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सरहद पर शहीद होने की चाहत में अफसर की नौकरी छोड़ देते हैं 'कायमखानी'
Jhunjhunu News in Hindi

Shripal Shaktawat | News18 Rajasthan
Updated: January 21, 2020, 8:57 PM IST
सरहद पर शहीद होने की चाहत में अफसर की नौकरी छोड़ देते हैं 'कायमखानी'
आरिफ खान और मुबारिक अली को मिल चुका है बड़ा सम्‍मान.

पहले विश्व युद्ध से लेकर अब तक कायमखानी मुसलमानों के कुल 204 सैनिक शहादत का इतिहास रच चुके हैं. जबकि आने वाली पीढ़ी शहादत की इस परम्परा को और आगे बढ़ाती रहे, उसके लिए एक शहीद स्मारक (Memorial) भी बनाया गया है.

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जयपुर. राजस्थान के झुंझुनूं  जिले के 'धनूरी' गांव के अब तक 17 लोगों ने शहादत देकर इतिहास रचा है, तो झांझोद और नुआं में दस-दस शहीद हुए हैं. अकेले इन तीन गांवों में ही कुल 37 कायमखानी सरहद पर कुर्बान हो गए. ये बात कहते-कहते मियांजी फक्र भी महसूस कर रहे थे तो आईजी लियाकत अली (Liaquat Ali) जैसे शख्‍स के चले जाने पर मायूस हो रहे थे. दरअसल, मौका गमी जताने का था और बात शौर्य की हो रही थी. जयपुर के एक स्कूल में जमा हुए लोग राजस्थान पुलिस में आईजी रहे लियाकत के निधन पर शोक जताने इकठ्ठा हुये थे, लेकिन चर्चा लियाकत साहब के बहाने कायमखानियों की शौर्य परम्परा की हो रही थी.
कायमखानी समुदाय की परंपरा को आगे बढ़ाया
पहले राजस्थान पुलिस सेवा और फिर भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे लियाकत अली कायमखानी समुदाय की इस परम्परा को आगे बढ़ाने के हर संभव जतन करते रहे. ज़िंदगी की आखिरी घड़ी में भी वह अपने गांव में इसी को लेकर समाज के प्रबुद्ध लोगों से चर्चा कर रहे थे और उनके चले जाने के बाद शोक सभा में भी चर्चा इसी मुद्दे पर जारी थी.

शहादत है परंपरा



दरअसल, पहले विश्व युद्ध से लेकर अब तक कायमखानी मुसलमानों के कुल 204 सैनिक शहादत का इतिहास रच चुके हैं. आने वाली पीढ़ी शहादत की इस परम्परा को और आगे बढाती रहे, इसी मकसद से राजस्थान के ददरेवा (चुरू) में एक शहीद स्मारक का निर्माण कराया गया था. राजस्थान में वक्फ बोर्ड के चेयरमेन रह चुके पूर्व आईपीएस लियाकत अली इस पहल को आगे बढ़ाने वाले लोगों में से एक थे. इस परम्परा को आगे बढ़ाने के इस जतन में लियाकत साहब के साथ सक्रिय रहे कर्नल शौकत अली कहते हैं कि सेना कायमखानियों की पहली वरीयता है, बाकी सब बाद में.

बता दें कि शौकत अली तहसीलदार सेवा के लिए चुने गये थे. उन्‍हें न सूबे से बाहर जाना था और न अपनों से दूर. जबकि दो नंबर की कमाई के लिहाज से भी तहसीलदार का पद मलाईदार माना जाता है, लेकिन उनके पिता दफेदार अमानुल्लाह खान को बेटे का तहसीलदार बनना मंजूर नहीं था. वो चाहते थे कि उनका बेटा शौकत पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ाए और शौकत अली सेना में गये. जबकि शौकत के बेटे लेफ्टिनेंट कर्नल नबील खान ने भी उसी परम्परा को आगे बढ़ाया. पांचवीं पीढ़ी सेना में है और उनके साथ जुड़ा है अपने ही गांव झांझोद (जिला-झुंझुनू) में अब तक दस के शहीद होने का इतिहास.

 

शेखावाटी अंचल की ये है पहचान
राजस्थान का शेखावाटी अंचल सबसे ज्यादा सैनिक पैदा करने के लिए पहचाना जाता है, तो जोधपुर जिले की पहचान सबसे ज्यादा शौर्य विधवाओं के लिये होती है. शेखावाटी की इस पहचान में कायमखानी मुसलमानों की बड़ी भूमिका है, तो शेरगढ़ को पहचान दी है रेतीले थार में जन्मे राजपूतों ने. कायमखानी कौम के ही दो लाडलों-हवलदार आरिफ खान और कमांडो मुबारिक अली को 2017 और 2018 में शौर्य चक्र से नवाजा गया तो आरिफ खान के गांव हमीर खां का बास और मुबारिक अली के गांव गांगियासर में दोनों को दूल्हे के अंदाज़ में घोड़ी पर निकाल इस परम्परा को आगे बढ़ाने के सन्देश दिए गये थे.

 

आरिफ खान और मुबारिक अली की दांस्‍तान
परम्परा के संवाहक 16 ग्रेनेडियर के हवलदार आरिफ खान को शौर्य चक्र मिला तो उम्र महज 23 साल थी. बुधवार 18 मार्च 2017 का दिन था, एक आतंकी के पुलवामा में छिपे होने की सूचना पर मकान की घेराबंदी के दौरान खिड़की से कूद कर भागे दो आतंकियों ने फायरिंग कर आरिफ को निशाने पर ले लिया. जवाब में आरिफ खान ने भी फायरिंग की और एक आतंकी को मौके पर ही ढेर कर दिया और एक को ज़िंदा दबोच लिया. आरिफ खान को इसी बहादुरी के लिए शौर्य चक्र से नवाजा गया. आरिफ खान इसके पीछे पीढ़ियों से मिले संस्कार को खास वजह बताते हैं. मजेदार बात ये है कि आरिफ खान के परिवार में बारह सैनिक हैं. दादा यासीन खान बतौर सैनिक 1965 और 1971 के युद्ध लड़े थे तो परदादा ने भी सेना में पराक्रम दिखाया था.

आरिफ खान के शौर्य और साहस की चर्चा जारी ही थी कि अगले ही साल गांगियासर के कमांडो मुबारिक अली को मिले शौर्य चक्र ने कायखानियों की भुजाओं में नया जोश भर दिया. 30 जुलाई 2017 रविवार की अलसाई सी सुबह थी. पुलवामा के दहब इलाके में तलाशी अभियान पर निकली सेना ने एक जगह हलचल महसूस की. सेना के जवान आगे बढ़ते इससे पहले ही फायर कर संदिग्ध भाग निकले. जबकि आतंकियों की एक गोली दाहिने हाथ को भेद गई तो दूसरी गोली सीने पर बुलेट प्रूफ जैकेट के चलते पार नहीं हो सकी. घायल कमांडो मुबारिक अली ने एक हाथ से मोर्चा संभाला और पीछा करते हुये तीन आतंकियों को ढेर कर दिया. 55 राष्ट्रीय राइफल के हवलदार मुबारिक अली ने इससे पहले कारगिल युद्ध में भी अपने शौर्य का परिचय दिया था. धनूरी के कायमखानी परिवार में जन्मे कैप्टन हसन अली कहते हैं, 'शेखावाटी और कायमखानी कौम में शौर्य के ऐसे कई किस्से हैं, जो आज भी प्रेरक का काम कर रहे हैं.' आपको बता दें कि 1971 की लड़ाई में मेंढर सेक्टर में तैनात रहे कैप्टन हसन के ब्रिगेडियर रहे हमीर सिंह शेखावत को वीर चक्र से नवाजा गया था.

 

कायमखानी कौन ?
अतीत पर निगाह डालें तो कायमखानी, मजहब के लिहाज से बेशक अब इस्लाम का हिस्सा हैं, लेकिन रक्त और परम्परा के लिहाज से हैं क्षत्रिय ही हैं. आज भी मांगलिक अवसर हों चाहे कोई और मौके. सम्बोधन, रहन -सहन, पहनावे और परम्पराएं आज भी राजपूती हैं. कर्नल शौकत अली ने हाल ही गोगामेड़ी (हनुमानगढ़ )का दौरा किया तो लोकदेवता-वीर गोगा जी की वंशावली के साथ फोटो खिंचवाने का मोह नहीं छोड़ पाये. वजह थी उस वंशावली में सोलहवीं पीढ़ी पर दर्ज़ एक नाम -कर्म सिंह. हिन्दुओं में "वीर गोगा' और मुस्लिमों में "गोगाजी पीर" के नाम से पूजे जाने वाले गोगाजी के राजवंश के वारिस रहे मोटे राव चौहान के पुत्र कर्म सिंह ने दिल्ली के सुल्तान फिरोज शाह तुगलक के दौर में फ़ारसी और शस्त्र विद्या की तालीम ली थी. सैय्यद नासिर की देखरेख में पढ़ाई के दौरान वह इस्लाम धर्म से इस कदर प्रभावित हुए कि कायमखानी कौम की नींव रख दी. 1386 में सेनापति बने कर्म सिंह उर्फ़ कायमखां ने हिसार के नवाब के रूप में शौर्य परम्परा की कुछ इस तरह शुरुआत की कि आज भी मौका ख़ुशी का हो चाहे गम का, कायमखानी एक जाजम पर बैठते हैं तो बात युद्ध की होती है, शहादत की होती है.

बहरहाल, जिसे सेना में ज्यादा मेडल मिलें, उतना ही सम्मान और शहादत देने वालों के लिए तो सम्मान की कोई सीमा ही नहीं. लोकदेवता के रूप में कायमखां के पूर्वज वीर गोगा यानी गोगाजी पीर कौमी एकता की मिसाल बने हैं तो कर्म सिंह चौहान उर्फ़ नवाब कायमखां के वारिस शौर्य और साहस की मिसाल कायम कर रहे हैं.

 

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First published: January 21, 2020, 7:22 PM IST
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