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OMG! दिवाली इस जीव पर पड़ती है भारी, बलि के नाम पर मार डालते हैं लोग

OMG! दिवाली इस जीव पर पड़ती है भारी, बलि के नाम पर मार डालते हैं लोग

राजस्थान के कुछ आदिवासी इलाकों में दिवाली पर उल्लू की बलि देने और उससे जुड़े अंध विश्वास की.

राजस्थान के कुछ आदिवासी इलाकों में दिवाली पर उल्लू की बलि देने और उससे जुड़े अंध विश्वास की.

हम बात कर रहे हैं राजस्थान के कुछ आदिवासी इलाकों में दिवाली पर उल्लू की बलि देने और उससे जुड़े अंध विश्वास की.

    यूं तो दिवाली के पांच दिन हर तरफ खुशियों का माहौल और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देने का दौर चलता है लेकिन ये अवसर एक जीव पर हर बार भारी पड़ता है. हम बात कर रहे हैं राजस्थान के कुछ आदिवासी इलाकों की जहां दिवाली पर उल्लू की बलि देने और उससे जुड़ा अंध विश्वास आज भी कायम है.


    दरअसल, राजस्‍थान में दिवाली पर उल्लू तांत्रिकों के निशाने पर रहते हैं. संकट में इस प्रजाति पर तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास भारी पड़ता है. लक्ष्मी के वाहक माने जाने वाले उल्लू की जान पर बन आती है.


    इसलिए दी जाती है बलि


    सिद्धी प्राप्ति के लिए उल्लू तस्करों के निशाने पर रहते हैं. इससे लगातार उल्लू की तादाद में गिरावट आ रही है और अब हालात ये हैं कि प्रदेश में पाई जाने वाली उल्लू की आठों प्रजाति लुप्त होने के कगार पर है. पूरे देश में लक्ष्मी जी की सवारी माने जाने वाला उल्लू शिकारियों और तस्करों के निशाने पर है. दिपावाली पर इस तरह के मामलों में इजाफा हो जाता है और शिकारी व तस्कर ज्यादा सक्रिय रहते हैं. देश के कई राज्यों में तांत्रिकों में तंत्र साधना के लिए दिवाली से पूर्व उल्लू की बलि चढ़ाने का अंध विश्वास रहता है. इसके कारण उल्लू की मांग काफी बढ़ जाती है और शिकारी व तस्कर उल्लुओं को पकड़ने के लिए जंगलों को खंगालने में जुट जाते हैं.

     

    प्रजनन की दर में कमी, तस्करों भी खतरा


    कुछ वर्षों पहले तक में उल्लू बहुतायत में पाये जाते थे. इमली, बरगद और पीपल के पेड़ों में खोली जगह में रहने वाले की संख्या में पहले ही जंगल घटने से तादाद में कमी आई और प्रजनन की दर भी कम हो गयी. इससे तादाद कम होने के बाद भी अब तस्करों का खतरा उल्लुओं पर लगातार बरकरार है.

    1990 में लगाई गई थी रोक

    1990 में भारत में उल्लुओं के व्यापार, इन्हें पकड़ने व शिकार करने पर वन्यजीव सुरक्षा अधिनियम 1972 के तहत रोक लगा दी गयी थी. लेकिन उसके बाद भी उल्लू की तस्करी पर रोकथाम पूरी तरह नहीं लग पाई है. तंत्र मंत्र के साथ ही शक्ति और सिद्धी प्राप्ती के लिए उल्लुओं को उपयोग किया जा रहा है. इसके कारण तांत्रिक उल्लुओं की खोज में रहते हैं. राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड, सहित देशभर में उल्लू की आठ प्रजातियां पाई जाती है. इनमें बार्न उल्लू, ग्रेट होर्नेड उल्लू, यूरेशियन ईगल उल्लुओं की हालात बहुत ही दयनीय हैं. देशभर में उल्लुओं की गणना ही नहीं की जाती इसलिए इनकी तादाद का पता लगाया जाना मुश्किल है.

    बचाने के लिए आगे आए संगठन

    राजस्थान सहित देशभर में उल्लुओं के संरक्षण के लिए पीपुल फोर एनीमल्स संगठन की ओर से केंद्रीय वन एवं पर्यारवण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को पत्र लिख कर उल्लू के संरक्षण की मांग उठाई गई है ताकि वक्त रहते उल्लुओं को बचाया जा सके और गिद्ध की तरह इसे भी केवल चित्रों में ही न दिखाना पड़े.

    Tags: Rajasthan news, Udaipur news

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