Rajasthan: कण-कण में त्याग और स्वाभिमान की कहानी समेटे हुए है 'लेकसिटी' उदयपुर, रोमांचित करता है यहां का वैभव
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Rajasthan: कण-कण में त्याग और स्वाभिमान की कहानी समेटे हुए है 'लेकसिटी' उदयपुर, रोमांचित करता है यहां का वैभव
यहां झीलों के किनारे बनी हवेलियां, सिटी पैलेस और पांच सितारा होटल्स भी पुरानी परंपरा और संस्कृति का आभास कराती हैं.

दुनियाभर में लेकसिटी (Lake city) के नाम से पहचान रखने वाले राजपूताना के मेवाड़ अंचल के उदयपुर (Udaipur) के कण-कण में स्वाभिमान और त्याग (Self-respect and sacrifice) की कहानी समायी है. जेम्स टॉड ने उदयपुर को भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे रूमानी शहर बताया था.

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उदयपुर. मेवाड़ का नाम जेहन में आने के साथ ही वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप का स्वत: स्मरण हो जाता है. मेवाड़ के वीर प्रतापी राजा महाराणा प्रताप ने कभी मुगलों की गुलामी को स्वीकार नहीं किया और अकबर की विशाल सेना को भी नाको चने चबाने पर मजबुर कर दिया. महाराणा प्रताप की नगरी और मेवाड़ की पुरानी राजधानी रही हैं उदयपुर.

सिसोदिया राजपूत वंश के उदयसिंह द्वितीय ने स्थापित किया था
उदयपुर को सिसोदिया राजपूत वंश के उदयसिंह द्वितीय ने स्थापित किया था. महाराणा उदयसिंह द्वितीय ने 1559 ईसवी में इसकी स्थापना की थी. इसकी स्थापना के साथ ही इसे सुरक्षित मानते हुए मेवाड़ की राजधानी बना दिया था. इस शहर के राजा रजवाडों की शान आज भी कायम है. उदयपुर के पूर्व राजघराने के सदस्य आज भी पुरे भारत में अपनी पहचान रखते हैं. क्योंकि यहां की राजसी विरासत वर्तमान में भी राजा महाराजाओं के काल का अहसास कराती है. समय के साथ-साथ इस शहर की खुबसुरती और पहचान दुनिया में बढ़ती गई. आज यह शहर पुरी दुनिया में प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के रूप में पहचान रखता है.

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भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे रूमानी शहर


इस शहर में कई खुबसुरत झीलें बनी हुई हैं. इन्हीं झीलों के चलते इसे झीलों की नगरी भी कहा जाता है. पर्यटक इसे झीलों की नगरी के नाम से ही पुकारते हैं. उदयुपर आने वाले देसी-विदेशी पर्यटक झीलों में नाव की सवारी कर रोमांचित महसुस करते हैं. वहीं इन झीलों के किनोर बनी हवेलियां, सिटी पैलेस ओर पांच सितारा होटल्स भी पुरानी परंपरा और संस्कृति का आभास कराती हैं. यह शहर वर्तमान में जितना खुबसुरत हैं, सदियों पहले भी इससे ज्यादा खुबसुरत रहा है. इसका प्रमाण भारत भ्रमण पर आये विदेशी प्रशासन जेम्स टॉड द्वारा दिया गया वक्तव्य है. जेम्स टॉड ने इस शहर को भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे रूमानी शहर बताया था.

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वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप.


उदयपुर के आसपास के इलाकों की ये घटनायें अजर अमर हैं
मेवाड़ में राजा महाराजाओं का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है. मेवाड़ की रानी पद्मावती और उनके साथ 16000 वीरांगनाओं ने अपने स्वभिमान और सतीत्व की रक्षा करने के लिये चित्तौड़गढ़ के ऐतिहासिक किले में जौहर करने जैसा साहसिक कदम उठाया जो आज भी इतिहास में अमर हैं. विश्वभर में यह जौहर प्रसिद्ध है. वहीं जौहर के नाम पर यदि कोई सवाल खड़े करता है तो मेवाड़ एक मंच पर खडा होकर उसके विरोध के लिये मरने मिटने पर तैयार रहता है. यही नहीं यहां सम्लूबर की हाडी रानी भी अपने पति को युद्ध में जाने से पहले अपना सिर काटकर सिर्फ इसलिये भिजवा दिया था ताकि युद्ध के समय उनके मन में पत्नी प्रेम जागृत नहीं हो. उदयपुर के आसपास ऐसी कई ऐतहासिक थातियां फैली हुई हैं जो इतिहास में अजर अमर हैं. यहां के मुख्य राजाओं में बप्पा रावल, राणा सांगा, उदयसिंह, और महाराणा प्रताप रहे हैं. सूर्यवंशी होने के चलते मेवाड़ राजवंश राजा राम के वंशज के रूप में भी माना जाता हैं.

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पीछोला झील


मनभावन है यहां के पर्यटक स्थल
उदयपुर में प्रमुख पर्यटन स्थलों की बात करे तो सिटी पैलेस यहां की सबसे खुबसुरत जगह है. यहां राजा महाराजाओं के काल की वस्तुओं को अभी भी सहेज के रखा गया है. वहीं पीछोला, फतहसागर और जयसमन्द झील इसकी खुबसुरती में चार चांद लगाते हैं. यहां आने वाले पर्यटक इस शहर में सहेलियों की बाड़ी, गणगौर घाट, जगमंदिर, मानसुन पैलेस, जगदीश मंदिर और मोती मगरी जाना नहीं भुलते हैं.

एकलिंग नाथ जी के दीवान के रूप में राज्य का संचालन करते रहे है यहां के राजा
शहर के आसपास की बात करें तो यहां हल्दीघाटी की मिट्टी को पूजा जाता है. नाथद्वारा का श्रीनाथ जी मंदिर, उदयपुर का एकलिंग जी मंदिर, चित्तौड़गढ़ का सांवलिया जी मंदिर, कांकरोली का द्वारकाधीश मंदिर, बांसवाड़ा का त्रिपुरा सुंदरी मंदिर और चारभुजा का चारभुजा नाथ का मंदिर आस्था के प्रमुख केन्द्र हैं. एकलिंग जी मंदिर के प्रति इस शहर में विशेष आस्था रही हैं. यहां के राजा भगवान एकलिंग नाथ को मेवाड़ का राजा मानकर स्वयं उनके दीवान के रूप में राज्य का संचालन करते रहे हैं.

इस क्षेत्र में है एशिया की सबसे बडी मार्बल मंडी
अरावली की पहाड़ियों के बीच बसे इस खुबसुरत शहर की खुबसुरती ये पहाड़ियां हैं. क्योंकि अरावली की इन वादियों में हरियाली से खुबसुरती बढ़ती है तो वहीं इनके नीचे खनिज का बड़ा भंडार भी है. इन पहाड़ियों में विभिन्न महत्वपुर्ण वनस्पति का भी अच्छी मात्रा हैं. अरावली की पहाड़ियों में मुख्य रूप से मार्बल निकलता हैं जो पुरी दुनिया में सप्लाई किया जाता है. उदयपुर और राजसमन्द में मार्बल की बहुत बडी मंडी हैं. कहा जाता है कि ये एशिया की सबसे बडी मार्बल मंडी हैं. दुसरी और यहां चांदी और जिंक भी समाहित हैं. हिंदुस्तान जिंक इन्हीं पहाड़ियों की खुदाई कर बरसों से यहां से जिंक और चांदी को निकाल रही है. यहीं के खनिज पदार्थों को निकाल कर हिंदुस्तान जिंक सबसे बड़ी जिंक उत्पादन कम्पनी बनी है.

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यहां के मुख्य राजाओं में बप्पा रावल, राणा सांगा, उदयसिंह, और महाराणा प्रताप रहे हैं.


खासी निराली हैं यहां के आदिवासी अंचल की परंपरायें
दक्षिणी राजस्थान में बसा उदयपुर आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र भी है. यहां शहरी क्षेत्र को छोड़कर अधिंकाश भाग आदिवासी बाहुल्य है. शहर की खुबसुरती के साथ इसका दुसरा पहलु यह भी है कि आजादी के सात दशक बाद भी यहां के आदिवासी पुर्ण रूप से सम्पन्न नहीं हुये हैं. आदिवासी क्षेत्र में पुराने अंदाज में रहन सहन देखा जा सकता है. ये आदिवासी आज भी अलग-अलग पहाड़ी पर अपना घर बनाकर दुर-दुर रहते हैं. लेकिन आदिवासी अंचल की परंपरायें खासी निराली हैं.

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गवरी नृत्य पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है
यहां का गवरी नृत्य पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है जो भील समाज के त्याग और तपस्या की कहानी को बताता है. राखी के बाद 40 दिन तक भील समाज के लोग कठिन तपस्या के रूप में शिव पार्वती के प्रतीक इस नृत्य को अलग-अलग जगह जाकर करते हैं. इस दौरान वे नशे और मांसाहार को पुर्णत: बंद रखते हुए बिना चप्पलों के घुमते हैं. 40 दिन तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हैं.

ढोल की थाप की भी है अलग कहानी
आदिवासी अंचल में ढोल की थाप की भी अलग कहानी है. यहां बसावट दुर-दुर होने के कारण लोगों को एक दुसरे तक त्वरित संदेश पहुंचाने के लिये ढोल का सहारा लिया जाता है. इस अंचल में ढोल की हर थाप अलग-अलग कहानी बताती है. विभिन्न तरह के ढोल को बजाकर चंद मिनटों में ये लोग दुर दराज के लोगों को एक जगह पर जमा कर लेते हैं. किसी तरह की मुसीबत और खुशी की जानकारी भी ढोल के माध्यम से पहुंचा देते हैं.
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