देशभर में सुर्खियां बनीं थी सांसद बूटा सिंह की हार, यहां पढ़ें- कैसे शेखावत ने उखाड़ा था 'बूटा सिंह का खूंटा'?

बुटा सिंह और भैरवसिंह शेखावत. फाइल फोटो.

Buta Singh Death: पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा के नजदीकी रहे देश के पूर्व केंद्रीय मंत्री व कांग्रेस नेता बूटा सिंह का शनिवार को देहांत हो गया. बूटा सिंह के राजस्थान (Rajasthan) में चुनाव लड़ने को लेकर एक कहावत प्रसिद्ध थी कि "बूटा सिंह का खूंटा" कोई नहीं उखाड़ सकता.

  • Share this:
जोधपुर. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा के नजदीकी रहे और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा जालौर में स्थापित किए गए बूटा सिंह को लेकर राजस्थान (Rajasthan) में एक कहावत प्रसिद्ध हो गई थी कि "बूटा सिंह का खूंटा" कोई नहीं उखाड़ सकता. कांग्रेस का एक मजबूत किला जालौर-सिरोही में स्थापित हो चुका था. देश के पूर्व गृह मंत्री रहे सरदार बूटा सिंह के देहांत के बाद एक बार फिर "बूटा सिंह का खूंटा"  चर्चा में आया है. जालौर व सिरोही से चार बार सांसद रहे बूटा सिंह की साल 1989 में हार देश भर में चर्चा व मीडिया की सुर्खियां रही थीं.

इस हार के पीछे भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कद्दावर नेता भैरोंसिंह शेखावत (Bhairo Singh Shekhawat) की सफल चुनावी रणनीति कारण थी. भैरों सिंह शेखावत ने "बूटा सिंह का खूंटा"  जालौर से उखाड़ फेंका था. हालांकि बूटा सिंह अपनी हार के बाद अगले चुनाव में फिर जीत दर्ज करने में कामयाब रहे. लेकिन पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत ने इस मिथक को तोड़ के रख दिया की "बूटा का खूंटा" कोई नहीं उखाड़ सकता.

इंदिरा के थे करीबी
गौरतलब है कि बूटा सिंह पंजाब के प्रभावशाली दलित नेता थे. इसके साथ ही वे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खास सिपहसालारों में से एक थे. बूटा सिंह रोपड़ से वर्ष 1967 से लगातार चुनाव जीतते आ रहे थे. वर्ष 1984 के लोकसभा चुनाव से पहले ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार व तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को यह चिंता सता रही थी कि कहीं बूटा सिंह हार न जाएं, जिसके चलते उन्हें कांग्रेस की सबसे मजबूत सीट जालौर-सिरोही से चुनाव लड़ाया गया. दरअसल ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद पंजाब का माहौल पूरी तरह से बदल गया था. ऐसे में राजीव गांधी ने उनकी जीत सुनिश्चित करने के लिए राजस्थान के जालोर-सिरोही संसदीय क्षेत्र में चुनाव लड़ाया, जहां एक तरफ पंजाब में मतदाताओं में आक्रोश था तो वहीं  राजस्थान के मतदाताओं में स्वर्गीय इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर चल रही थी, जिसका पूरा फायदा बूटा सिंह को मिला और वे यहां से जीतकर संसद में पहुंचे.

करना पड़ा हार सामना
देश के कृषि और गृह मंत्री रहे बूटा सिंह उस दौर में सबसे प्रभावशाली नेताओ की फेहरिस्त में शुमार थे, लेकिन शेखावत के दांव में ऐसे उलझे कि उन्हें पटखनी खानी पड़ी. लोकसभा चुनाव से ठीक पहले साल 1989 में बोफोर्स घोटाला उजागर हुआ था, जिसके चलते कांग्रेस खिलाफ देश में लगभग माहौल बन के तैयार था. इसके बावजूद बूटा सिंह की हार को लेकर कोई भी चुनाव विश्लेषक सोच भी नहीं सकता था. ऐसे में स्वर्गीय भैरों सिंह शेखावत ने इस संसदीय सीट को लेकर कुछ अलग ही रणनीति बना रखी थी. एक तरफ भारतीय जनता पार्टी और जनता दल गठबंधन को कोई प्रत्याशी नहीं मिल रहा था. ऐसे में भैरों सिंह शेखावत ने उदयपुर के कैलाश मेघवाल को जालौर सिरोही सीट से चुनाव लड़ने के लिए बोला, लेकिन मेघवाल तैयार नहीं हुए, क्योंकि उन्हें अपने इस स्पष्ट हार नजर आ रही थी, लेकिन पार्टी के आदेश के चलते उन्होंने वहां से अपना नामांकन दाखिल किया.

दिया ये नारा
कैलाश मेघवाल भी यह बात जान चुके थे कि इस बार उनकी दाल नहीं गलने वाली और उन्हें हार का सामना करना पड़ेगा. लेकिन चुनावी सभाओं के दौरान भैरों सिंह शेखावत ने एक नया नारा दिया "बूटा को वापस पंजाब भेजो, राजस्थानी को अपना प्रतिनिधि चुनकर लोकसभा में भेजो" इस नारे ने चुनाव की तस्वीर ही बदल डाली. खुद बूटा सिंह को भी समझ आ गया कि "बूटा का खूंटा" नारा अब नहीं चलेगा. बूटा सिंह ने अपना पूरा दमखम इस चुनाव में लगा दिया यहां तक की मीडिया ने भी खुलकर बूटा सिंह के पक्ष में खबरें प्रसारित की. चुनावी विश्लेषकों की नजर में सबसे कमजोर प्रत्याशी कैलाश मेघवाल अब मजबूत प्रत्याशी बन चुके थे. भैरों सिंह शेखावत की 4 जनसभाओं ने पूरे चुनाव की हवा ही बदल दी. नतीजा जब सामने आया पूरा देश चौक गया बूटा सिंह चुनाव हार गए और कैलाश मेघवाल चुनाव जीत गए.