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राजस्थान: शिव तांडव में यहां गिरे थे माता सती के अधर, दर्शन मात्र से दूर होते हैं कष्ट

राजस्थान: शिव तांडव में यहां गिरे थे माता सती के अधर, दर्शन मात्र से दूर होते हैं कष्ट

अर्बुदा देवी मंदिर माउंटआबू से 3 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर स्थित है.

अर्बुदा देवी मंदिर माउंटआबू से 3 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर स्थित है.

Katyayani Puja today : नवरात्र का आज छठा दिन है. आज नवदुर्गा के नौ रूपों में मां कात्यायनी की पूजा होती है. राजस्थान के माउंटआबू में स्थित अर्बुदा देवी का मंदिर दुर्गा के नौ रूपों में से कात्यायनी का रूप है, जिसकी पूजा नवरात्र के छठवें दिन होती है. यह अर्बुदा देवी, अधर देवी, अम्बिका और कात्यायनी देवी के नाम से भी प्रसिद्ध है. अर्बुद पर्वत पर मां अर्बुदा देवी का मंदिर देश की 51 शक्तिपीठों में से एक है.

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    सिरोही. अर्बुदा देवी (Arbudadevi) आबू की अधिष्ठात्री देवी हैं. अर्बुदा देवी के बारे में यह भी कहा जाता है कि नवरात्रि के दौरान माता के सिर्फ दर्शन करने से ही भक्तों को सारे दुखों से मुक्ति मिल जाती है. नवरात्र के पूरे नौ दिनों में माता के मंदिर में भक्तों की भीड़ बनी रहती है. नवरात्रि (Navratri) के छठवें दिन मां अर्बुदा यानि कात्यायनी (Katyayani) के दर्शन करने के लिए भक्तों की भीड़ जमा होने लगती है. ऐसी मान्यता है कि शिव तांडव (Shiv Tandav) में यहां सती मां के अधर गिरे थे.

    दरअसल, अर्बुदा का अपभ्रंश होकर इसे आबू कहा जाने लगा, जिसे बाद में पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण माउंटआबू नाम दिया गया. अर्बुदा देवी मंदिर माउंटआबू से 3 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर स्थित है. समुद्र तल से साढ़े पांच हजार फीट ऊंचा अर्बुद पर्वत यानि अर्बुदांचल पर अर्बुदा देवी का मंदिर हजारों साल पुराना है.

    गुफा के संकरे मार्ग से होता है मंदिर में प्रवेश
    यह मंदिर यहां के लोकप्रिय तीर्थ स्थलों में से एक है. मंदिर एक प्राकृतिक गुफा में प्रतिष्ठित है. अर्बुदा देवी मन्दिर में प्रवेश के लिए श्रद्धालुओं को गुफा के संकरे मार्ग में होकर बैठकर जाना पड़ता है. मन्दिर की गुफा के प्रवेश द्वार के समीप एक शिव मन्दिर भी बना है. अष्टमी की रात्रि यहां महायज्ञ होता है जो नवमी के सुबह तक पूर्ण होता है. नवरात्रों में यहां निरंतर दिन-रात अखंड पाठ होता है.

    चरणों से दबाकर बासकली का किया संहार
    मां अर्बुदा द्वारा बासकली दैत्य का वध करने की एक पौराणिक कथा है. दानव राजा कली, जिसे बासकली के नाम से भी जाना जाता था. उसने कई सालों तक तपस्या करके शिव को प्रसन्न किया. भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर कली को अजेय होने का वरदान दिया. वरदान को पाकर घमंड से चूर-चूर बासकली देवलोक में इंद्र सहित सभी देवताओं को परेशान करने लगा. उसके उत्पात से दुखी होकर देवताओं ने अर्बुदा देवी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की. देवी तीन रूप में प्रकट हुई. देवताओं ने बासकली से बचाने की प्रार्थना की. मां ने देवताओं और ऋषियों को तथास्तु कहा. भगवान शिव का वरदान पाने वाले बासकली को मां ने अपने चरणों के नीचे दबा कर उसका संहार कर दिया. इसके बाद से अर्बुदा मंदिर के पास स्थित माता के पादुका की पूजा होने लगी.


    त्रिदेव ने अंश देकर कात्यायनी को उत्पन्न किया
    स्कंद पुराण के अर्बुद खंड में माता के चरण पादुका की महिमा खूब गायी गई है. पादुका के दर्शन मात्र से ही मोक्ष यानि सदगति मिलने की बात भी कही गई है. यह वही चरण पादुका है, जिससे मां ने बासकली का वध किया था. एक ऋषि ने मां भगवती की कठोर तपस्या की थी. जब दानव महिषासुर का संहार करने के लिये, त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश ने अपने तेज का एक-एक अंश देकर देवी को उत्पन्न किया था तब महर्षि कात्यायन ने ही सर्वप्रथम इनकी पूजा की थी। इसी वजह से ये कात्यायनी कहलायीं.

    भारत के रॉक-कट मंदिरों के सर्वश्रेष्ठ
    अर्बुदा देवी मंदिर का निर्माण ठोस चट्टानों से किया गया है और यह भारत में रॉक-कट मंदिरों के सर्वश्रेष्ठ नमूनों में से एक है. सफेद संगमरमर से बना यह मन्दिर एक ऊंची और विशाल पहाड़ी पर बहुत भव्य व आकर्षक लगता है. मंदिर तक जाने के लिए 365 सीढ़ियां बनी हैं. ऊपर पहुंचने पर सुंदर दृश्य और शान्ति मन मोह लेती है और थकान पल भर में दूर हो जाती है. पास ही नव दुर्गा, गणेशजी और नीलकंठ महादेव मंदिर भी है. स्कंद पुराण के अर्बुद खंड में माता अर्बुदा देवी को भवतारिणी, दुखहारिणी, मोक्षदायिनी और सर्वफलदायिनी माना गया है.

    Tags: Navratri 2021, Rajasthan news in hindi, Sirohi news

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