होम /न्यूज /राजस्थान /Art and Culture: उदयपुर में पानी पर बनती है कृष्णलीलाओं की रंगोली, जाने इसके पीछे की कहानी

Art and Culture: उदयपुर में पानी पर बनती है कृष्णलीलाओं की रंगोली, जाने इसके पीछे की कहानी

Culture of Udaipur: उदयपुर के कलश मार्ग स्थित गोवर्धन नाथ मंदिर में बनने वाली जलसांझी में कृष्णलीला का चित्रण किया जाता ...अधिक पढ़ें

  • News18Hindi
  • Last Updated :

हाइलाइट्स

मंदिरों में बनाई जाने वाली एक जलसांझी में कम से कम छह घंटे का वक्त लगता है.
इन रंगोली में कहीं कृष्ण का बाल रूप होता है तो कहीं गोवर्धन पर्वत उठाने का प्रसंग.
यह परंपरा ब्रज से शुरू हुई थी, जहां कृष्ण की याद में राधा उनकी लीलाएं बनाती थीं.
जलसांझी मंदिरों में श्राद्ध पक्ष की एकादशी से अमावस्या के बीच ही बनाई जाती है.

रिपोर्ट: निशा राठौड़

उदयपुर. राजस्थान के उदयपुर के कृष्ण मंदिरों में पानी पर जलसांझी बनाई जाती है. लेकिन इस जलसांझी के बनाने का भी वक्त तय है. यह जलसांझी श्राद्ध पक्ष की एकादशी से अमावस्या के बीच ही बनाई जाती है. इसमें कृष्ण लीलाओं का चित्रण किया जाता है और इसके लिए प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता है. इसके लिए किसी बड़े पात्र में पानी भर कर उस पर रंगोली बनाई जाती है.

शहर के कलश मार्ग स्थित गोवर्धन नाथ मंदिर में बनने वाली जलसांझी में कृष्णलीला का चित्रण किया जाता है. जलसांझी की यह परंपरा करीब 500 वर्ष पुरानी है. पुजारी राजेश वैष्णव ने बताया कि पानी को पात्र में भरने के बाद जब उसकी सतह स्थिर हो जाती है, तो उस पर विभिन्न रंगों से कृष्णलीलाओं का चित्रण किया जाता है. इसके लिए सूखे रंगों का इस्तेमाल किया जाता है. इसे बनाने में 6 घंटे से भी अधिक समय लगता है. इन रंगोली में कहीं कृष्ण का बाल रूप होता है तो कहीं गोवर्धन पर्वत उठाने का प्रसंग. गौमाता के साथ कृष्ण की लीला की जलसांझी भी आकर्षक होती है.

ब्रज में राधा बनाती थीं जलसांझी

माना जाता है कि जलसांझी की परंपरा ब्रज से शुरू हुई थी. कृष्ण की याद में राधा उनकी लीलाएं पानी पर बनाया करती थीं, इसके बाद से जलसांझी बनाई जाने लगी.

प्राकृतिक सूखे रंगों का इस्तेमाल

जलसांझी में प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता है. इसमें फूलों, पत्तियों को सुखाकर रंग बनाए जाते हैं और उनका प्रयोग किया जाता है. साथ ही स्टोन के बारीक पाउड, कोल पाउडर भी इस्तेमाल किए जाते हैं.

गोबर और फूलों की भी जलसांझी

भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से संझा उत्सव शुरू होता है, जो भाद्रपद कृष्ण अमावस्या तक रहता है. इस दौरान घर के बाहर कन्याएं गोबर और फूलों से विभिन्न कलाकृतियां बनाती हैं. फिर शाम को इसकी पूजा-अर्चना करती हैं. अंतिम दिन कोट बनाया जाता है. सांझी को अमावस्या के दिन जल में विसर्जन किया जाता है. इस दौरान सांझी को गेहूं की घूघरी व गुड़ का भोग लगाया जाता है.

Tags: Art and Culture, Rajasthan news, Udaipur news

विज्ञापन

टॉप स्टोरीज

अधिक पढ़ें