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रणथम्भौर की लेपर्ड कर रही झुंझुनूं लेपर्ड सफारी को आबाद, अब तक भेजी गई तीन मादा

रणथम्भौर टाइगर रिजर्व में लेपर्ड.

रणथम्भौर टाइगर रिजर्व में लेपर्ड.

झुंझुनूं में वाइल्ड लाइफ पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार और वन विभाग की ओर से खेतड़ी अभ्यारण्य और मनसा माता कं ...अधिक पढ़ें

    गजानंद शर्मा/सवाई माधोपुर. राजस्थान में वाइल्ड लाइफ के लिए रणथम्भौर मील का पत्थर साबित हुआ है.या यूं कहे कि राजस्थान में वाइल्ड लाइफ की जननी रणथम्भौर है तो कोई अतिशोक्ति नहीं होगी. एक ओर से प्रदेश के सभी टाइगर रिजर्व रणथम्भौर के बाघ-बाघिनों से आबाद है. वहीं अब रणथम्भौर के लेपर्ड भी प्रदेश के दूसरे जंगलों को आबाद करने में अपना योगदान दे रहे हैं. दरसअसल राज्य सरकार झुंझुनूं में वाइल्ड लाइफ ट्यूरिज्म को बढ़वा देने के लिए वहां पर लैपर्ड रिजर्व को विकसित करने का काम किया जा रहा है. राज्य सरकार की जल्द ही झुंझुनूं लेपर्ड सफारी को शुरू करने की मंशा है. जिसके चलते रणथम्भौर से लेपर्ड शिफ्ट किए जा रहे है.

    वर्तमान में रणथम्भौर में 120 से अधिक पैंथर!
    रणथम्भौर में लेपर्ड की संख्या का कोई सटीक आंकडा नहीं है. इसका एक कारण यह है कि रणथम्भौर में इनकी आधिकारिक रूप से गणना नहीं कराई जाती है, लेकिन सूत्रों की माने तो रणथम्भौर में बाघों के साथ-साथ लेपर्ड की संख्या में भी लगातार इजाफा हो रहा है. वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार रणथम्भौर में 2004 में रणथम्भौर में राजस्थान के सर्वाधिक 83 लेपर्ड थे. उस समय राजस्थान में 550 लेपर्ड थे. 2007 में रणथम्भौर में लेपर्ड की संख्या बढ़कर 100 से अधिक हो गई. 2010 में बढ़कर यह संख्या 130 तक जा पहुंची. 2014 में लेपर्ड की संख्या घटकर 113 रह गई. हालांकि वर्तमान में वन विभाग के पास रणथम्भौर में लेपर्ड की संख्या की पुख्ता जानकारी नहीं है, लेकिन सूत्रों की माने तो वर्तमान में रणथम्भौर में 120 से अधिक पैंथर विचरण कर रहे हैं.

    रणथम्भौर से तीन मादा लेपर्ड को झुंझुनूं में छोड़ा
    रणथम्भौर से लेपर्ड को झुंझुनूं छोड़े जाने सेपहले वन विभाग की ओर से रणथम्भौर से रेस्क्यू किए जाने वाले लेपर्ड को रणथम्भौर के ही दूसरे डिवीजन करौली के कैलादेवी अभयारण्य में छोड़ा जा रहा था. वन विभाग की ओर से करौली के जंगल को लेपर्ड के लिए उपयुक्त माना जा रहा था. अब वन विभाग औरसरकार की ओर से करौली, धौलपुर औरभरतपुर के वन क्षेत्र को मिलाकर टाइगर रिजर्व बनाने की तैयारी की जा रही है. इसी के साथ ही रणथम्भौर से कैलादेवी अभयारण्य तक प्राकृतिक कॉरिडोर होने के कारण भी यहां स्वत: ही पैंथर व अन्य वन्यजीवों की आवाजाही बनी रहती है. जिसके चलते वन विभाग अब लेपर्ड को झुंझुनूं छोड़ रहा है. रणथम्भौर के जंगल से बाहर निकलकर आबादी वाले इलाकों में आने वाली मादा लेपर्ड को झुंझुनूं ले जाकर छोड़ा जा रहा है. अब तक रणथम्भौर से तीन मादा लेपर्ड को झुंझुनूं में छोड़ा जा चुका है.

    इनका यह कहना
    रणथम्भौर के सीसीएफ सेडूराम यादव का कहना है कि झुंझुनूं में लेपर्ड सफारी पार्क को विकसित किया जा रहा है.लेकिन यहां वर्तमान में मादा लेपर्ड की संख्या कम है. ऐसे में रणथम्भौर से रेस्क्यू किए गए मादा लेपर्डको उच्च अधिकारियों के निर्देश पर झुंझुनूं शिफ्ट किया जा रहा है. अब तक रणथम्भौर से तीन मादा लेपर्ड झुंझुनूं भेजी गई है.

    खेतड़ी अभयारण्य और मनसा माता कंजर्वेशन रिजर्व को बनाया जा रहा लेपर्ड सफारी पार्क
    जानकारी के अनुसार अभ्यारण्य में लेपर्ड की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है.ऐसे में यहां भ्रमण पर आने वाले पर्यटकों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है. इसको देखते हुए यहां पर वाइल्ड लाइफ पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार औरवन विभाग की ओर से खेतड़ी अभ्यारण्य और मनसा माता कंजर्वेशन रिजर्व को मिलाकर प्रदेश में एक ओर लेपर्ड सफारी पार्क विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है. गौरतलब है कि वर्तमान में जयपुर के झालाना में लेपर्ड रिजर्व है.

    Tags: Rajasthan news, Sawai madhopur news

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