राजस्थान उपचुनाव: आखिर बीजेपी से कहां हुई चूक
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राजस्थान उपचुनाव: आखिर बीजेपी से कहां हुई चूक
नरेंद्र मोदी राहुल के जादू से मछुआरों को बाहर निकाल पाएंगे कि नहीं, यह देखना होगा.

ये सिर्फ तीन सीटों पर हार नहीं है बल्कि अजमेर की 8 और अलवर की 11 विधानसभा सीटों के हिसाब से इसे देखें तो ये 20 सीटें हारने के बराबर है. बता दें कि अजमेर नॉर्थ और अजमेर साउथ सीट से वसुंधरा कैबिनेट के दो मंत्री वासुदेव देवनानी और अनीता भदेल विधायक हैं लेकिन फिर भी यहां कांग्रेस ने बढ़िया प्रदर्शन किया है.

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  • Last Updated: February 1, 2018, 4:22 PM IST
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राजस्थान उपचुनाव में बीजेपी का सूपड़ा साफ़ होना अब तय है. अजमेर और अलवर लोकसभा सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवारों की बढ़त इतनी है कि उनका जीतना तय है तो मांडलगढ़ में कांग्रेस ने जीत दर्ज कर ली है. ये सिर्फ तीन सीटों पर हार नहीं है बल्कि अजमेर की 8 और अलवर की 11 विधानसभा सीटों के हिसाब से इसे देखें तो ये 20 सीटें हारने के बराबर है. बता दें कि अजमेर नॉर्थ और अजमेर साउथ सीट से वसुंधरा कैबिनेट के दो मंत्री वासुदेव देवनानी और अनीता भदेल विधायक हैं लेकिन फिर भी यहां कांग्रेस ने बढ़िया प्रदर्शन किया है.

क्यों हारे अजमेर
बता दें कि सांवरलाल जाट ने 2014 के लोकसभा चुनावों में अजमेर से सचिन पायलट को शिकस्त दी थी. बीजेपी ने सहानुभूति वोटों को टार्गेट बनाकर सांवरलाल जाट के बेटे रामस्वरूप लांबा को मैदान में उतारा. इसके जवाब में पायलट ने भी जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखकर रघु शर्मा को मैदान में उतार दिया.

बता दें कि अजमेर जाट और गुर्जर बहुल क्षेत्र है हालांकि इस इलाके में मुस्लिम, राजपूत, ब्राह्मण, वैश्य और रावत समुदाय से जुड़े लोग भी बड़ी तादाद में रहते हैं. बीजेपी के उम्मीदवार रामस्वरूप लांबा जाट समुदाय से आते हैं वहीं पायलट गुर्जरों के नेता माने जाते हैं. ब्राह्मण और वैश्य बीजेपी के परंपरागत वोटर्स माने जाते हैं लेकिन पायलट ने रघु शर्मा के जरिए इसी वोट बैंक में सेंध लगा दी.
क्यों हारे अलवर


अलवर में बीजेपी की हार के पीछे गाय से संबंधित हिंसा का भी बड़ा हाथ बताया जा रहा है. इसकी वजह से मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण का मौका मिला. दूसरा बड़ा कारण खुद जसवंत सिंह के उस कथित बयान को बताया जा रहा है, जिसमें उन्होंने कहा था कि "हिन्दू हो तो वोट मुझे देना मुस्लिम हो तो कांग्रेस प्रत्याशी कर्ण सिंह को वोट देना." यह विवादित वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. इसकी वजह से भी मुस्लिम वोट एकतरफा पड़े.

दिलचस्प बात यह है कि यहां पर कुल 11 प्रत्याशी मैदान में थे, जिनमें से दो मुस्लिम इब्राहीम खान और जमालुद्दीन भी शामिल हैं, जो निर्दलीय चुनाव लड़ रहे थे. इससे मुस्लिम वोट बंट सकते थे. लेकिन, इब्राहीम खान को सिर्फ 769 और जमालुद्दीन को 1454 वोट मिले हैं. यानी मुस्लिमों ने बिना किसी भ्रम के एक साथ कांग्रेस को वोट डाला. अलवर लोकसभा सीट बीजेपी के महंत चांदनाथ के निधन के बाद खाली हुई थी. यहां बीजेपी ने वसुंधरा सरकार में श्रम एवं नियोजन मंत्री डॉ. जसवंत यादव को उम्मीदवार बनाया था. बीजेपी प्रवक्ता अनिल बलूनी का कहना है कि राजस्थान की हार के बारे में बयान जयपुर से मिलेगा.

आनंदपाल, पद्मावती और गुर्जर आरक्षण
सिर्फ सांप्रदायिकता ही नहीं आनंदपाल एनकाउंटर से नाराज़ राजपूत, गुर्जर आरक्षण से उपजा गुस्सा और पद्मावती विवाद पर वसुंधरा की चुप्पी उनके लिए काफी नुकसानदायक साबित हुई. आनंदपाल एनकाउंटर ने जाट-राजपूतों को आमने-सामने कर दिया लेकिन राज्य सरकार चुप्पी साधे रही. राजस्थान में युवाओं की नाराजगी पर भी बेफिक्री है. 2013 में बीजेपी मैनिफेस्टो में 15 लाख रोजगार का वादा था. 15 लाख तो छोड़िए जो कुछ हज़ार भर्तियां निकली भी तो आरक्षण या पेपर लीक जैसे मामलों के चलते अदालतों में उलझ गई.

पार्टी में जारी कलह ही वसुंधरा को पड़ी भारी
बता दें कि उपचुनावों से ठीक पहले ही राजस्थान सोशल मीडिया पर राज्य संगठन की फूट खुलकर सामने आ गई थी. सोशल मीडिया पर बीजेपी के ही एक गुट ने वसुंधरा के खिलाफ कैंपेन चलाया हुआ था. इस कैंपेन के जरिये वसुंधरा की 'रानी' वाली ठसक को बार-बार निशाना बनाया गया. पार्टी के वसुंधरा विरोधी गुट ने उन्हें बार-बार निशाने पर लिया जिससे बीजेपी का ही वोटबैंक उनसे छिटकता गया. सरकार में मिनिस्टर राजकुमार रिणवां ने नाराज़गी जाहिर करते हुए पहले ही कह दिया था कि इस फालतू की बयानबाजी के चलते अगर हम हार भी जाएं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. उधर विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने भी बागी सुर अपनाते हुए यहां तक कह दिया कि उन्हें वसुंधरा का नेतृत्व स्वीकार नहीं है. तिवाड़ी ने अपनी ही सरकार से रिफाइनरी पर श्वेत पत्र तक मांग लिया.

नाकाम सरकार का ठप्पा
साल 2013 में कांग्रेस के भ्रष्टाचार और आलसी रवैये से तंग आकर लोगों ने बीजेपी को वोट दिया था. हालांकि काम के मामले में वसुंधरा सरकार पिछली सरकार से भी आगे ही नज़र आई है. राज्य में डॉक्टरों की हड़ताल के मामले को ही लें तो राज्य सरकार की जिद के चलते 25 से ज्यादा मरीजों को जान गंवानी पड़ी. स्थिति को संभालने की जगह हेल्थ मिनिस्टर कालीचरण सराफ असंवेदनशील बयान देते रहे जिससे हालात और ख़राब हो गए. इतनी मौतों के बावजूद भी सीएम की तरफ से किसी तरह का दखल देखने को नहीं मिला.

मामला तब और बिगड़ गया जब सरकार भ्रष्ट लोकसेवकों को बचाने के लिए कानून लेकर आ गई. इसे काला कानून कहा गया क्योंकि ये आरोपी लोकसेवकों को तो बचा ही रहा था, न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर भी प्रतिबंध लगा रहा था. मामला बढ़ने पर इस प्रस्ताव को सेलेक्ट कमेटी को सौंपकर मामला रफा-दफा किया गया.

कथित गौरक्षकों की गुंडागर्दी पर पीएम मोदी भी आगे आकर बयान देने के लिए मजबूर हो गए लेकिन वसुंधरा सरकार इस पर लगातार चुप्पी ही बनाए रही. पहलू खान, उमर खान को जान से हाथ धोना पड़ा लेकिन राज्य सरकार ने निंदा करना भी ज़रूरी नहीं समझा. बीते साल जयपुर, सीकर, भीलवाड़ा, बाड़मेर, उदयपुर, राजसमंद जैसी जगहों पर सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं सामने आईं और पूरे साल जम्मू-कश्मीर से भी ज्यादा बार राजस्थान के इलाकों में इंटरनेट बंद करना पड़ा.
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