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उदयपुर की झीलें बनीं कचरागाह, नगर निगम को नहीं है परवाह

उदयपुर की झीलें बनीं कचरागाह, नगर निगम को नहीं है परवाह

झीलों की नगरी उदयपुर के पर्यटन और प्रसिद्धी की सबसे महत्वपूर्ण आधार मानी जाने वाली नीली झीलों का रखरखाव करने में स्थानीय प्रशासन की कोई दिलचस्पी नहीं है. इन झीलों के संरक्षण और विकास के लिए जिम्मेदार स्थानीय नगर निगम की घोर लापरवाही के चलते ये विश्‍व प्रसिद्ध झीलें कचरागाह में परिवर्तित होती जा रही हैं.

झीलों की नगरी उदयपुर के पर्यटन और प्रसिद्धी की सबसे महत्वपूर्ण आधार मानी जाने वाली नीली झीलों का रखरखाव करने में स्थानीय प्रशासन की कोई दिलचस्पी नहीं है. इन झीलों के संरक्षण और विकास के लिए जिम्मेदार स्थानीय नगर निगम की घोर लापरवाही के चलते ये विश्‍व प्रसिद्ध झीलें कचरागाह में परिवर्तित होती जा रही हैं.

झीलों की नगरी उदयपुर के पर्यटन और प्रसिद्धी की सबसे महत्वपूर्ण आधार मानी जाने वाली नीली झीलों का रखरखाव करने में स्थानीय प्रशासन की कोई दिलचस्पी नहीं है. इन झीलों के संरक्षण और विकास के लिए जिम्मेदार स्थानीय नगर निगम की घोर लापरवाही के चलते ये विश्‍व प्रसिद्ध झीलें कचरागाह में परिवर्तित होती जा रही हैं.

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झीलों की नगरी उदयपुर के पर्यटन और प्रसिद्धी की सबसे महत्वपूर्ण आधार मानी जाने वाली नीली झीलों का रखरखाव करने में स्थानीय प्रशासन की कोई दिलचस्पी नहीं है. इन झीलों के संरक्षण और विकास के लिए जिम्मेदार स्थानीय नगर निगम की घोर लापरवाही के चलते ये विश्‍व प्रसिद्ध झीलें कचरागाह में परिवर्तित होती जा रही हैं.

उदयपुर है झीलों की नगरी

सात समंदर पार से लेकर देश के विभिन्न हिस्‍सों से आने वाला हर देशी-विदेशी सैलानी सुरम्य वादियों के बीच नीली झीलों के सौन्दर्य का आनंद लेने का ख्वाब पाले यहां आता हैं. लेकिन इसे उदयपुर नगर निगम की इन सैलानियों के साथ धोखाधड़ी कहें या फिर गंभीर लापरवाही कि इन विश्‍व प्रसिद्ध झीलों को निगम प्रबंधन साफ-सुथरी नहीं रख पा रहा है. इन झीलों को गंदा करने वाले स्थानीय लोगों की बात छोड़ दें तो इन झीलों को सबसे ज्यादा गंदा करने का तमगा स्थानीय नगर निगम को ही मिलेगा. दरअसल, नगर निगम ने इन झीलों के किनारों से सटाकर डंपिंग यार्ड बना रखे हैं, जहां आम लोग कूड़ा-करकट डाल कर जाते हैं. यही गंदगी इन नीली झीलों में समाहित होकर ना केवल इस पेयजल के मुख्य स्त्रोत पानी को प्रदूषित करती है बल्कि झीलों की नैसर्गिक खूबसूरती पर भी काखिल पोत देती है.

महापौर ने कहा, साफ हैं झीलें

शहर की लाइफ लाइन कही जाने वाली इन झीलों में पसरी गंदगी को लेकर जब इस बारे में निगम महापौर चन्द्र सिंह कोठारी से उनका पक्ष जानना चाहा तो वे झीलों में गंदगी की वजह जलीय घास और अन्य प्राकृतिक रूप से उपजने वाले जलीय पौधों को बताने लगे. हालांकि, निगम के पास जलीय घास की गंदगी से निपटने के लिए 5 करोड़ रुपए लागत की डिविडिंग मशीन को लेकर उन्होंने कहा कि कुछ दिनों से मशीन अन्य जिले में चली गई थी ऐसे में झीलें गंदगी हो रही हैं.

केंद्र से मिले पैसों का नहीं हुआ उपयोग

निगम की सबसे गंभीर लापरवाही तो यह भी है कि राष्ट्रीय झील संरक्षण परियोजना के तहत केन्द्र सरकार से उदयपुर की विश्‍व प्रसिद्ध झीलों के लिए करीब 144 करोड़ रुपए की भारी भरकम राशि मिली हुई है, लेकिन इस पैसे का उपयोग भी निगम प्रबंधन झीलों के संरक्षण के बजाय उद्यानों के आधे-अधूरे विकास में कर रहा है.

 

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