गृहमंत्री कटारिया के दोस्त ही बन गए 'दुश्मन', मुश्किल में राजनीतिक नैया!
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बीजेपी की टिकट पर उदयपुर सीट से नामांकन दाखिल करने वाले गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया के करीबियों ने विरोध तेज कर दिया है.

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राजस्थान के गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया बीजेपी के टिकट पर उदयपुर सीट से अपना भाग्य आजमाते नजर आए. लेकिन इसी के साथ उन्हीं के करीबियों का विरोध तेज हो गया. कटारिया से नाराजगी के चलते पार्टी के वरिष्ठ नेता मांगीलाल जोशी ने बीजेपी छोड़ दी.

जनसंघ के समय से पार्टी के सदस्य और उदयपुर जिले के 8 साल तक जिलाध्यक्ष जोशी की लंबे समय से कटारिया के साथ तनातनी चल रही थी. जोशी ने अब रणधीर सिंह भींडर की जनता सेना को ज्वॉइन कर लिया. बता दें कि कटारिया के सामने उदयपुर से जनता सेना से बीजेपी के ही पूर्व वरिष्ठ नेता दलपत सुराणा चुनाव लड़े.

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कहते हैं कि राजनीति की बिसात पर स्थाई दोस्ती और दुश्मनी मना हैं. इस सियासी सफर में दोस्त और दुश्मन जरूरत के हिसाब से तय किए जाते हैं. किसी फिल्मी डायलॉग की तरह 'काम खत्म, दोस्ती खत्म' का उसूल यहां ज्यादा मायने रखता हैं.
शायद यही वजह है कि मेवाड़ की राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल करने वाले गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया के राजनीतिक दुश्मनों की एक लंबी फेहरिस्त है. लेकिन बड़ी बात यह है कि ये राजनीतिक दुश्मन अब कटारिया को चुनावी सफर में धूल चटाने के लिए कमर कस चुके है. कभी कटारिया के खास दोस्त रहे और एक साथ शिक्षक के बतौर अपना करियर शुरू करने वाले वरिष्ठ बीजेपी नेता मांगीलाल जोशी राजनीतिक तौर पर कटारिया के सबसे बडे़ दुश्मन हैं.

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बकौल जोशी वर्ष 1968 से कटारिया के साथी और सहभागी रहे लेकिन कटारिया ने उनके साथ हमेशा विश्वासघात किया. यही नहीं वरिष्ठ बीजेपी नेता दलपत सुराणा की माने तो कटारिया किसी भी ऐसे व्यक्ति को पसंंद नहीं करते जिसमें कुछ कर गुजरने का माद्दा हो. शायद यही वजह है कि समय के साथ कटारिया ऐसे व्यक्तियों को राजनीतिक राह से अलग-थलग कर देते हैं.

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गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया से सियासी दुश्मनी पाले बैठे लोगों की लंबी फेहरिस्त है. मांगीलाल जोशी, दलपत सुराणा के अलावा ताराचंद जैन, शांतिलाल चपलोत, रणधीरसिंह भींडर, अनिल सिंघल ऐसे नाम हैं जो मानते हैं कि कटारिया की वजह से उनका राजनीतिक करियर ऊचाइयां नहीं छू पाया. हालांकि खुद गृहमंत्री कटारिया इन सब बातों को खारिज करते हुए कहते हैं कि भगवान सबको सदबुद्धि दे और सब मिल कर स्वयंं के हित के बजाए राष्ट्रहित में काम करें.

कटारिया के यही दोस्त अब दुश्मनी इस कदर निभा रहे हैं कि चुनावी समर में उन्हें हराने के लिए बीजेपी तक को छोड़ कर जनता सेना का दामन थाम चुके हैं. यही नहीं दलपत सुराणा तो कटारिया के सामने जनता सेना के प्रत्याशी के तौर पर नामांकन भी दाखिल कर चुनावी मैदान में कूद पड़े. अब देखना होगा कि कटारिया के ये पुराने दोस्त जो वर्तमान में उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं, वे चुनावों में उन्हें कितना नुकसान पहुंचा पाते हैं.



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