Udaipur: आदिवासी कथौड़ी जाति ने कोरोना काल की आपदा को बदला अवसर में, 7 दशक पुरानी समस्या का किया समाधान
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Udaipur: आदिवासी कथौड़ी जाति ने कोरोना काल की आपदा को बदला अवसर में, 7 दशक पुरानी समस्या का किया समाधान
यह कुंआ करीब 35 फीट गहरा खोदा गया है. चार महीनों की अथक मेहनत से कुंआ तैयार हो गया.

उदयपुर (Udaipur) के जंगलों में रहने वाले कथौड़ी जाति (Kathodi tribals) के आदिवासियों ने लॉकडाउन में आपदा को अवसर (Opportunity) में बदलने का बेहतरीन उदाहरण पेश किया है.

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उदयपुर. कथौड़ी आदिवासियों (Kathodi tribals) का नाम सुनते ही पिछड़ेपन की पूरी तस्वीर आंखों के सामने आने जाती है. यह उदयपुर के आदिवासी अंचल की सबसे पिछड़ी (Most backward) जाति मानी जाती है. यह जाति आजादी के सात दशक बाद भी समाज की मुख्यधारा से नहीं जुड पाई हैं और ना ही यह एकता में विश्वास करती है. हमेशा अलग-थलग रहने वाली इस जाति के कुछ परिवारों ने लॉकडाउन (Lockdown) के दौरान जो कार्य किया वह इनकी प्रकृति से बिल्कुल अलग था. कोरोना काल के इस आपदा के समय को इन्होंने अवसर (Opportunity) में बदलते हुए वह काम कर डाला जो इन्होंने सात दशक में भी नहीं किया था.

35 परिवारों की यह बस्ती घने जंगलों में रहती है
उदयपुर के आदिवासी बाहुल्य झाडोल अंचल के घने जंगलों में गुजरात बॉर्डर से महज 14 किलोमीटर पहले बसे टिंडोरी गांव में कथौड़ी परिवार की बस्ती है. करीब 35 परिवारों की यह बस्ती घने जंगलों में रहती है. यहां किसी तरह की आधुनिक सुविधायें नहीं हैं. बरसों से इस इलाके में पेयजल की किल्लत है. बारिश के दौरान ये लोग समीप से निकलने वाली नदी का पानी पीने के काम में लेते हैं. वहीं आम दिनों में करीब ढाई किलोमीटर दूर से पानी लाना इनकी मजबूरी बन जाता है.

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40 सदस्यों ने गांव में ही कुंआ खोदना शुरू किया


लॉकडाउन के दौरान मुंह पर कपडा बांधकर पानी लाने से हो रही परेशानी के चलते बस्ती के 14 परिवारों ने एक योजना बनायी. इन परिवारों के करीब 40 सदस्यों ने गांव में ही कुंआ खोदना शुरू किया. जुगाड़ की क्रेन बनाई गई और स्थानीय औजारों से कुंआ खोदने का कार्य शुरू किया गया. लकड़ी से बनाई गई जुगाड़ की क्रेन से मिट्टी बाहर निकाली गई और पत्थरों से चुनते हुए कुंए का निर्माण कर दिया. यह कुंआ करीब 35 फीट गहरा खोदा गया है. चार महीनों की अथक मेहनत से कुंआ तैयार हो गया और इसमें अच्छा पानी भी आ गया.

पूरे दिन सिर्फ इसी कार्य में लगे रहते थे
कुंआ खोदने के दौरान इन परिवारों का जज्बा इतना था कि ये पूरे दिन सिर्फ इसी कार्य में लगे रहते थे. कथौड़ी जाति के परिवारों में ऐसी एकता पहली बार देखी गई कि जब एक जाजम पर सभी लोगों ने मिलकर कोई जन हितार्थ कार्य किया हो. ग्रामीण अंचल में विकास कार्य करने वाली सेवा मंदिर संस्थान ने इन लोगों को एक जाजम पर लाने का कार्य किया था. एकजुटता में बंधने के बाद इन परिवारों को अपनी शक्ति का अहसास हुआ और लॉकडाउन में इन्होंने कुंआ खोद दिया.

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दूर हुई दशकों पुरानी समस्या
ये सभी लोग गुजरात में मजदूरी किया करते थे, लेकिन लॉकडाउन के बाद इन्हें पुन: अपने गांव आना पड़ा. लॉकडाउन में कोई काम नहीं होने के चलते इन्होंने दशकों पुरानी पानी की समस्या को दूर करने की योजना बनाई. अब इस कुएं से पाइप लाइन बिछाकर लोगों के घरों तक पेयजल सप्लाई करने की योजना बनायी गई है. कठिन परिश्रम के पसीने से बने इस कुंए के पानी से ना सिर्फ इन लोगों को पेयजल मिल सकेगा बल्कि कुंए के पानी को खेती में भी काम में लिया जायेगा.
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