तीर्थराज पुष्कर, कहते हैं यहां खुद ब्रह्मा करते हैं निवास, पहाड़ों की गोद में बसी है ये नगरी
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तीर्थराज पुष्कर, कहते हैं यहां खुद ब्रह्मा करते हैं निवास, पहाड़ों की गोद में बसी है ये नगरी
पुष्कर से जुड़ी कई मान्यताएं हैं. (Pic Credit- Anil Sharma)

पुष्कर में होने वाला मेला, ऊंट की सवारी, गुलाब की खेती और मालपुवे की मिठास इसे अलग पहचान देती है. सिर्फ पुष्कर में ब्रह्मा जी की पूजा होती है.

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पुष्कर. तीर्थ नगरी पुष्कर अरावली पर्वत श्रृंखला की गोद में बसा राजस्थान का ऐतिहासिक एवं धार्मिक शहर पुष्कर जिसमें प्रकृति की हर वो खूबी है जो दुनिया में अलग-अलग जगह मिलती है. ये तीर्थ धार्मिक और पर्यटन की दृष्टि से भी अलग पहचान रखता है. जहां चारों ओर अरावली पर्वत माला है, तो घने जंगल भी यहां देखने को मिलेंगे. तो वहीं राजस्थान (Rajasthan) की पहचान जाने जाने वाले बालू मिट्टी के रेतीले धोरे भी एक पवित्र सरोवर (तालाब) जो कि लोगों की आस्था का केंद्र है. ये हिंदुओं के सबसे बड़े तीर्थों में माना जाता है.

सम्राट पृथ्वीराज चौहान की नगरी अजमेर से लगभग चौदह किलोमीटर पश्चिम में बसा है पुष्कर जहां ब्रह्मा जी का इकलौता मंदिर है. यहां एक पावन पुष्कर झील है. मान्यता है कि पुष्कर शब्द की उत्पत्ति पुष्प और कर के मेल से हुई है. यहां पर ईश्वरीय शक्ति द्वारा एक पुष्प अपने हाथों से पृथ्वी पर गिराया गया था. जिस स्थान पर वह गिरा उस स्थान पर भगवान ब्रह्मा द्वारा कार्तिक एकादशी से पूर्णिमा तक भव्य यज्ञ का आयोजन करवाया. उस स्थान पर आज पुष्कर झील है. इसलिए इस पवित्र क्षेत्र का नाम पुष्कर पड़ा.

लगता है भव्य मेला



इसी पुष्कर नगरी में प्रतिवर्ष एक भव्य मेले का आयोजन कार्तिक एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक होता है. ऐसी मान्यता है इन पांच दिनों में हुए यज्ञ के दौरान सृष्टि के सभी देवी-देवता इस तीर्थ में मौजूद रहे है जिससे इस पवित्र सरोवर में पांच दिन तक पंचतीर्थ स्नान होता है. इसमें हर साल लाखों की संख्या में श्रदालु देश ही नहीं बल्कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आते हैं. इन पांच दिनों के दौरान आस्था की डुबकी लगाने लोग पुष्कर आते हैं, इसलिए इस मेले का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है. ये पवित्र भूमि समुद्र तल से लगभग 2389 फुट की ऊंचाई पर स्थित है.
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पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर.


पुष्कर से जुड़ी कई मान्यता

पुष्कर के उद्भव का वर्णन पद्मपुराण में मिलता है. माना जाता है कि ब्रह्मा जी ने यहां आकर यज्ञ किया था. विश्व के प्रमुख तीर्थ स्थानों में पुष्कर ही एक ऐसा स्थान है जहां ब्रह्मा का मंदिर है. यहां ब्रह्मा जी के अलावा सावित्री, बदरीनारायण, वाराह, रंगजी और शिव अटमटेषंवर महादेव के मंदिर भी विशेष महत्व रखते हैं. पुष्कर झील के किनारे अनेकों घाट बने हुए हैं जो राजपूताना के देशी राज्यों के धनवान व्यक्तियों ने बनवाए थे. पुष्कर का वर्णन रामायण में भी हुआ है. सर्ग 62 श्लोक 28 में विश्वामित्र के यहां पर तप करने का उल्लेख मिलता है. सर्ग 63 के श्लोक 15 के अनुसार मेनका पुष्कर के पावन जल में स्नान करने के लिए आई थी. सांची स्तूप के एक लेख में ई. पू. दूसरी शताब्दी में बौद्ध भिक्षुओं ने यहां आकर दान किया था. राजा नहपाण के दामाद उषमवत्त ने पुष्कर में एक गांव सहित तीन हजार गाय दान दी थी. पुष्कर के प्राचीन लेखों से भी इस पवित्र नगरी के महत्व की जानकारियां मिलती है.

पुष्कर तीर्थों का मुख माना जाता है. जिस प्रकार प्रयाग को तीर्थराज कहा जाता है उसी प्रकार इस तीर्थ को पुष्करराज कहा जाता है. पुष्कर की गणना पंचतीर्थों पंच सरोवर में की जाती है. ये पंच सरोवर है. ज्येष्ठ पुष्कर (प्रधान) मध्य पुष्कर (बूढा़) तथा कनिष्क पुष्कर (कानस) ज्येष्ठ पुष्कर के देवता ब्रह्मा जी, मध्य पुष्कर के देवता विष्णु था कनिष्क पुष्कर के देवता शिव हैं. पुष्कर का पवित्र मंदिर ब्रह्मा जी का है जो कि पुष्कर सरोवर से थोड़ी ही दूरी पर स्थित है. मंदिर में चतुर्भुज ब्रह्मा जी की दाहिनी ओर सावित्री जी और बायी ओर गायत्री जी का मंदिर है. वही ब्रह्मा के दो द्वारपाल है एक तरफ हाथी पर बैठे धनपति कुबेर तो दूसरी ओर इन्द्र भगवान जिनके दर्शन मात्र से मनोकामना पूर्ण होती है.

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पुष्कर नगरी में प्रतिवर्ष एक भव्य मेले का आयोजन कार्तिक एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक होता है.


पुष्कर मेले की अनोखी छटा

मात्र पुष्कर ही एक ऐसी जगह है जहां आज भी ब्रह्मा जी की पूजा होती है. पुष्कर में एक विशाल मेले का आयोजन राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की देखरेख में होता है. कला-संस्कृति एवं पर्यटन विभाग इस अवसर पर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय लोक कलाकारों के द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम करवाता है. देश विदेश के लाखों पर्यटक मेले में शामिल होने आते हैं. इस मेले की प्रमुख विशेषता ये है कि इसे पशु मेले के नाम से भी जाना जाता है. इस मेले में विभिन्न प्रकार की नस्लों के घोड़े, ऊंटों का क्रय विक्रय होता है. रेत के विशाल धोरों में ये मेला अनोखी छटा बिखराता है. पुष्कर ऊंट की सवारी, गुलाब की खेती और मालपुवे की मिठास के लिये भी जाना जाता है. इस तीर्थ की यात्रा न करें तो अन्य तीर्थों की यात्रा अधूरी मानी जाती है.
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