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कायमखानी: ऐसे मुसलमान जिनके रीति रिवाज 600 साल से हिंदुओं जैसे हैं

कायमखानी: ऐसे मुसलमान जिनके रीति रिवाज 600 साल से हिंदुओं जैसे हैं

कायमखानी मुसलमान आम मुसलमानों की तरह रोज़े रखते हैं. पांच वक़्त की नमाज़ अता करते हैं लेकिन शादी ब्याह और नामकरण जैसे संस्कार हिन्दू रिवाजों से ही करते हैं.

    प्रियंका कांडपाल 

    क्या आप ऐसे मुस्लिम समाज के बारे में जानते हैं जिनकी धार्मिक आस्था इस्लाम है लेकिन उनका एक सिरा जुड़ा है हिंदू परंपराओं से. कायमखानी मुसलमान, देश के बाकी मुसलमानों जैसे होकर भी इसलिए जुदा हैं क्‍योंकि इनके सभी मांगलिक कार्य हिंदू रीति रिवाज से होते हैं. कायमखानी मुसलमान आम मुसलमानों की तरह रोज़े रखते हैं. पांच वक़्त की नमाज़ अता करते हैं लेकिन शादी ब्याह और नामकरण जैसे संस्कार हिन्दू रिवाजों से ही करते हैं.

    न्यूज़ 18 इंडिया ऐसे ही क़ायमख़ानी समाज के रीति रिवाज और धार्मिक आस्था के बारे में जानने की कोशिश की. इसके तहत न्‍यूज18 राजस्थान के झुंझनूं शहर पहुंचा और यहां पर कायमखानी परिवार से मुलाकात की.

    शादी में होती है ऐसी रस्में जो सिर्फ राजपूत समाज में है
    राजस्थान के झुंझनूं शहर में भाटी परिवार में निकाह की तैयारी हो रही है, लेकिन सारी रस्मों- रिवाज हिंदू संस्कृति से मिलते जुलते हैं. दुल्हे के ससुराल से आई थाली में शगुन की चीजों के साथ नारियल भी रखा है. शोहेब खान नाम के इस दूल्हे को तिलक किया जा रहा है. फिर दूल्हे ने बहनों को चुनरी ओढ़ाने की रस्म निभाई. चुनरी ओढ़ाने की परंपरा मुस्लिम समाज में नहीं है, ऐसा केवल राजपूतों में और कायमखानी मुसलमानों में ही होता है.

    न्यूज18 से बात करते हुए कायमखानी समुदाय के कर्नल शौकत अली खान कहते हैं कि हमारे समाज में दुल्हन का स्वागत राजपूत ट्रेडिशन से होता है. बहन से मिलने भाई पहुंचते हैं तो पाटे पर खड़े करके घी चावल से तिलक होता है. हम इस्लाम का पालन करते हैं लेकिन अपने रिवाज कायम हैं.

    कायमखानी मुसलमान हरियाणा के हिसार से लेकर राजस्थान के झुंझुनूं, चूरू, जयपुर, जोधपुर, नागौर, जैसलमेर और यहां तक की पाकिस्तान में भी हैं.


    यूं तो मुसलमानों में भी हल्दी रस्म होती है लेकिन कायमख़ानी मुसलमानों में ये रस्म राजपूतों की तरह होती है. दूल्हे शोहेब को हल्दी पैरों से शुरू करके, घुटने, कंधे, चेहरे और फिर सिर पर लगाई जा रही है. शोहेब ने अपना सिर भी रुमाल से ढका हुआ है. हल्दी का ये तरीका हिंदुओं में ही होता है. इसी परंपरा को निभाते हुए शोहेब के परिवार ने उसके हाथ में कंगना भी बांधा.

    अगले दिन बारात आने से पहले दूल्हा और दुल्हन दोनों के घर भात की रस्म होती है. यानी लड़का या लड़की के मामा कपड़े, पैसे आदि लेकर आते हैं. बहन अपने भाइयों को पटरे पर खड़ा करके उनकी आरती उतारती है. इसके बाद दूल्हे को पटरे पर खड़ा करके आरती की गई. ये एक ऐसी प्रथा है, जो आज भी हर राजपूत घर में होती है.

    यूं तो इस्लाम में संगीत हराम माना जाता है लेकिन कायमखानियों की शादियों में डीजे का इंतज़ाम भी रहता है. कायमखानी मुसलमानों पर बार-बार समाज से दबाव बनाया जाता है कि वो इन परंपराओं को छोड़ दें क्योंकि ये इस्लाम में हराम हैं. कुछ समय पहले तक तो इनकी बारात घोड़े पर ही जाती थी. लेकिन अब बदले वक्त के साथ गाड़ियों में बारात जाने लगी.


    इस बारे में हाशिम अली खां ने बताया कि ऐसा कहा जाता है कि इस्लाम कबूल कर लिया तो इन रिवाजों को छोड़ दो. लेकिन ये छूट नहीं पा रहे हैं बिल्कुल नहीं छूट पा रहे हैं. मज़हब के ऐतबार से बात करते हैं लेकिन कहते हैं नहीं. खून में राजपूताना आज भी मौजूद है. वही काम वही रीति रिवाज करेंगे.

    कौन हैं कायमखानी मुसलमान?
    कायमखानी मुसलमानों का राजपुताने से 6 सदी पुराना नाता है. इन्होंने इस्लाम तो अपना लिया लेकिन राजपुताने की उन परम्पराओं से नाता नहीं तोड़ा जो उन्हें विरासत में मिलीं. कायख़ानी मुसलमानों का इतिहास तेरहवीं सदी से जुड़ा हुआ है. जब दिल्ली में तुगलकी शासन था. फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ के सेनापति सय्यद नसिर की नज़र ददरेवा रियासत के महाराज मोटे राव चौहान के बेटे करम सिंह पर पड़ी. बताया जाता है कि नासिर को करम सिंह में कुछ दिव्य शक्ति नज़र आई. जिसकी जानकारी उन्होंने फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ को दी. तुग़लक़ ने करम सिंह को दिल्ली का न्योता भेजा.

    दिल्ली में ही करम सिंह की शिक्षा दीक्षा हुई. बाद में करम सिंह ने इस्लाम अपना लिया और क़ायम ख़ान बन गए. यहीं से क़ायमख़ानी वंश की शुरुआत हुई. कायमखानी मुसलमानों में आज भी 90 प्रतिशत रिवाज़ राजपूतों के हैं. इसका कारण ये बताया जाता है कि करम सिंह कायम खान तो बन गए लेकिन राजपूताना गौरव से नाता जोड़े रखा. तेरहवी सदी से लेकर अब तक राजपूतों के साथ कायमखानियों का अटूट रिश्ता बना हुआ है.

    कायम खां के सात ब्याह हुए. सातों राजकुमारियां हिन्दू थीं. परम्परा बनी रहीं. भात लेना, टीका करना, कटार का प्रचलन तब से लेकर अभी भी चल रहा है. केवल एक निकाह के अतिरिक्त सभी मांगलिक कार्य हिन्दू रिवाज से संपन्न किए जाते हैं.
    सुशील कुमार शर्मा, प्राध्‍यापक इतिहास


    ये वाक़ई दिलचस्प है कि कायमखानी मुसलमानों में आज भी राजपूती परम्पराएं न सिर्फ सांस ले रही है, बाकि फैल रही हैं. झुंझुनू जिला हरियाणा से जुड़ा हुआ है, इसलिए यहां के परिधानों में हरियाणा का असर देखने को मिलता है. राजस्थान के अंदर के जिलों में आज भी कायमखानी मुसलमान महिलाओं और राजपुताना महिलाओं की वेशभूषा में कोई फ़र्क़ नज़र नहीं आता. कायमख़ानी हवेलियों का आर्किटेक्ट भी हूबहू राजपूताना जैसा ही है.

    कायमख़ानी चौहानों के वंशज हैं, तो आज भी ये भी ख़ुद को योद्धा या क्षत्रिय ही मानते हैं. इसलिए जब आज भी बात भविष्य चुनने की आती है तो ये फौज में जाते हैं.
    शौकत अली ने बताया कि समुदाय की कोशिश कल्चर बचाना है. मार्शल कौम के धर्म कल्चर को बनाए रखना है. वही हमारा फौजी कल्चर है क्‍योंकि हम योद्धा के तौर पर पहचाने जाते हैं. नई जनरेशन वेस्टर्न कल्चर से प्रभावित है लेकिन हमारी कोशिश है कि पुरानी परम्पराओं को बचा के रखें.

    शायद यही वजह है की झुंझनूं को फौजियों का जिला कहा जाता है. इस जिले से अब तक 199 फौजी शहीद हुए हैं.

    कायमखानी आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए है. कायमखानियों में बच्चे के जन्म से लेकर तमाम मंगल कार्यक्रमों में सारे रीति रिवाज़ आज भी राजपुताना ढंग से ही होते हैं. आज जब नफरत सिर उठा रही है उस दौर में कायमखानी समाज गंगा जमुनी तहज़ीब का प्रतीक है.

    Tags: Hindu-Muslim, Muslim, Rajasthan news

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