Udaipur: झीलों की नगरी के प्रसिद्ध लकड़ी के खिलौनों को खा गया चीन, 'आत्मनिर्भर भारत अभियान' से फिर जगी उम्मीद
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Udaipur: झीलों की नगरी के प्रसिद्ध लकड़ी के खिलौनों को खा गया चीन, 'आत्मनिर्भर भारत अभियान' से फिर जगी उम्मीद
उदयपुर में अब सिर्फ दो ही परिवार बनाते हैं ये खिलौने.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 'आत्मनिर्भर भारत अभियान' (Atmanirbhar Bharat Abhiyan) ने दम तोड़ चुके उदयपुर के लकड़ी के खिलौने (Wooden toys) की कला एवं व्यापार में उम्मीद की नई किरण जगाई है.

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उदयपुर. झीलों की नगरी उदयपुर (Udaipur) अपनी कला के लिये भी दुनिया में मशहूर है. हालांकि अब अधिकांश कलाएं (Arts) दम तोड़ चुकी हैं, लेकिन इन कलाओं को जीवंत रखने की कोशिश अभी भी जारी है. उदयपुर की ऐसी ही एक कला थी लकड़ी के खिलौनों (Wooden toys) को बनाने की. बताया जाता है कि करीब 170 साल पहले देश में लकड़ी के खिलौने बनाने का व्यापार सबसे पहले उदयपुर में शुरू हुआ था. फिर धीरे धीरे यह व्यापार देश के कुछ अन्य शहरों में भी फैला. बाद में स्थानीय परिस्थितियों और चीनी (China) खिलौने के बढ़ते प्रभाव से यह कला दम तोड़ गई. लेकिन अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) ने एक बार फिर देश में बने खिलौने के प्रोत्साहन की बात कहकर इन कारीगरों के मन के उत्साह को जीवित कर दिया है.

उदयपुर में बने लकड़ी के खिलौनों की डिमांड पूरे देश में रहती थी
पहले उदयपुर में बने लकड़ी के खिलौनों की डिमांड पूरे देश में रहती थी. उदयपुर लकड़ी के खिलौना का बहुत बड़ा केन्द्र हुआ करता था. यहां घर- घर में खिलौने बनाने की मशीनरी लगी हुई थी. इससे जुड़े लोग दिन-रात खिलौने बनाने के कार्य में जुटे रहते फिर भी मांग के अनुरुप सप्लाई करना मुश्किल रहता था. उदयपुर के खेरादीवाड़ा में हर घर में लकड़ी के खिलौने बनाये जाते थे. करीब 600 लोग इस कारोबार से अपना गुजर बसर करते थे. बताया जाता है कि 1960 के दशक तक उदयपुर में लकड़ी के खिलौने बनाने के 170 कारखाने हुआ करते थे. यह खिलौने विदेशी मेहमानों का भी मन मोह लेते थे. लेकिन चीनी खिलौनों के बढ़ते प्रचलन के बाद उदयपुर के इस खिलौना कारोबार को चीन की नजर लग गई. धीरे धीरे यह कारोबार और कला इतिहास बनने लगी.

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उदयपुर में अब सिर्फ दो ही परिवार बनाते हैं ये खिलौने


करीब 90 के दशक में वन विभाग द्वारा लकड़ी को लेकर बरती गई सख्ती के साथ ही कारीगरों ने इससे हाथ खींच लिये और चीनी खिलौने का चलन देश में बढ़ने लगा. चीनी खिलौने के देश में प्रवेश के साथ ही यह कारोबार भी ठप होने लग गया. चीनी खिलौने के चलन के साथ ही लकड़ी के खिलौने का कारोबार खत्म होने लगा. इसके बाद इससे जुड़े लोगों ने दूसरे कार्य को अपनी आजिविका का साधन बना लिया. ऐसे कारीगर जो अपने हाथ के हुनर से खूबसुरत लकड़ी के खिलौने तैयार करते थे वे ऑटो चलाने, सब्जी बेचने या अन्य किसी दुकान पर कार्य करने के लिये मजबूर हो गये. वर्तमान में उदयपुर में सिर्फ दो परिवार ही हैं जो लकड़ी के खिलौने बनाने का काम करते हैं और वह भी प्री-ऑर्डर मिलने पर.

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युवाओं को जोड़ने के लिये ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाने की भी जरुरत
उदयपुर हेंडिक्राफ्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष गजेन्द्र भंसाली ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर ना सिर्फ आत्मनिर्भर भारत अभियान में खिलौना इंडस्ट्री को जोड़ने के लिये धन्यवाद ज्ञापित किया है बल्कि इस उद्योग से एक बार फिर युवाओं को जोड़ने के लिये ट्रेनिंग प्रोग्राम भी चलाने की जरूरत बताई है. केन्द्र सरकार आत्मनिर्भर भारत के तहत देश के उद्योगों को बढ़ावा देने के साथ ही चीनी प्रोडक्ट का चलन देश में कम करने के प्रयास में जुटी है.
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