RTI से मिली जानकारी, देश में 2,234 लोगों की धमनियों में दौड़ रहा एड्स वाला खून

ब्लड बैंक और अस्पतालों की लापरवाही की वजह से इस वक्त देश में 2,234 लोगों की धमनियों में यमराज का लहू दौड़ रहा है। यमराज का लहू यानी एड्स वाला खून।

ब्लड बैंक और अस्पतालों की लापरवाही की वजह से इस वक्त देश में 2,234 लोगों की धमनियों में यमराज का लहू दौड़ रहा है। यमराज का लहू यानी एड्स वाला खून।

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    नई दिल्ली। जिन अस्पतालों और ब्लड बैंकों पर लोगों की जान बचाने की जिम्मेदारी है, उनमें से कई लोगों को मौत बांट रहे हैं। लोगों को खून के साथ मौत का ऐसा वायरस चढ़ाया जा रहा है, जो शरीर में जाकर एड्स बम में बदल रहे हैं। ब्लड बैंक और अस्पतालों की लापरवाही से ऐसे लोगों की तादाद देश में दो हजार 234 तक पहुंच गई है।

    रक्तदान, जिसे महादान कहा जाता है। थोड़ी-सी चूक हो जाए तो यही खून यमराज के लहू में बदल जाता है! यमराज का लहू यानी मौत देने वाला खून, क्या जरूरत पड़ने पर आपके किसी अपने को अस्पताल में खून चढ़ाया जाता है? क्या ब्लड बैंक से सहेजकर जो खून आप लाते हैं उसे जिंदगी देने वाला ही मानते हैं? क्या आपको पता है कि ब्लड बैंक या अस्पताल की लापरवाही से आपके करीबी के रगों में मौत का खून दौड़ने लगता है?

    वह खून, जिसमें एचआईवी वायरस होता है। वह वायरस, जो जानलेवा बीमारी एड्स देता है, जिसका कोई इलाज नहीं, जो सिर्फ मौत देता है। ब्लड बैंक और अस्पतालों की लापरवाही की वजह से इस वक्त देश में 2,234 लोगों की धमनियों में यमराज का लहू दौड़ रहा है। यमराज का लहू यानी एड्स वाला खून।

    नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन यानी नाको ने आरटीआई के तहत जो जानकारी दी है, वह बेहद खौफनाक है। नाको के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 361, गुजरात में 292, महाराष्ट्र में 276 और दिल्ली में 264 लोग अस्पताल से मिले एचआईवी संक्रमित लहू के साथ जीने को मजबूर हैं।

    रक्त दान के लिए नियम तय हैं। एड्स की रोकथाम के नाम पर हर राज्य में बेतहाशा पैसे खर्च किए जाते हैं,  लेकिन जब जानलेवा मर्ज का वायरस खुद अस्पताल और बल्ड बैंक ही बांटने लगे, तो राज्य के विकासवादी मॉडल में झांकने की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता।

    हैरानी तब और बढ़ जाती है जब देश की राजधानी की दशा भी दूसरे राज्यों से बेहतर नजर नहीं आती।  उत्तर प्रदेश, गुजरात के बाद एड्स बम की फैक्ट्री तैयार करने में तीसरे पायदान पर मौजूद दिल्ली में केंद्र और राज्य की अलग-अलग दो सरकारें हैं। यहां की जमीन पर नीति नियंता बैठते हैं। देश के स्वास्थ्य मंत्री रहते हैं। एड्स कंट्रोल के नाम पर बंदरबांट करने वाले स्वयंसेवी संगठनों की फौज जमा होती है, लेकिन यहां एड्स कंट्रोल करने की बजाय इसे बढ़ाने के जतन तो नहीं हो रहे? सवाल बड़ा है आखिर जिन पर एड्स जैसी बीमारियों की रोकथाम की जिम्मेदारी है, जिन्हें एड्स पर जागरुकता फैलाने का जिम्मा है, जो हर साल एड्स की रोकथाम के नाम पर करोड़ों रुपये का फंड पाते हैं। उनके रहते 264 लोग एचआईवी संक्रमित खून की चपेट में कैसे आए?

    देश के और राज्यों के अस्पताल और ब्लड बैंक भी जानलेवा संक्रमित खून को बांटने में पीछे नहीं। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक पश्चिम बंगाल में 135, कर्नाटक में 127, हरियाणा में 99, बिहार में 91, तामिलनाडु में 89 और पंजाब में 88 लोगों को अस्पताल ने यमराज का लहू बांटा। किसी भी जरूरतमंद के शरीर में मौत वाला खून नहीं पहुंचे, इसे तय करना मुश्किल नहीं। विज्ञान की तरक्की के बाद यह काम बेहद आसान हो गया है, लेकिन आंखों पर लापरवाही का चश्मा पहने लोगों को शायद यह बात समझ में नहीं आती।

    महाराष्ट्र स्वास्थ मंत्री दीपक सावंत के मुताबिक बहुत मुश्किल होता है तुरंत एचआईवी के वायरस के बारे में पता लगाना। हमने अपने विभाग को जांच के आदेश दिए है। जांच तो होती रहेगी। केंद्र से लेकर तमाम राज्यों के जिम्मेदार लोग एक-दूसरे पर बयानों का ठीकरा फोड़ने की भी कोशिश करेंगे, लेकिन यमराज का लहू किसी और बेकसूर के रगों में न दौड़े, क्या ये कभी तय हो पाएगा? क्या मासूम लोगों को मौत की मुंह में धकेलने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो पाएगी?

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