World Environment Day: उदयपुर में पहली बार दिखा दुर्लभ प्रजाति का पहाड़ी बबूल

उदयपुर में मिला रेयर किस्म का पहाड़ी बबूल (फाइल तस्वीर)

अरावली की बबूल (acacia) प्रजातियों की विविधता पर कार्य कर रहे पर्यावरण वैज्ञानिक (environmental scientist) व सेवानिवृत्त सहायक वन संरक्षक डॉ. सतीश शर्मा ने उदयपुर शहर से 15 किलोमीटर की दूरी पर धार गांव में सड़क किनारे इस पहाड़ी बबूल (अकेशिया एबरनिया) के पांच पेड़ों को देखकर इनकी पहचान की है

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उदयपुर. राजस्थान के उदयपुर (Udaipur) के पर्यावरणविद ने जनपद से महज 15 किलोमीटर दूर दुर्लभ प्रजाति के बबूल को ढूंढ कर World Environment Day से पहले पर्यावरण प्रेमियों को खुशखबरी दी है. बता दें कि जैव-विविधता से भरे-पूरे मेवाड़ में पहली बार दुर्लभ प्रजाति के पहाड़ी बबूल (अकेशिया अरनिया) की मौजूदगी देखी गई है. अरावली की बबूल प्रजातियों की विविधता पर कार्य कर रहे पर्यावरण वैज्ञानिक और रिटायर्ड सहायक वन संरक्षक डॉ. सतीश शर्मा ने उदयपुर शहर से 15 किलोमीटर दूर धार गांव में सड़क किनारे इस पहाड़ी बबूल (अकेशिया एबरनिया) के पांच पेड़ों को देखकर इनकी पहचान की है.

डॉ. शर्मा ने बताया कि राजस्थान में इस प्रजाति के बबूल को सबसे पहले वर्ष 1951 में वनस्पति शास्त्र के विद्वान केएस सांखला ने उत्तर-पश्चिमी राजस्थान के सर्वे के दौरान देखा था. लेकिन उसके बाद यह पेड़ राजस्थान में लुप्त रहा. वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. एमएस भंडारी ने भी वर्ष 1978 में लिखी अपनी पुस्तक ‘Flora of Indian Desert’ में इसे दर्ज नहीं किया. इन स्थितियों के बीच वर्तमान में यह पेड़ फलों से लदा हुआ नजर आया है. वो कहते हैं उदयपुर में पुष्पित और फलित हो रहे इस पेड़ की उपस्थिति सुकूनदायी है. डॉ. शर्मा बताते हैं कि अपने क्षेत्रीय भ्रमण और सर्वे के दौरान इन तीन मध्यम आकार के तथा दो छोटे इन पेड़ों को देख कर वो चौंक गए क्योंकि ये दुर्लभ प्रजाति के बबूल 1951 के बाद राजस्थान से विलुप्त हो चुके थे. उन्होंने बाकायदा इन पौधों की फिनोलॉजी पर अध्ययन के बाद इसके बारे में सूचना दी.

यह होती है इसकी पहचान
डॉ. शर्मा बताते हैं कि यह प्रजाति एक बड़ी झाड़ी या छोटे वृक्ष के रूप में पाई जाती है. पीले रंग की छाल से यह दूर से पहचान में आ जाती है. काटी गई टहनियों के ठूंठ की छाल कुछ समय के बाद काली हो जाती है. इसके फूल सुंदर चटक पीले रंग के होते हैं जिन्हें देखना सुकूनदायी होता है. इसके फल सर्दियों में आते हैं. जब पौधा पुष्पकाल में होता है तो बरबस ही दूर से नजर आ जाता है क्योंकि पूरा वृक्ष फूलों से लद जाता है और बहुत सुंदर दिखाई देता है. मई के आते-आते इसकी पत्तियां गिर जाती हैं और फलियां पक जाती हैं, जो वृक्ष पर लगे-लगे ही तड़कने लगती हैं, इसके बीज फटी फलियों से गिरते रहते हैं. फलियों के खाली पट लटकते रहते हैं और वो भी हवा के प्रवाह से गिरते रहते हैं. कुल्हाड़ी के घाव लगने पर तने से सफेद गोंद रिसता है. इसके अधिकांश गुण देसी बबूल से मिलते हैं लेकिन तने का रंग और फलियों की बनावट एकदम अलग होने से इसे सहजता से पहचाना जा सकता है.

68 वर्षों बाद दिखी मौजूदगी
डॉ. शर्मा ने बताया कि भारतीय सर्वेक्षण विभाग (Survey Department of india) के प्रकाशित रिकार्ड के अनुसार गत 68 वर्षों में इस पौधे ने राजस्थान में दूसरी बार मौजूदगी दर्ज की है. वहीं उदयपुर जिले में इसकी प्रथम उपस्थिति है. उदयपुर में इसकी मौजूदगी दर्ज कराने पर क्षेत्र के पर्यावरण प्रेमियों के साथ वागड़ नेचर क्लब के सदस्यों ने डॉ. शर्मा को बधाई दी है और इसे क्षेत्र के पारिस्थिति तंत्र के लिए सुखद संकेत बताया है.

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