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नवजातों के लिए काल बना कोटा का ये अस्पताल, हर साल 28 दिन तक के 20% शिशुओं की माैत

शिशुओं की मौत को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. (सांकेतिक तस्वीर)
शिशुओं की मौत को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. (सांकेतिक तस्वीर)

जेके लोन अस्‍पताल में नवजात की मौत का मामला आए दिन सामने आता है. अब एक रिपोर्ट में इस बाबत चौंकाने वाला खुलासा हुआ है.

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कोटा. राजस्थान (Rajasthan) के कोटा (Kota) में शिशुओं की मौत के चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, जेकेक लोन अस्‍पताल में नियोनेटल (0 से 28 दिन के नवजात शिशु) डेथ रेट राष्‍ट्रीय औसत से भी ज्यादा है. यहां भर्ती हाेने वाले 18 से 20 प्रतिशत नवजात की मौत हो रही है, जबकि भारत में इसका औसत 16 प्रतिशत तक है. वह भी तब, जब बच्चे आउटबॉर्न यानी बाहर जन्म लेने के बाद संबंधित अस्पताल पहुंचे हों. अस्पताल में पिछले तीन साल में बच्चों की मौत के आंकड़ों से ये खुलासा हुआ है.

मीडिया रिपोर्ट में यह बात सामने आई है. नेशनल नियोनेटल प्रीनेटल डेटाबेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इनबॉर्न यानी उसी हाॅस्पिटल में पैदा होने वाले बच्चों के मामले में तो भारत का नियोनेटल डेथ रेट 5 प्रतिशत ही माना जाता है. आउटबॉर्न के मामले में यह 16 प्रतिशत तक है. बताया जा रहा है कि जेके लोन में इनबॉर्न व आउटबॉर्न दोनों श्रेणी के बच्चे होते हैं, ऐसे में यहां का डेथ रेट तो देश के आउटबॉर्न औसत से और कम होना चाहिए, लेकिन स्थिति उलट है. यहां के एनआईसीयू में 100 में से 18-20 बच्चों की मौत हो जाती है.

इसलिए हो रही मौतें
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, एनआईसीयू में मौत का प्रमुख कारण लो बर्थ वेट माना जा रहा है. इसके अलावा पीलिया, गंदा पानी फेफड़ों में जाना, श्वास संबंधी समस्याएं, जन्मजात दिल की बीमारी, दौरे आना और कई तरह के संक्रमण प्रमुख कारण रहे हैं.
8 साल में देश में 62.40 लाख माैतें


वर्ष 2008 से 2015 के बीच भारत में 1.11 करोड़ बच्चे अपना पांचवां जन्मदिन नहीं मना पाए. इनमें से 62.40 लाख बच्चों की जन्म के 28 दिन के अंदर ही मौत हो गई. भारत सरकार के सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे के अनुसार, वर्ष 2015 में हर घंटे 74 नवजात शिशुओं का दिल काम करना बंद कर रहा था, जबकि 2008 से 2015 के बीच हर घंटे 89 नवजात शिशुओं की मौत हुई. वैश्विक नवजात मृत्यु दर 29.4 प्रति हजार है, जबकि देश में 33 है.
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