यादें: न जाने क्यों बहुत अखर रहा है, इरफान खान का जाना
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यादें: न जाने क्यों बहुत अखर रहा है, इरफान खान का जाना
आज सुबह जब उनकी तबियत ज़्यादा खराब हुई तो उन्हें कोकिलाबेन अस्पताल ले जाया गया जहां वे ज़िंदगी की ये जंग हार गए.

जो इरफान (Irfan) ज़िन्दगी में कभी किसी मुश्किल से नही हारे वो मां के जाने के बाद इतना क्यों टूट गए कि सम्भल ही नहीं पाए.  

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जयपुर. आज दोपहर से थोड़ा पहले जब ये उड़ती उड़ती सी खबर आई कि इरफान खान (Irfan Khan) इस दुनिया मे नहीं रहे, तो ऐसा लगा जैसे ये खबर झूठी होगी. कुछ देर में स्पष्टीकरण आ जायेगा. इरफान खान ने अपनी ज़िंदगी में बहुत संघर्ष किया है, वो मौत से इतनी आसानी से हार मानने वाले नही हैं. अभी 3 दिन पहले ही तो इरफान की वालिदा का इंतेक़ाल हुआ है.  वो अपनी माँ की अंतिम यात्रा में भी शामिल नहीं ही पाए थे.  ये सब ख्यालात ज़ेहन में इधर से उधर चल रहे थे कि सुजीत सरकार का ट्वीट आ गया और जो खबर झूठी होने की मैं मन ही मन दुआ कर रहा था, वो सच्ची निकली. इरफान सच मे इस दुनिया को अलविदा कह गए.

आज सुबह जब उनकी तबियत ज़्यादा खराब हुई तो उन्हें कोकिलाबेन अस्पताल ले जाया गया जहां वे ज़िंदगी की ये जंग हार गए.

खबर आने के साथ ही इरफान खान के भाई इमरान खान और सलमान खान को कॉल लगाया. दोनों ही भाई ने कॉल नहीं उठाया.  फिर कज़िन सुलेमान को कॉल लगाया तो वो भी जवाब नहीं दे रहे थे. धीरे-धीरे सोशल मीडिया पर मैसेजेस की बाढ़ सी आ गई.  मुझे लगा दुनिया मे ज़्यादातर लोग सलमान, शाहरुख, आमिर, या अक्षय अजय के ही फैंस होंगे. इरफान जैसे एक्टर को पसंद करने वाले मेरी जैसी सोच के बहुत कम लोग होंगे. लेकिन, सोशल मीडिया पर जब इरफ़ान के लिए लोगों के जज़्बात देखे तो समझ आया कि वो यूं ही नहीं, इंटरनेशनल एक्टर थे.




मेरी इरफान खान से कई बार मुलाकात हुई.  ज़्यादातर मुलाकातें मुख़्तसर ही रहीं. लेकिन, साल 2009 में जवाहर कला केंद्र पर आयोजित एक एक्टिंग वर्कशाप में उनसे काफी लंबी मुलाकात रही.  उसके बाद बातचीत और मुलाकात का सिलसिला जारी रहा.  लाइफ ऑफ पाई, स्लम डॉग मिलेनियर, जुरासिक पार्क, और स्पाइडर मैन जैसी फिल्मों में इरफान खान ने ख्याति पाने के बाद काम किया.  लेकिन इस चकाचौंध के पीछे उनके उस संघर्ष को समझना बहुत ज़रूरी है, जो शायद किसी ने नहीं देखा.

आमतौर पर फ़िल्म इंडस्ट्री में मौजूद फिल्मी सितारों का बहुत मजबूत बैक ग्राउंड रहा है, लेकिन इरफान बिना किसी सपोर्ट लंबे अरसे तक संघर्ष करते रहे.  हालांकि टोंक के शाही खानदान से ताल्लुक रखने वाले इरफान खुद टोंक के साहबज़ादे थे. अमीरिया खानदान से इनका ताल्लुक था. लेकिन, वालिद के इन्तेक़ाल के बाद घर के बड़े बेटे के रूप में एक ओर घर की ज़िम्मेदारियों को संभालना था, तो दूसरी ओर इंडस्ट्री में अपनी किस्मत आजमाने के लिए पहाड़ से संघर्ष से टकराना था. इरफान की वालिदा ने उन्हें संघर्ष की इजाज़त दी और इरफान लंबे संघर्ष पर निकल गए.



NSD में खुद की प्रतिभा को साबित करने के बाद भी इरफान खुद को साबित करने के लिए दर-दर भटकते रहे मुश्किलों से टकराते रहे.  1986 में कथा सागर और 1988 में भारत एक खोज से स्ट्रगल शुरू करने वाले इरफान ने लॉबिंग वाली इस इंडस्ट्री में आखिरकार खुद को साबित किया.  फिल्मों में एंट्री 1988 में सलाम बोम्बे से कर ली थी, लेकिन उन्होंने अपनी असली पहचान "दी वॉरियर' से बनाई.  इस ब्रिटिश फ़िल्म को बाफ्टा अवार्ड. मिला उसके बाद फिल्मों की कतार लग गयी और इरफान ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

टीवी पर इरफान ने मानो या मानो, चंद्रकांता, दी ग्रेट मराठा, जैसी सीरीज़ भी की.  इरफान हर बार किसी नए, मुश्किल और मजबूत

किरदार को निभाने के लिए तड़पते रहते थे.  मक़बूल, से लेकर नेमसेक, लंचबॉक्स, पानसिंह तोमर,  मदारी, हिंदी मीडियम, ऐसी फिल्में हैं जो हर बार देखने पर नई फ़िल्म लगती है.  इरफान खान में क़िरदार को जीने का जो सलीका था वो किसी और के बस की बात नही.  ऐसे अदाकारों को देख कर लगता है कि वाकई अदाकारी इतनी सहज भी हो सकती है जो एक्टिंग लगे ही नही.



खैर, जब से इरफान खान के बीमार होने की बात सामने आई थी, तब से ही कभी कुछ साफ समझ ही नही आया. उन्हें हुआ क्या, और दुनियाभर में बेहतर से बेहतर इलाज की कोशिशों के बावजूद उनकी सेहत के सुधार क्यों नहीं हुआ.  उनके जाने की असली वजह चाहे कुछ भी रही हो, लेकिन एक बात साफ है कि उनकी ज़िंदगी मे मां का अलग ही मुक़ाम रहा और 3 दिन पहले जब उनकी मां सईदा बेग़म ने इस दुनिया को अलविदा कहा तो इरफान लॉकडाउन की मज़बूरियों के चलते उनके कफ़न-दफन में भी शरीक न हो सके. इसी वजह से मां के जाने की खबर के बाद से ही उनकी तबीयत बहुत ज़्यादा खराब हुई और वो इस दुनिया को अलविदा कह गए.

हालांकि हमेशा के लिए इस दुनिया मे कोई नही आता, लेकिन पता नही क्यों अभी इरफान खान की अदाकारी में बहुत कुछ देखने की ख्वाहिशें थी.  ऐसा लगता था कि अभी इरफान का बेस्ट किरदार सामने आना बाकी है. लेकिन, अल्लाह को शायद कुछ और ही मंज़ूर था.  रमज़ान के पाक महीने में इंतेक़ाल होना भी काफी अहम माना जाता है. इरफान को राजस्थान की मिट्टी से निकले एक ऐसे अदाकार के रूप में हमेशा याद किया जाएगा, जिसने पूरी दुनिया पर अमिट छाप छोड़ी.

अलविदा इरफ़ान!

 

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