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नाथद्वारा में बालस्वरूप श्रीकृष्ण को रात 12 बजे दी जाएगी तोपों से 21 बार सलामी

करीब 348 वर्ष पहले ब्रज से नाथद्वारा पधारे थे कान्हा

करीब 348 वर्ष पहले ब्रज से नाथद्वारा पधारे थे कान्हा

Shri Krishna Janm Mahotsav : भारत के वैभवशाली प्रधान तीर्थस्थलों में वल्लभ संप्रदाय प्रधान पीठ राजसमंद जिले का नाथद्वारा अग्रणी है. यहां होने वाले उत्सवों में जन्माष्टमी और नंद महोत्सव का अलग अंदाज और महत्व है. नाथद्वारा शहर की संस्कृति पर ब्रज का प्रभाव है. इसका बड़ा कारण प्रभु श्रीनाथजी है.

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अल्केश सनाढ्य

नाथद्वारा (राजसमन्द). भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी श्रीकृष्ण जन्मोत्सव देशभर में अपने-अपने ढंग से मनाया जाता है. लेकिन श्रीजी के धाम में अलग स्वरूप है. देश-विदेश से लाखों लोग श्रीजी के दर्शन करने नाथद्वारा आ चुके हैं. पहले लोग दर्शनों के लिए घोड़े और बैलगाड़ी से भी आते थे. प्रभु करीब 348 वर्ष पहले ब्रज से नाथद्वारा पधारे थे. तभी से सिंहाड़ का नाम नाथद्वारा हो गया.

इतिहास : जहां रथ का पहिया धंसा, वहीं बना मंदिर
औरंगजब के शासनकाल में हिंदू मंदिरों को नष्ट करने के भय से श्रीकृष्ण विग्रह श्रीनाथजी को सुरक्षा की दृष्टि से ब्रज से विहार कराया. विक्रम संवत 1726 अश्विन शुक्ल 15 तदनुसार 10 अक्टूबर 1669 ईस्वी को प्रभु ने ब्रज से विहार किया. विक्रम संवत 1728 कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा के दिन प्रभु मेवाड़ पहुंचे. महाराणा राजसिंह ने प्रभु की आगवानी की. राजनगर से आगे तत्कालीन सिंहाड़ गांव में पीपल के नीचे रात्रि विश्राम हुआ. दूसरे दिन सुबह प्रस्थान के समय रथ का पहिया धंस गया. ज्योतिषियों ने कहा प्रभु यहां विराजना चाहते हैं. राणा की आज्ञा से देलवाड़ा नरेश ने महाप्रभु हरिरायजी की देखरेख में छोटा सा मंदिर बनवा कर आसपास की जमीन पट्टे पर दी गई.

श्रीनाथजी मूर्ति की खासियत

गिरिराज पर्वत पर विक्रमाब्द 1466 को प्रातः काल सूर्योदय की प्रथम रश्मि के साथ उध्वभुजा के दर्शन होते हैं. वहीं पर उध्वभुजाजी ने 69 वर्ष तक अनेक सेवाएं स्वीकार कीं. इसके बाद विक्रमाब्द 1535 वैशाख कृष्ण एकादशी गुरुवार को मध्यान्ह काल में प्रभु के मुखारबिंद का प्राकट्य हुआ. अन्योर ग्राम के निवासी सद्द पांडे की गाय स्वतः ही प्रतिदिन मुखारबिंद पर दूध की धार छोड़ आती थी. फाल्गुन शुक्ल एकादशी शुक्रवार वि. 1549 को महाप्रभु श्री वल्लभ के आन्योर व गोवर्धन पर्वत पधारने पर गिरिराज से श्रीकृष्ण स्वरूप श्रीनाथजी का प्राकट्य हुआ.
श्रीनाथजी में गिरिराजजी के समान ही रक्त आभा

आनंद स्वरूप श्रीनाथ का वर्ण श्याम है. गिरिराजजी के समान ही उनमें रक्त आभा है.उध्वभुजा गिरिराज गोवर्धन के भाव से है. जहां प्रभु खड़े हैं, वहां की पीठिका गोल तथा उपर चौकोर है. पीठिका में उध्वभुजा की तरफ दो मुनि हैं. नीचे एक सर्प, नृसिंह उसके बाद दो मयूर हैं. दूसरी तरफ उपर एक मुनि उसके बाद मेष, सर्प तथा दो गाय हैं. श्री मस्तक पर पीठिका में फल लिए हुए एक शुक (तोता) है.

नाथद्वारा में ऐसे मनाया जाता है जन्माष्टमी पर्व

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का नाथद्वारा में अपना स्वरूप है. पर्व पर सुबह 4 बजे शंखनाद होते हैं. आधे घंटे बाद मंगला दर्शन खुलते हैं. पर्व पर ठाकुरजी धोती-उपरना धारण करते हैं. इसके बाद पंचामृत से स्नान होता है. श्री मदन मोहनलाल या बाल कृष्णलाल जी पंचामृत स्नान करते हैं. लेकिन जन्माष्टमी विशिष्ट पर्व होने से श्रीनाथजी सहित तीनों स्वरूप पंचामृत से सराबोर होते हैं. ये दर्शन साल में एक बार ही होते हैं.रात 9 बजे जागरण के दर्शन खुलते हैं. करीब 11:30 बजे श्रीजी के सम्मुख टेरा आता है (दर्शन बन्द होते है) निश्चित समय जन्म होने का घण्टानाद होता है और ‘मोतीमहल’ की प्राचीर से दो-तीन बार जन्म होने की सूचना स्वरूप बिगुल बजाई जाती है.

प्रभु को 2 तोपों से 21 बार सलामी देते हैं

जन्माष्टमी पर कृष्ण जन्म के दौरान रिसाला चौक में 21 तोपों की सलामी दी जाएगी. श्रीनाथजी मंदिर में जन्माष्टमी के दिन कृष्ण जन्म होने पर 2 तोप से 21 बार सलामी दी जाती है. जन्माष्टमी पर रात 12 बजे कृष्ण जन्म होते ही 21 तोपों की सलामी देने की परंपरा है. इतिहासकार गिरीश विद्रोही बताते हैं कि करीब 400 वर्ष पुरानी दो तोप का इस्तेमाल किया जाता है. नाथद्वारा के श्रीजी मंदिर में 348 साल से लगातार परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है. हालांकि इस बार आम श्रद्धालु तोपों को सलामी देते हुए नहीं देख पाएंगे.

जन्मोत्सव : पंचामृत से कराते हैं स्नान

जन्माष्टमी के दिन शयन आरती के बाद अनेक खिलौनों से युक्त से साज से, प्रभु श्रीनाथजी को मणिकोठा में खेलाया जाता है है. कीर्तनकार ‘डोल-तिबारी’ में बधाई के पद गाते हैं. मंदिर में जन्म होने के साथ ही प्रभु बालकृष्ण लालजी को पुनः पंचामृत से स्नान कराते हैं. इसके बाद चन्दन से स्नान करा श्रीनाथजी की गोद में पधरा दिया जाता है. फिर दोनों स्वरूपों के तिलक अक्षत चढ़ाकर माला धारण कराते हैं और ‘महाभोग’ आता है. इसके साथ ही श्रीकृष्ण के जन्म के बाद पंजरी का भोग लगाया जाता है. पंजरी सोंठ, अजवाईन, धनिया, काली मिर्च, सौंफ सहित अन्य चीजों को पीसकर घी मिलाकर बनाई जाती हैं. पंजरी स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उत्तम है. इसलिए भक्त इस प्रसाद को साल भर घर में रखते हैं.

मुखिया बावा बनते हैं नंद-यशोदा

जन्माष्टमी के दूसरे दिन नंदोत्सव पर श्रीजी के बड़े मुखिया नंदबाबा और नवनीत प्रियाजी के मुखिया यशोदा मैया का स्वरूप धारण करते हैं. चार गोपियां व चार ग्वाल बने हुए व्यक्तियों के साथ ‘छठी के कोठे’ में जाकर छठी पूजन करते हैं. उस समय यह छंद गाया जाता है- धन्य दिवस, धन रात, धन यह पहर घरी. धन-धन महरजू की कूंख सुहाग भरी. वहीं छठ पूजन के बाद दर्शन खुलते हैं. आरती वाली गली में रखी दही-दूध की नांदें रतन चौक, कमल चौक, धोली पटिया, गोवर्धन पूजा के चौक आदि स्थानों में रखी जाती हैं. इनमें हल्दी मिश्रित दूध-दही लेकर ग्वाल-बाल दर्शनार्थियों पर छांटते है. हालांकि मंदिर के परंपरा का निर्वाहन किया जाएगा.

नंद महोत्सव पर धराएंगे स्वर्ण पलना

अष्टमी के दिन जन्म के दर्शन के पूर्व स्वर्ण पलना ‘गहनाघर’ से कृष्ण ‘मणिकोटा’ में पधरा दिया जाता है. इसमें स्वर्ण झुमके लटके होते हैं. इसके साथ सैकड़ों खिलौने, हाथी, घोड़े और गायें भी रखी जाती हैं. यह व पलना नंद महोत्सव के दिन श्रीजी के सम्मुख रखा जाता है. उसमें नवनीतप्रियाजी, श्रीनाथजी के मंदिर में पधार कर विराजते हैं. पंचामृत स्नान दर्शनों में अष्टछाप-कवियों के मंगल-बधाई सूचक पद गाए जाते हैं. प्रत्येक व्यक्ति पंचामृत स्नान के दर्शनों का लाभ उठाना चाहता है.

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