अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट: कांग्रेस में कब खत्म होगी बुजुर्ग और युवा नेताओं की जंग?
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अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट: कांग्रेस में कब खत्म होगी बुजुर्ग और युवा नेताओं की जंग?
कांग्रेस ने सचिन पायलट को बर्खास्त करने के बाद उनके करीबियों पर भी कार्रवाई की है (न्यूज़ 18 ग्राफिक्स)

राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई ने कहा, सचिन पायलट को लेकर परेशान बीजेपी को बताना चाहिए कि यूपी में उसके डिप्टी सीएम की कितनी चलती है? सचिन पायलट 40 साल की उम्र में डिप्टी सीएम बना दिए गए, वे केंद्र में मंत्री रह चुके हैं. आखिर उन्हें पार्टी से क्या चाहिए?

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नई दिल्ली. पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया और अब सचिन पायलट. सीएम पद न मिलने की वजह से कांग्रेस के दो युवा नेता पार्टी छोड़ गए. कांग्रेस के अंदर ओल्ड बनाम यंग का संघर्ष जारी है. मान-मनव्वल के बाद जब बात नहीं बनी तो सचिन पायलट (Sachin Pilot) और उनके समर्थक मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया गया है. अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) का रास्ता साफ कर दिया गया. फिलहाल, मध्य प्रदेश और राजस्थान में पार्टी के रुख से साफ हो रहा है कि वो फिलहाल बीजेपी की तरह अपने बुजुर्ग नेताओं को साइडलाइन करने के पक्ष में नहीं है. ऐेसे में सवाल ये है कि आखिर कांग्रेस (Congress) में दो जनरेशन के नेताओं के बीच चल रही यह रस्साकशी कब खत्म होगी. कांग्रेस युवा नेताओं के हाथ में कमान देने से बच क्यों रही है?

‘24 अकबर रोड’ के लेखक रशीद किदवई का कहना है कि कांग्रेस में ओल्ड बनाम यंग की जंग मीडिया का क्रिएशन है. कई बुजुर्ग नेता कांग्रेस में बहुत अच्छे से काम कर रहे हैं. जहां तक ज्योतिरादित्य सिंधिया (jyotiraditya scindia) और सचिन पायलट की बात है तो इन दोनों को राजनीति विरासत में मिली है न कि अपनी मेहनत से. किसी आम कार्यकर्ता को सांसद बनने में न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं जबकि ये दोनों तो सीधे सांसद बन गए थे. 40 साल की उम्र में वे डिप्टी सीएम बन गए, वे केंद्र में मंत्री रह चुके हैं. आखिर उन्हें पार्टी से क्या चाहिए?

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बीजेपी के डिप्टी सीएम की कितनी सुनवाई होती है

जहां तक बीजेपी (BJP) नेता सचिन पायलट की सुनवाई न होने की बात कर रहे हैं तो उन्हें अपने राज्यों में भी यह बात लागू करनी चाहिए. यूपी में सीएम योगी आदित्यनाथ के सामने डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की कितनी चलती है. क्या उनकी सुनवाई होती है? चुनाव प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर मौर्य के नेतृत्व में लड़ा गया लेकिन उन्हें सत्ता नहीं मिली. कोई भी पैमाना सिर्फ कांग्रेस के लिए फिट करना ठीक नहीं है. सचिन पायलट के पास तो डिप्टी सीएम के साथ-साथ प्रदेश अध्यक्ष का भी पद था. कांग्रेस में तो बुजुर्ग और युवा दोनों नेताओं को तवज्जो मिल रही है.

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कांग्रेस की तरक्की में दुविधा बन रही बाधा

हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक आलोक भदौरिया इस तर्क के सहमत नहीं दिखते. उनका कहना है कि राजस्थान का राजनीतिक संकट (Rajasthan political crisis) भी मध्य प्रदेश वाले कारणों से ही उपजा है. कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को लेकर जो दुविधा है वही राज्यों तक फैली हुई है. कांग्रेस को कौन चला रहा है सोनिया गांधी, राहुल गांधी या फिर प्रियंका... इसे लेकर कोई स्पष्टता नहीं है. अगर बीजेपी के मुकाबले भविष्य की पार्टी तैयार करनी है तो क्या पुरानी पीढ़ी पर दांव लगाकर चल सकते हैं? शायद नहीं. दरअसल, यह वक्त नई पीढ़ी को कमान देने का है, जिसके लिए कांग्रेस राजी नहीं दिख रही है.



कांग्रेस के बुजुर्ग नेताओं की आरामतलबी से नुकसान

बुजुर्ग नेताओं की आरामतलबी की वजह से कांग्रेस ने ज्यादा सीट होने के बावजूद गोवा की सत्ता नहीं हासिल कर पाई. रणनीति की दुविधा की वजह से ही पहले उसने कर्नाटक को गंवाया और फिर मध्य प्रदेश को. अब राजस्थान की भी सियासी नैया डगमगाती दिख रही है. अगर जमीनी नेताओं की राय को दरकिनार कर राज्यसभा वाले घिसे-पिटे रणनीतिकारों से ही कांग्रेस को चलाने की कोशिश होगी तो पार्टी नुकसान में ही रहेगी.
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