राजस्थान में घट रहे मरुस्थल और गायब होते रेत के टीलों की वैज्ञानिकों ने बताई ये वजह

राजस्थान के मारवाड़ में बहुत तेजी से घट रहे मरुस्थल और गायब हो रहे रेत के टीलों का कारण बताते हुए जोधपुर के एरिड फॉरेस्ट रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों ने एक रिपोर्ट जारी की है.

Lalit Singh | News18 Rajasthan
Updated: September 12, 2019, 3:05 PM IST
राजस्थान में घट रहे मरुस्थल और गायब होते रेत के टीलों की वैज्ञानिकों ने बताई ये वजह
 एरिड फॉरेस्ट रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिक डॉ जी सिंह ने विस्तार से दी इसकी जानकारी 
Lalit Singh | News18 Rajasthan
Updated: September 12, 2019, 3:05 PM IST
देश में मरुस्थल(Desert) लगातार कम होता जा रहा है. खासकर राजस्थान (Rajasthan) के मारवाड़ (marwar) में बहुत तेजी से मरुस्थल कम हो रहा है. मारवाड़ के श्री गंगानगर से लेकर बाड़मेर तक 12 जिलों में तेजी से मरुस्थल घटने का रिकॉर्ड (Record) दर्ज हुआ है. यह रेगिस्तान लगभग 2 लाख 80 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है, जिसका लगभग 95 फीसदी हिस्सा भारत में पड़ता है और बाकी हिस्सा पाकिस्तान में है. इस बीच जोधपुर के एरिड फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (Arid Forest Research Institute) की एक रिपोर्ट(report) ने कुछ ऐसे संकेत दिए हैं जिससे आने वाले समय में रेत के टीले गायब होने के संकेत मिले हैं.

थार रेगिस्तान का 90 फीसदी हिस्सा है राजस्थान में 

मरुस्थल पर रहने वाले नागरिकों ने अपने स्वार्थ के चलते नेचर से ऐसा खिलवाड़ किया है कि मरुस्थल की पहचान खोने की आशंका होने लगी है. राजस्थान की पहचान माने जाने वाले थार मरुस्थल को विश्व का 9 वां सबसे बड़ा रेगिस्तान कहा जाता है. थार रेगिस्तान का 90 फीसदी हिस्सा भारत के राजस्थान में स्थित है, जबकि बाकी का क्षेत्र पंजाब, हरियाणा और गुजरात में पड़ता है. पाकिस्तान में यह सिंध और पंजाब प्रांत तक फैला हुआ है.

हर साल उत्तर-पूर्व की ओर खिसक रहा थार का रेगिस्तान

मरुभूमि के घटने की वजह स्थानीय लोगों द्वारा शुरू की गई आधुनिक तकनीक से खेती को माना जा रहा है


रिपोर्ट की मानें तो थार का रेगिस्तान हर साल उत्तर-पूर्व की ओर खिसक रहा है. इसकी आगे बढ़ने की रफ्तार आधा किलोमीटर प्रति वर्ष है. यही कारण है कि राजस्थान की पहचान माने जाने वाले थार रेगिस्तान अब धीरे-धीरे कम होता जा रहा है. इसके इसी फैलाव को रोकने के लिए सरकार ने इंदिरा नहर बनाई, जिसकी लंबाई 649 किलोमीटर है और जहां हरियाली लाने की कोशिश की जा रही है. लेकिन बदलते समय में मरुस्थल के नागरिकों ने रेगिस्तानी टीलों को समतल कर उसपर खेती करनी शुरू कर दी है. हैरानी की बात यह है की खेती अब तकनीक वाली हो गई है जिससे मिट्टी में भी बदलाव होने लगा है. पहले मारवाड़ में रेगिस्तान के टीले 97 प्रतिशत थे जो अब मात्र 47 प्रतिशत बचे हैं. थार की बात करें तो दूर-दूर तक आसानी से रेत के टीले दिखाई देते थे, लेकिन अब बड़े- बड़े रेत के टीले मुश्किल से नजर आ रहे हैं. ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में रेत के टीले गायब हो जाएंगे.

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First published: September 12, 2019, 1:51 PM IST
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