतीय लोक दल के कन्हैयालाल ने हराया था. यह ऐसा इतिहास है कि ज़िले में जब-जब लोकसभा चुनाव होते हैं या सियासी हलचल होती है, तो लोगों की यादें ताज़ा हो ही जाती हैं.

9 बार की विधायक सुमित्रा सिंह ने लड़वाया था चुनाव

एक दिलचस्प फैक्ट यह भी है कि 1971 के लोकसभा चुनाव में शिवनाथ सिंह के चुनाव की कमान पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और उस दौर में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री सुमित्रा सिंह ने संभाली थी. नौ बार विधायक रहीं सुमित्रा सिंह बताती हैं कि चुनाव ऐतिहासिक था. बिरला ने चुनाव प्रचार में काफी पैसा खर्च किया था. पर उस समय देशभर में एक ही नारा था ‘इंदिरा गांधी आई है, नई रोशनी लाई है.’ किसानों ने एकजुटता दिखाई थी और जीत शिवनाथ सिंह की हुई.

Tags: Rajasthan Congress, Rajasthan Politics

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