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राजस्थान का ऐसा शहर जहां 78 वर्षों से हो रहा खादी का कारोबार, 200 परिवारों को मिल रहा रोजगार

भारत में खादी का उत्पादन महात्मा गांधी के समय से होता आ रहा है तो वहीं दूसरी ओर राजस्थान के एक छोटे से जिले करौली में भ ...अधिक पढ़ें

मोहित शर्मा/करौली. स्वतंत्रता की पोशाक कहीं जाने वाली खादी हाथ से काते गए और बुने गए कपड़े को कहते हैं कच्चे माल के रूप में कपास. रेशम या ऊन का प्रयोग किया जाता है जिसे चरखे पर कातकर धागा बनाया जाता है. संपूर्ण भारत में खादी का उत्पादन गांधी जी के समय से होता आ रहा है. राजस्थान के करौली जिले में भी खादी का कारोबार गांधी जी के जमाने से चलता आ रहा है. स्वतंत्रता सेनानी चिरंजी लाल शर्मा सबसे पहले साल 1928 में महात्मा गांधी को करौली मे बनी खादी के कपड़े भेंट किए थे, जिसकी कताई बुनाई की गांधी जी ने भी तारीफ की थी.

करौली के खादी के कपड़ों से प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने ग्राम सेवा संघ की कार्य योजना बनाने के लिए जमुनालाल बजाज को करौली भेजा था. इसके बाद 1946 में हरीभाऊ उपाध्याय और चिरंजी लाल शर्मा ने करौली खादी ग्राम सेवक संघ की विधि विधान से शुरुआत की. अब भी करौली खादी ग्राम सेवा संघ हर साल 80 लाख रुपए का कारोबार करता है, लेकिन खादी उत्पादों पर सरकार की ओर से दी जाने वाली सब्सिडी की राशि समय पर नहीं मिलने से खादी का उत्पादन परवान नहीं चढ़ पा रहा है.

200 परिवारों को खादी से मिल रहा रोजगार
करौली खादी ग्राम सेवा मंत्री सौरभ शर्मा ने बताया कि खादी उत्पादों की लागत पर खर्च की जाने वाली 65 फीसदी राशि श्रमिकों को दे दी जाती है. करौली खादी ग्राम सेवक संघ से 200 से ज्यादा परिवारों को कताई से रोजगार मिल रहा है और बुनाई से भी 15 परिवार जुड़े हुए हैं सौरभ शर्मा ने बताया कि उत्पादन बढ़ने पर रोजगार के अवसर और भी बढ़ सकते हैं. कतबारी करने वाली देवकी ने बताया कि वह 30 साल से खादी ग्राम सेवा के कताई केंद्र पर काम कर रही हैं, जिससे उनके परिवार का पालन पोषण हो रहा है.

Tags: Karauli news, Rajasthan news

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