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Rajasthan: विदेशी पर्यटकों की पहली पसंद करौली में बनने वाली 'लाख' की चूड़ियां, जानें खासियत 

Karauli News: लाख का उत्पादन भारत, म्यांमार, थाइलैंड, मलाया में मुख्यरूप होता है. देश की बात करें तो विश्व की 70 प्रतिश ...अधिक पढ़ें

रिपोर्ट: मोहित शर्मा

करौली: आपने महिलाओं के श्रृंगार को चार चांद लगाने वाली विभिन्न प्रकार की चूड़ियां (Bangles) देखी होंगी लेकिन इनमें सबसे प्रचलित ‘लाख’ की चूड़ियां हैं. जो आज भी विदेशी पर्यटकों को अपनी और आकर्षित करती हैं. प्रदेश में जयपुर के बाद लाख की चूड़ी बनाने की दूसरी सबसे बड़ी मंडी करौली है. दरअसल,करौली में चूड़ियों का व्यापार खुदरा मूल्य पर होता है तो वही जयपुर में यह व्यापार थोक में होता है. चूड़ियों का व्यापार यहां का सबसे प्रमुख और पुश्तैनी व्यापार है जिसमें करौली शहर, हिंडौनसिटी, टोडाभीम, महू इब्राहिमपुर, सपोटरा में इस व्यापार से करीब दो हजार से ज्यादा परिवार जुड़े हुए हैं.

करौली की चूड़ियों का बाजार मदन मोहन जी मंदिर के समीप होने के कारण यहां की प्रसिद्ध चूड़ियां और लाख के कंगन बाहर से आए पर्यटकों को भी अपनी और खींचती हैं. लाख की चूड़ियां यहां के लोकल कारीगरों द्वारा बनाई जाती हैं, चूड़ियों मे नगीने लगाने का कार्य यहां के कारीगरों द्वारा बहुत सफाई से किया जाता है, जिससे इन चूड़ियों की सुंदरता में और चकाचौंध लग जाती है.

मुस्लिम परिवारों का पुश्तैनी व्यापार
चमक और रंगों के कारण करौली में बनने वाली लाख की चूड़ियां बंगाल, उत्तर प्रदेश, मुंबई, कोलकाता, और आगरा मे सबसे ज्यादा पसंद की जाती है. राजस्थान के जयपुर से इन लाख की चूड़ियों की सप्लाई थोक के रूप में विदेशों तक होती है. करौली में चूड़े बनाने से लेकर उनकी बिक्री तक का काम यहां के मुस्लिम परिवारों द्वारा किया जाता है. चूड़ा व्यापारी जीनत कोसर ने बताया उनके परिवार मे यह काम 8 पीढ़ियों से चलता आ रहा है जो कि उनका पुश्तैनी व्यापार है.

जानिए लाख की चूड़ियों की कीमत
जीनत के अनुसार यहां पर गर्म लाख की चूड़ियों का काम सबसे ज्यादा होता है और यहां की प्रसिद्ध चूड़ियों का मूल्य ₹20 से लेकर ₹1000 तक होता है. शुद्ध लाख से बने चूड़े, फैंसी चूड़े और कंगन , लहरिया चुडे की तोहारी सीजन सावन, करवा चौथ और दीपावली दशहरे पर सबसे ज्यादा डिमांड रहती है.

भारत में बड़े पैमाने पर होता है उत्पादन
लाख का उत्पादन भारत, म्यांमार, थाइलैंड, मलाया में मुख्यरूप होता है. देश की बात करें तो विश्व की 70 प्रतिशत लाख का देश में प्राकृतिक रूप से उत्पादन हो रहा है.

इनमें भी 90 प्रतिशत झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में होता है. राजस्थान में भी प्रबल संभावनाएं हैं जिस पर रिसर्च चल रही है.

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