वीरांगना गट्टूदेवी की दास्तां: पति की शहादत के 57 साल बाद तक भरती रहीं मांग में सिंदूर

वीरांगना गट्टूदेवी। फोटो : न्यूज 18 राजस्थान ।

वीरांगना गट्टूदेवी। फोटो : न्यूज 18 राजस्थान ।

दो दिन पहले जब पूर्व सैनिक कल्याण प्रेम सिंह बाजोर की प्रेरणा से भीकाराम ताड़ा की गांव में मूर्ति का अनावरण किया गया तो गट्टूदेवी की आंखें भर आईं. उसने अपने शरीर से सुहाग चिन्ह उतारकर अपने पति के चरणों में रख दिए.

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यह कहानी है एक ऐसी वीरांगना की, जिसने अपने पति की शहादत के 57 साल बाद तक अपने शरीर से सुहाग चिन्ह नहीं उतारे. दो दिन पहले जब गांव में पति शहीद भीकाराम ताड़ा की मूर्ति का अनावरण किया गया तब उसने अपने सुहाग चिन्ह उतारकर पति के चरणों में रख दिए. इतने बरसों तक वह अपने पति को जिंदा मानती रही और सुहागन बनी रही. यह अनोखी दास्तां है जोधपुर के पीपाड़ तहसील के खांगटा गांव की वीरांगना गट्टूदेवी की.



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गट्टूदेवी का यह जज्बा भले ही गांव और समाज को अखरा होगा, लेकिन उसने देशभक्ति की इन्हीं भावनाओं से अपने दो बेटों को पिता की वीरता के किस्से सुनाकर न केवल बड़ा किया, बल्कि दोनों को देश की सेवा में समर्पित कर दिया. आज एक बेटा थल सेना में है और दूसरा नेवी में सेवारत है. यही नहीं परिवार की तीसरी पीढ़ी का पौत्र भी भारतीय सेना में भर्ती होकर देश सेवा कर रहा है.





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8 सितंबर 1962 को भीकाराम शहीद हुए



पीपाड़ तहसील के खांगटा गांव निवासी भीकाराम ताड़ा का जन्म 1 जुलाई, 1943 को हुआ था. छोटी उम्र में ही उनकी शादी गट्टूदेवी के साथ हो गई थी. भीकाराम साढ़े 18 साल की उम्र में 1961 में आर्मी के पायनियर कोर बेंगलुरू में भर्ती हो गए. एक साल बाद ही उन्हें 1962 में चीन से हुई जंग में जाना पड़ा. 8 सितंबर 1962 को उन्होंने देश के लिए शहादत दे दी. शहादत के बाद पार्थिव देह घर नहीं पहुंची. लिहाजा गट्टूदेवी ने ये कहते हुए अपने सुहाग चिन्ह उतारने से मना कर दिया कि मेरे पति जिंदा हैं और वे एक दिन जरूर आएंगे.



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सेना में जाने के बाद पिता सिर्फ एक बार घर आए थे



भीकाराम के बेटों ने बताया कि मां कहती थी कि फौज में जाने के बाद उनके पिता सिर्फ एक बार घर आए थे. जंग छिड़ी तो लड़ने चले गए. फिर कभी लौटकर नहीं आए. मां-पिताजी के किस्से सुनाती रहती थी. गट्टूदेवी ने मां के साथ-साथ पिता की भी भूमिका अदा की. नतीजतन मां की प्रेरणा ने बच्चों में भी देशभक्ति का जज्बा जागा. पहले बड़ा बेटा बक्साराम आर्मी में भर्ती हुआ. फिर छोटा बेटा श्रीराम भी नौ-सेना में भर्ती होकर देश सेवा करने में जुट गया.



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सुहाग चिन्ह उतारकर अपने पति के चरणों में रखे



दो दिन पहले जब पूर्व सैनिक कल्याण प्रेम सिंह बाजोर की प्रेरणा से भीकाराम ताड़ा की गांव में मूर्ति का अनावरण किया गया तो गट्टूदेवी की आंखें भर आईं. उसने अपने शरीर से सुहाग चिन्ह उतारकर अपने पति के चरणों में रख दिए.



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सैनिक कल्याण बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष बाजोर ने उठा रखा है बीड़ा



प्रेमसिंह बाजोर ने प्रदेश के करीब 1100 शहीदों की प्रतिमाएं बनवाने का बीड़ा उठा रखा है. इस पर करीब 25 करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं. वे करगिल युद्ध से पहले विभिन्न लड़ाइयों में शहीद हुए वीर जवानों की मूर्तियां लगवाने में जुटे हैं. उनके इस मिशन के बाद राजस्थान देश का ऐसा अकेला राज्य बन जाएगा, जहां के तमाम शहीदों की प्रतिमाएं स्थापित होंगी. उनके इस काम को लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज कराने की तैयारी भी की जा रही है.



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