Jhunjhunu: हारे हुए सरपंच प्रत्याशी को ग्रामीण प्रतिमाह देंगे 15 हजार रुपए पेंशन, जानिये क्या है पूरा मामला

मोबीलाल मीणा (माला पहने हुये) वर्ष 2008 से गांव में राशन डीलर का काम कर रहे थे.
मोबीलाल मीणा (माला पहने हुये) वर्ष 2008 से गांव में राशन डीलर का काम कर रहे थे.

Unique example: झुंझुनूं की दोरासर पंचायत के ग्रामीण एक अनोखा उदाहरण पेश करने जा रहे हैं. वे हारे हुये सरपंच प्रत्याशी (Sarpanch candidate) को आर्थिक संबल प्रदान करने के लिये उसे प्रतिमाह 15 हजार रुपये बतौर पेंशन (Pension) देंगे.

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झुंझुनूं. आपने पूर्व सरकारी कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों को पेंशन (Pension) मिलने के बारे में तो सुना होगा, मगर किसी चुनाव में हारे हुये प्रत्याशी को कोई पेंशन दे ऐसी अनूठी बात शायद ही सुनी होगी. लेकिन राजस्थान के झुंझुनूं जिले (Jhunjhunu district) में अब ऐसा होने जा रहा है. यहां एक हारे हुए सरपंच प्रत्याशी (Sarpanch candidate) को गांव वाले मिलकर प्रतिमाह 15 हजार रुपए पेंशन देंगे. झुंझुनूं के दोरासर पंचायत में सरपंच का चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी को ग्रामीणों ने ना केवल पांच लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी है, बल्कि उनकी हर माह 15 हजार रुपए पेंशन भी बांध दी है.

दरअसल मोबीलाल मीणा ने पिछल दिनों हुये पंचायत चुनाव में झुंझुनूं की दोरासर पंचायत से सरपंच का चुनाव लड़ा था. बदकिस्मती से वे चुनाव नहीं जीत पाए. मोबीलाल चुनाव भले ही हार गये हों, लेकिन वे आज भी ग्रामीणों के दिलों पर राज करते हैं. यही कारण है कि गांव के लोगों ने उन्हें सहायता देने का मन बना लिया है और उनके लिये हर माह 15 हजार रुपए की पेंशन शुरू कर दी है.

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चुनाव के कारण राशन डीलर का काम छोड़ दिया था
पंचायत के वार्ड नंबर एक से निर्वाचित पंच ने बताया कि मोबीलाल मीणा पिछले 12 बरसों से गांव में राशन बांटने का काम रहे थे. लेकिन जब जनवरी 2020 में चुनाव की रणभेरी बजी थी तभी नामांकन के दौरान आपत्ति होने के कारण उन्होंने राशन डीलर का काम छोड़ दिया था. लेकिन अब अक्टूबर में जब चुनाव हुए तो वे चुनाव हार गए. वार्ड नंबर 2 के पंच प्रतिनिधि राजेश ओला ने बताया कि ग्रामीणों ने मोबीलाल मीणा को पांच लाख रुपए बतौर आर्थिक संबल देने के लिए दिए हैं. वहीं तय किया है कि हर माह उन्हें 15 हजार रुपए दिए जाएंगे ताकि उनका घर खर्च चल सके.

1995 से 2000 तक गांव के सरपंच रह चुके हैं
मोबीलाल मीणा बताते है कि वे पहले भी 1995 से 2000 तक गांव के सरपंच रह चुके हैं. इसके बाद वे 2008 से राशन डीलर का काम कर रहे थे. इससे उनका घर खर्च चल रहा था. इस बार फिर से पंचायत जब एसटी के लिए आरक्षित हुई तो ग्रामीणों की भावनाओं के कारण उन्होंने चुनाव लड़ा. लेकिन नियम कायदों के कारण उन्हें अपनी रोजी रोटी का साधन राशन डीलरशिप छोड़नी पड़ी. अब उन्हें खुशी है कि ग्रामीणों ने उनकी इतनी सहायता की. ग्रामीणों का कहना है कि जब तक मोबीलाल को कोई रोजगार नहीं मिल जाता है या फिर उनके परिवार में जब तक कोई रोजगार नहीं आता है तब तक उन्हें 15 हजार रुपए महीने के देंगे. ताकि उनके परिवार के सामने खाने के लाले ना पड़े.
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