कोटा: मूलभूत सुविधाओं को तरसता शहर का यह गांव, सुध लेने वाला नहीं कोई!

कोटा शहर के वार्ड संख्या 3 में आने वाला रियासतकालीन शंभूपुरा गांव बेरुखी का शिकार है और ग्रामीणो का दर्द अब जुबां से झलकने लगा है. वार्ड नम्बर 3 के इस गांव में कागजों में मूलभूत सुविधाओं के नाम पर करोड़ों रुपए का खर्च हो गया, लेकिन ग्रामीणों को विकास के नाम पर कुछ नहीं मिला.

sachin ojha | News18 Rajasthan
Updated: June 14, 2018, 2:59 PM IST
कोटा: मूलभूत सुविधाओं को तरसता शहर का यह गांव, सुध लेने वाला नहीं कोई!
शंभूपुरा की ग्रामीण महिलाएं
sachin ojha | News18 Rajasthan
Updated: June 14, 2018, 2:59 PM IST
विकास और तरक्की के लिए गांव के लोग शहर में आना पंसद करते हैं, लेकिन नौ साल पहले कोटा शहर में शामिल हुए शंभूपुरा गांव के लोग मांग कर रहे हैं कि उन्हें फिर गांव का दर्जा दिया जाए, ताकि हर सुविधा के लिए 10 से 20 किलोमीटर नहीं जाना पड़े.

कोटा शहर के वार्ड संख्या 3 में आने वाला रियासतकालीन शंभूपुरा गांव बेरुखी का शिकार है और ग्रामीणो का दर्द अब जुबां से झलकने लगा है. वार्ड नम्बर 3 के इस गांव में कागजों में मूलभूत सुविधाओं के नाम पर करोड़ों रुपए का खर्च हो गया, लेकिन ग्रामीणों को विकास के नाम पर कुछ नहीं मिला. ग्रामीणों का कहना है कि गांव में आज भी सड़क नहीं बनी.

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ग्रामीणों को इलाज और पार्षद से मिलने के लिए 10 किलोमीटर दूर नांता जाना पड़ता है. ग्रामीणों ने बताया कि यहां मिडिल स्कूल है और आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण बच्चे आगे नहीं पढ़ पा रहे हैं. निगम में शामिल होते ही ग्रामीण विकास एंव पंचायती राज शासन में मिलने वाला मनरेगा का रोजगार और अन्य सुविधाएं भी छिन गई. अब ग्रामीण चाहते हैं कि शंभूपुरा को फिर से गांव का दर्जा मिले.

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शंभूपुरा गांव में भीलों और गुर्जर समाज के 150 परिवार है. ग्रामीणों के हितों के लिए काम कर रही हाड़ौती किसान आरक्षण मंच के पदाधिकारियो के अनुसार राज्य व केंद्र सरकार की 700 प्रकार की इंद्रधनुषियो योजना में से एक भी योजना का लाभ इन ग्रामीणों को नहीं मिला जो सोचनीय विषय है. ऐसे में अब जनप्रतिनिधियों को चाहिए कि वह इस गांव की सुध लेकर गांव में विकास में हाथ बढ़ाएं.

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शिक्षा नगरी कोटा की सीमा का विस्तार हुआ तो लोक लुभावने सपने दिखाकर तीन दर्जन से अधिक गांवों को नगरीय सीमा में शामिल किया गया, लेकिन व्यवस्थाओं में सुधार नहीं हो सका. चुनावी साल में मतदान के बहिष्कार का मानस बना रहे इन ग्रामीणों की सुध कब जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधि लेते है.

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