दुश्मन देश में बारूद से भरी ट्रेन लेकर घुस गया था ये जांबाज, पढ़ें- पायलट दुर्गाशंकर की दास्तां

वीरचक्र से सम्मानित दुर्गाशंकर पालीवाल.

वीरचक्र से सम्मानित दुर्गाशंकर पालीवाल.

भारत पाकिस्तान सीमाओं के बीच तनाव के इस दौर में हम आपको बता रहे कि कैसे भारतीय सैनिकों के बुलंद हौसलों के सामने पाकिस्तान एयरक्राफ्ट और बम भी निष्क्रिय नजर आते हैं. पढ़ें, 30 अक्टूबर 1972 को राष्ट्रपति वीवी गिरी ने वीरचक्र से सम्मानित दुर्गाशंकर के हौसलों की दास्तां...

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उम्र 83 साल, और जज्बा आज भी भारतीय सेना के साथ दुष्मनों के छक्के छुड़ाने का. ये जांबाज व्यक्ति अब भले ही बुजुर्ग हो गया हो लेकिन अभी भी वो सरकार का हुक्म मिलते ही पाकिस्तान से दो-दो हाथ करने को तैयार है. हम बात कर रहे हैं रेलवे पायलट दुर्गाशंकर पालीवाल की. वीर चक्र विजेता पालीवाल, 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के नायक रह चुके हैं. दरअसल 1971 के युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सीमा में प्रवेश करते हुए करीब तीस किलोमीटर तक कब्जा कर लिया था. उस दौरान भारतीय सेना का जब असलहा खत्म होने लगा तो सेना ने पाकिस्तानी सीमा में जवानों को असलहा उपलब्ध कराने का जिम्मा दुर्गाशंकर पालीवाल को मिला था.



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भारतीय रेल की ओर से भारतीय सेना में सेवाएं दे रहे दुर्गाशंकर पालीवाल को 25 बोगियों वाली एक ट्रेन लेकर पाकिस्तानी सीमा में प्रवेश करना था. दुर्गाशंकर को बाड़मेर के समीप मुनाबाव रेलवे स्टेशन होते हुए, पाकिस्तान के खोपरापार और फिर परचे की बेरी रेलवे स्टेशन तक पहुंचना था. हालांकि रेलवे ट्रेक टूट चुका था, ऐसे में करीब दस किलोमीटर के ट्रेक को रातों रात बनाया गया और 11 दिसम्बर 1971 को दुर्गाशंकर बारूद से भरी हुई ट्रेन लेकर पाकिस्तानी सीमा में प्रवेश कर गए.





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पाकिस्तानी सीमा के खोपरापार से आगे दुर्गाशंकर की रेल की रेकी करने के लिए एक पाकिस्तानी विमान नजर आया, तो उन्होंने खतरे को भांप लिया और तैयारी शुरू कर दी. इस दौरान रेकी कर विमान फिर पाकिस्तान की ओर लौट गया लेकिन कुछ ही पलों में 6 एयरक्राफ्ट बम गिराकर ट्रेन को तबाह करने पहुंचे गए.



पाकिस्तान के इन 6 एयरक्राफ्ट ने ट्रेन को घेर लिया लेकिन दुर्गाशंकर भयभीत नहीं हुए और उन्होंने ट्रेन को और ज्यादा गति दे दी और सिंध हैदराबाद की ओर लेकर जाने लगे. एयरक्राफ्ट द्वारा ट्रेन पर बम गिराये गए लेकिन गनीमत रही कि इससे ट्रेन को नुकसान नहीं हुआ.



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एयरक्राफ्ट हमले में ट्रेन को नुकसान नहीं हुआ और जब एयरक्राफ्ट में भी बम खत्म हो गए तो वे रिलोड होने के लिए फिर से सिंध हैदराबाद की ओर कुच कर गए. इस दौरान फुर्ती दिखाते हुए दुर्गाशंकर ने फिर रिवर्स में अपनी ट्रेन करीब पच्चीस किलोमीटर तक ले आये और परचे की बेरी में अपनी बटालियन को इसकी सूचना दी. बटालियन ने भी महज पन्द्रह मिनट में पूरी ट्रेन का असला खाली कर दिया. और फिर एक बार अपनी एंटी एयरक्राफ्ट मिसाइल रिलोड कर दी. उसके बाद पाकिस्तानी एयरक्राफ्ट फिर नहीं आ पाए.



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दस सिख एलआई बटालियन को सफलतापूर्वक गोला बारूद पहुंचाने के बाद भी दुर्गाशंकर की ना मुसीबतें कम हुई और ना ही दुर्गाशंकर का हौसला डगमगाया. जब परचे की बेरी से फिर रेल को रिवर्स भारतीय सीमा की ओर लाया जा रहा था, उस दौरान खोपरापार के समीप करीब भारतीय सीमा से पांच किलोमीटर पहले फिर एक पाकिस्तानी एयरक्राफ्ट ने करीब एक हजार किलो का बम ट्रेक पर गिरा दिया. बम की चिंगारियों से दुर्गाशंकर के हाथ बुरी तरह से झुलस गए और ट्रेक भी क्षतिग्रस्त हो गया.



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कुछ दूर तो कोहनी के सहारे ट्रेन चलाकर दुर्गाशंकर लेकर आए लेकिन फिर ट्रेक टूटा होने कि वजह से वहीं रूकना पडा. ट्रेन के इंजन को डेड कर दुर्गाशंकर ने अपनी राइफल ली और पैदल ही भारतीय सीमा की ओर रवाना हो गए. इस बीच दुर्गाशंकर को भारत का एक हेलीकाप्टर रैकी करता हुआ नजर आया, जिसे लैंण्ड कराया गया फिर दुर्गाशंकर उसमें भारतीय सीमा तक पहुंचे.



कई जगह इलाज के बाद दुर्गाशंकर को इंदिरा गांधी भी मिलने पहुंची और फिर 30 अक्टूबर 1972 को राष्ट्रपति वीवी गिरी ने वीरचक्र से सम्मानित किया. दुर्गाशंकर के हौसले आज भी कम नहीं हुए हैं और वे सरकारी हुक्म मिलते ही फिर पाकिस्तानी सेना के छक्के छुड़ाने के लिए तैयार हैं.



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