Assembly Election 2018: कांग्रेस के 'गढ़' मंडावा में BJP अभी तक नहीं कर पाई है 'एंट्री'

राजस्थान के मंडावा विधानसभा क्षेत्र का राजनीतिक परिदृश्य भी कम रोचक नहीं है. कांग्रेस इसे छोड़ना नहीं चाहती और बीजेपी यहां अभी तक 'एंट्री' नहीं मार पाई है. विधानसभा चुनाव 2018 में बीजेपी और कांग्रेस दोनों इस सीट पर डोरे डाले हुए हैं.

Asif Khan | News18 Rajasthan
Updated: September 10, 2018, 8:21 PM IST
Assembly Election 2018: कांग्रेस के 'गढ़' मंडावा में BJP अभी तक नहीं कर पाई है 'एंट्री'
फोटो: न्यूज18 राजस्थान
Asif Khan | News18 Rajasthan
Updated: September 10, 2018, 8:21 PM IST
प्रदेश की राजनीति में शेखावाटी का अपना एक अहम स्थान है. यहां से निकले बीजेपी और कांग्रेस के दिग्गज राष्ट्रीय परिदृश्य पर भी खूब छाए रहे हैं. इसी शेखावाटी का एक जिला है झुंझुनूं. देशभर में सैनिकों के जिले के रूप में पहचान रखने वाले झुंझुनूं के मंडावा की देशभर में अपनी एक अलग पहचान है. मंडावा अपनी सांस्कृतिक धरोहर और विश्व प्रसिद्ध हवेलियों के लिए जाना जाता है.

यह ऐतिहासिक कस्बा बॉलीवुड की पसंदीदा फिल्म लोकेशन में शुमार है. बजरंगी भाईजान, पीके, जब वी मेट समेत न जाने कितनी ही फिल्मों की यहां शूटिंग हो चुकी है. यहां का राजनीतिक परिदृश्य भी कम रोचक नहीं है. कांग्रेस इस विधानसभा सीट को छोड़ना नहीं चाहती और बीजेपी यहां अभी तक 'एंट्री' नहीं मार पाई है. इस बार विधानसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस दोनों इस सीट पर डोरे डाले हुए हैं. वहीं बसपा और आम आदमी पार्टी भी यहां कड़ी टक्कर देने का दावा कर रहे हैं.

13 बार में से आठ बार कांग्रेस का कब्जा
1957 से अस्तित्व में आई इस सीट पर अब तक 13 बार हुए चुनावों में से आठ बार कांग्रेस ने परचम लहराया है. 1977 में जनता लहर में भी कांग्रेस ने यहां अपना कब्जा नहीं छोड़ा. आठ बार जीती कांग्रेस में भी सात बार एक ही परिवार इस पर काबिज रहा है. यहां से छह बार कांग्रेस के रामनारायण चौधरी व एक बार उनकी बेटी रीटा चौधरी विधायक रही हैं. शेष समय में अन्य पार्टियां यहां काबिज रही हैं.


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पहली बार निर्दलीय विधायक
गत चुनावों में जनता ने परिवारवाद को नकारते हुए यहां पहली बार निर्दलीय नरेन्द्र खीचड़ को विधायक चुना. लेकिन रीटा चौधरी अब भी टिकट की आस लगाए बैठी हैं. नरेन्द्र खीचड़ बीजेपी विचारधारा से है और पिछली बार बीजेपी से टिकट ना मिलने पर निर्दलीय ही चुनाव लड़कर जीते थे. इस बार इस उम्मीद में है कि बीजेपी उनकी पिछली परफॉर्मेंन्स से खुश होकर इस बार उनको ही टिकट देगी.
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फाइल फोटो।


बसपा को है बहुत उम्मीदें
इस बार ये मुक़ाबला दो पार्टियों में ही नहीं है बल्कि बसपा को भी यहां से काफी उम्मीदें नजर आ रही हैं. पूरा जातिगत अंकगणित लगाने के बाद बसपा को लगता है कि ये सीट इस बार वो हर हाल में निकाल लेंगे. लिहाजा बसपा ने यहां सबसे पहले अनवार खान को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया.


भाजपा व कांग्रेस हैं कई उम्मीदवार
आप पार्टी भी अपना उम्मीदवार यहां से उतार चुकी है और बदलाव के नाम पर वोट मांग रही है. आप और बसपा से केवल एक एक उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन बीजेपी और कांग्रेस से कई दावेदार हैं. उनको उम्मीद है कि इस बार पार्टी नए चेहरे का चुनाव करेगी और उन्हें प्रत्याशी बनाएगी.

बारिश में पूरा शहर डूब जाता है
छोटे शहर की समस्याएं भी छोटी होती हैं. इतने समय बाद भी यहां चिकित्सा के उचित व्यवस्था नहीं और लोग इलाज के लिए झुंझनूं आते हैं. थोड़ी सी बरसात में शहर पूरा डूब जाता है. वर्तमान विधायक काम करने का दावा तो बहुत करते हैं, लेकिन काम कहीं नजर नहीं आता है.

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बड़ा अहम है यहां का जातिगत समीकरण
लगभग ढाई लाख की आबादी वाले इस क्षेत्र का जातीय समीकरण बड़ा अहम है. जाट बाहुल्य इस इलाके में हर पार्टी जाट प्रत्याशी पर ही दांव लगाना चाहती है ताकि हार की गुंजाइश कम से कम रहे. क्षेत्र की कुल आबादी में मोटे तौर पर देखें तो मुस्लिम 47000, एससी 48000, जाट 65000, ब्राह्मण-बनिया 16000, राजपूत 22000, कुम्हार 9000, माली 16000, जांगिड़ 8000 और अन्य मतदाता 15000 हैं.
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