राजस्थान: श्रीकृष्ण की बहन योगमाया का है अलौकिक मंदिर, इसी माह आएंगे लाखों श्रद्धालु

राज राजेश्वरी मंदिर का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है. उत्तर भारत के शक्तिपीठों में से एक इस मंदिर के बारे में कई मान्यताएं हैं. (फाइल फोटो)

राज राजेश्वरी मंदिर का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है. उत्तर भारत के शक्तिपीठों में से एक इस मंदिर के बारे में कई मान्यताएं हैं. (फाइल फोटो)

कैला देवी मंदिर (Kaila Devi Temple) को उत्तर भारत के प्रसिद्ध दुर्गा मंदिरों में से एक माना गया है. मंदिर के पास में मौजूद कालीसिल नदी भी चमत्कारिक नदी है.

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  • Last Updated: April 3, 2021, 12:17 PM IST
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जयपुर. राजस्थान (Rajasthan) की पावन धरा शूरवीरों की धरा है. यहां पर कई बड़े राजा- महाराजाओं की विरासत हैं. साथ ही मरुधरा पावन भूमि भी है. यहां कई ऐसे प्रसिद्ध व चमत्कारी मंदिर हैं, जो विख्यात हैं. राजस्थान के करौली (Karauli) में स्थित कैला देवी मंदिर (Kaila Devi Temple) देशभर में बहुत प्रसिद्ध है. ऐसी मान्यता है कि यहां शक्तिपीठ है और यहां विराजीत कैला देवी यदुवंशी है, जिन्हें श्रद्धालु- भक्त भगवान श्रीकृष्ण की बहन योगमाया मानते हैं. इसको लेकर कई कथाएं भी प्रचलित हैं. ऐसी मान्यता है कि सच्चे मन से जो भी भक्त से लेकर डकैत तक मन्नत लेकर आता है कैला देवी उनकी हर मनोकामना को जरूर पूरा करती हैं. इसलिए साल भर इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ लगी रहती है.

कैला देवी मंदिर का इतिहास

जयपुर से 195 किमी दूर करौली जिले में कैला देवी मंदिर सैकड़ों साल से ज्यादा पुराना मंदिर है. इस प्राचीन मंदिर में चांदी की चौकी पर स्वर्ण छतरियों के नीचे दो प्रतिमाएं हैं. इनमें एक बाईं ओर है, उसका मुंह कुछ टेढ़ा है, वो ही कैला मइया हैं, दाहिनी ओर दूसरी माता चामुंडा देवी की प्रतिमा है. कैला देवी की आठ भुजाएं हैं. इस मंदिर को उत्तर भारत के प्रमुख शक्तिपीठ के रूप में ख्याति प्राप्त है. मंदिर का निर्माण राजा भोमपाल ने 1600 ई. में करवाया था. इस मंदिर से जुड़ी अनेक कथाएं यहां प्रचलित हैं. माना जाता है कि भगवान कृष्ण के पिता वासुदेव और देवकी को जेल में डालकर जिस कन्या योगमाया का वध कंस ने करना चाहा था, वह योगमाया कैला देवी के रूप में इस मंदिर में विराजमान है.

मां के अवतरण की तीन गाथाएं
1. श्रीकृष्ण की बहन योगमाया हैं कैलादेवी

कैला देवी मंदिर के बारे में एक और मान्यता है. कहा जाता है कि कैला देवी भगवान श्री कृष्ण की बहन हैं. जब देवकी के दुष्ट भाई कंस को पता लगा था की उनकी बहन की संतान ही उनकी मौत का कारण बनेगी, तब कंस ने देवकी और उनके पति को बंदी बना लिया था. जब आठवीं संतान के रूप में भगवान विष्णु ने श्री कृष्ण अवतार में जन्म लिया तो उसी वक्त गोकुल में यशोदा और नंद बाबा के घर बेटी का जन्म हुआ. जिसके बाद विधि के विधान अनुसार वासुदेवजी ने गोकुल जाकर कृष्ण को वहां छोड़ आए और नंदबाबा की बेटी को अपने साथ मथुरा ले आए. कंस जब देवकी की आठवीं संतान को मारने लगा तो वह देवी रूप में प्रकट होकर आकाश में चली गईं. जनश्रुति है कि कंस के हाथ से छूटकर योगमाया देवी राजस्थान में कैला देवी के रूप में विराजमान हो गईं. कैला देवी की पूजा यहां के लोग कृष्ण की बहन के रूप में भी करते हैं.

2. सती के अंग गिरने से बनी कैलादेवी शक्तिपीठ



राज्याचार्य पंडित प्रकाश चंद के मुताबिक, सती के अंग जहां-जहां गिरे, वहीं एक शक्तिपीठ का उद्गम हुआ. उन्हीं शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ कैलादेवी है. कहा जाता है कि बाबा केदारगिरी ने तपस्या के बाद माता के श्रीमुख की स्थापना इस शक्तिपीठ के रूप में की. ऐतिहासिक साक्ष्यों व किंवदंतियों के अनुसार प्राचीनकाल में सघन जंगल में स्थित गिरी-कन्दराओं में एक दानव रहता था, जो लोगों को परेशान करता था. बाबा ने इस दानव से क्षेत्र को मुक्त कराने के लिए हिमलाज पर्वत पर आकर घोर तपस्या की. इससे प्रसन्न होकर माता प्रकट हुईं और वरदान मांगने को कहा. तब केदारगिरी ने दैत्यों से मुक्ति पाने का वर देवी मां से मांगा. कुछ समय पश्चात देवी मां कैला ग्राम में प्रकट हुई और उस दानव का कालीसिंध नदी के तट पर वध किया, जहां एक बड़े पाषाण पर आज भी दानव के पैरों के चिन्ह देखने को मिलते हैं. इस स्थान का नाम आज भी दानव दह के नाम से जाना जाता है.

3. बोहरा भगत ने खुदाई से प्रतिमा निकाली

एक अन्य किंवदन्ती के अनुसार त्रिकूट पर्वत पर बोहरा नामक चरवाहा अपने पशुओं को चराने ले जाता था. धार्मिक प्रवृति के बोहरा का मन भक्ति में खूब रमता था. एक दिन उसने देखा कि उसकी बकरियां एक स्थान विशेष पर दुग्ध सृजित कर रही हैं. इस चमत्कार ने उसे आश्चर्य में डाल दिया. उसने इस स्थल की खुदाई शुरू कर दी. कुछ दिन बाद वहां से कैला देवी मां की प्रतिमा निकली. चरवाहे ने भक्तिपूर्वक पूजन कर ज्योति जगाई. धीरे-धीरे प्रतिमा की ख्याति क्षेत्र में फैल गई. लोगों की मन की मुरादें पूरी होने से मां के दरबार में भक्तों का सैलाब उमड़ने लगा. आज भी बोहरा भगत का मंदिर कैलादेवी मुख्य मंदिर के प्रांगण में स्थित है.

मंदिर में बारे में महत्वपूर्ण तथ्य जो आप जरूर जानना चाहेंगे

1. मूर्ति न हिली तो वहीं स्थापित कर होने लगी पूजा

ऐसा माना जाता है कि मंदिर में स्थापित मूर्ति पूर्व में नगरकोट में स्थापित थी. मुगल शासकों के मूर्ति तोड़ो अभियान से आशंकित मंदिर के पुजारी योगिराज मूर्ति को मुकुंददास खींची के यहां ले आए. केदार गिरि बाबा की गुफा के निकट रात्रि हो जाने से उन्होंने मूर्ति बैलगाड़ी से उतारकर नीचे रख दी और बाबा से मिलने चले गए. दूसरे दिन सुबह जब योगिराज ने मूर्ति उठाने की चेष्टा की तो वह उस मूर्ति हिला भी नहीं सके. इसे माता भगवती की इच्छा समझ योगिराज ने मूर्ति को उसी स्थान पर स्थापित कर दिया और मूर्ति की सेवा करने की जिम्मेदारी बाबा केदारगिरी को सौंप कर वापस नगरकोट चले गए.

2. राजकोष से होती थी भोग- प्रसाद की व्यवस्था

राज राजेश्वरी मंदिर का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है. उत्तर भारत के शक्तिपीठों में से एक इस मंदिर के बारे में कई मान्यताएं हैं. इतिहासकारों के अनुसार वर्तमान में जो कैला ग्राम है वह करौली के यदुवंशी राजाओं के आधिपत्य में आने से पहले गागरोन के खींची राजपूतों के शासन में था. खींची राजा मुकन्ददास ने मंदिर की सेवा, सुरक्षा का दायित्व राजकोष पर लेकर नियमित भोग-प्रसाद और ज्योत की व्यवस्था करवा दी थी. राजा रघुदास ने लाल पत्थर से माता का मंदिर बनवाया. स्थानीय करौली रियासत द्वारा उसके बाद नियमित रूप से मंदिर प्रबन्धन का कार्य किया जाता रहा.

3. इस माह में लघु कुंभ बन जाएगा दरबार

वैसे तो उत्तरी-पूर्वी राजस्थान के चम्बल नदी के बीहड़ों के नजदीक कैला ग्राम में स्थित मां के दरबार में बारह महीने श्रद्धालु दर्शनार्थ आते रहते हैं, लेकिन चैत्र मास में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले वार्षिक मेले में तो जन सैलाब-सा उमड़ पडता है. चैत्र मास में शक्तिपूजा का विशेष महत्व रहा है. त्रिकूट पर्वत पर विराजमान कैला मैया का दरबार चैत्रामास में लघु कुम्भ सा नजर आता है.

4. कैला देवी में होता है परम्पराओं का निर्वहन

कैला देवी मंदिर में दर्शन के साथ यहां पर महिलाएं सुहाग के प्रतीक के रूप में हरे रंग की चूड़ियां और सिंदूर की खरीदरी करना नहीं भूलती हैं. वहीं नव दम्पत्तियों द्वारा एक साथ दर्शन करना, बच्चों का मुंडन संस्कार की परम्परा भी यहां देखने को मिलती है. मंदिर परिसर में ढोल-नगाड़ों की धुन पर अनायास ही पुरूष दर्शनार्थी लांगुरिया गीत गाने लगते है तो महिला दर्शकों के कदम थिरके बिना नहीं रह सकते.

5. तिथिवार आते हैं राज्यों के दर्शनार्थी

चैत्र के लक्खी मेले में अलग- अलग राज्यों के श्रद्धालु अलग- अलग तिथियों में दर्शनार्थ आते हैं. चैत्र कृष्ण में बारस से पड़वा तक मेले में पांच दिन तक पदयात्रियों का हुजूम दिखता है. इस चरण में उत्तर प्रदेश के श्रद्धालु अधिक होते हैं और वाहनों से यात्री कम आते है. द्वितीय चरण में नवरात्रा स्थापना से तृतीया तक दिल्ली, हरियाणा के यात्रियों का खूब जमावड़ा रहता है. तीसरे चरण में चतुर्थी से छटवीं तक मध्यप्रदेश एवं भरतपुर- धौलपुर क्षेत्र के श्रद्धालु आते हैं. चौथा चरण सप्तमी से नवमीं तक होता है इसमें गुजरात, मुम्बई व दक्षिण भारतीय राज्यों के यात्री अधिक आते हैं. अन्तिम चरण में राजस्थान भर के यात्री, श्रद्धलु, स्थानीय लोग लांगुरिया गाते हुए आते हैं. यह दशमी से पूर्णिमा तक चलता है. अनुमानतः प्रतिवर्ष लगभग 30 से 40 लाख यात्री मां के दरबार में अपनी हाजिरी लगाते हैं.

6. कालीसिल : दूर करती है रोग-कष्ट

कैला देवी मंदिर को उत्तर भारत के प्रसिद्ध दुर्गा मंदिरों में से एक माना गया है. मंदिर के पास में मौजूद कालीसिल नदी भी चमत्कारिक नदी है. ऐसी मान्यता है कि यहां दर्शन करने के लिए आने वाले भक्तों को कालीसिल नदी में स्नान कर माता के दर्शन करने से कई प्रकार के रोग एवं कष्ट दूर होते हैं. नवरात्रि में माता के दर्शन करने से उनके विशेष आशीर्वाद प्राप्त किए जा सकते हैं. मान्यता है कि जब तक कालीसिल में स्नान नहीं किया जाता तब तक कैलादेवी की तीर्थयात्रा भी सफल नहीं होती.

7. डकैत चढ़ाते हैं विजयी घंटा और ध्वज

राजस्थान का करौली जिला डकैतों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है. करौली में स्थित मां कैला देवी के इस मंदिर में डकैत वेष बदलकर आते हैं और मां कैला देवी की साधना करते हैं. लक्ष्य की साधना के लिए मां से मन्नत मांगते हैं. मन्नत पूरी होने पर फिर आते हैं. मां की पूजा के बाद विजय घंटा और ध्वज चढ़ाते हैं और निकल जाते हैं. मंदिर के बाहर और अंदर पुलिस का कड़ा पहरा हर समय रहता है. कई बार पुलिस को मुखबिर डकैतों के आने की सूचना मिल जाती है, उसके बाद भी डकैत मंदिर में पूजा-पाठ कर निकल जाते हैं. इक्का-दुक्का मामले छोड़ दें तो पुलिस किसी बड़े डकैत को यहां से आज तक नहीं पकड़ पाई है.
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