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सरस्वती को जिंदा करने की कोशिशें फेल, खट्टर सरकार अब लगाएगी ट्यूबवेल

News18India
Updated: August 1, 2016, 10:35 PM IST

सदियों पुरानी इस पौराणिक नदी की तलाश में न तो आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, ना ही जियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया और ना ही भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र की किसी रिपोर्ट की मदद ली गई।

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  • Last Updated: August 1, 2016, 10:35 PM IST
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नई दिल्ली। हरियाणा सरकार पिछले डेढ़ साल से सरस्वती नदी की तलाश में जुटी है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का कहना है कि वो हर हाल में सरस्वती को पुनर्जीवित करके रहेंगे। पहले तो सरस्वती नदी का पानी तलाशने के लिए कई महीने तक खुदाई की गई। इसके बाद भी जमीन के नीचे पानी नहीं मिला तो हरियाणा सरकार ने पंप के पानी से सरस्वती नदी को जिंदा करने की कोशिश की। इससे खट्टर सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

यमुनानगर के मुगलवाली गांव में पिछले साल खुदाई के दौरान पानी मिला था। तब माना गया कि ये पानी पौराणिक सरस्वती नदी का है जो सदियों पहले मुगलवाली से होकर बहती थी। पानी मिलने के बाद हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार ने सरस्वती को पुनर्जीवित करने की योजना बनाई। इस योजना के तहत सबसे पहले मुस्तफाबाद का नाम बदलकर सरस्वती नगर रख दिया गया।

इसके बाद शुरू हुई सरस्वती नदी के 42 किलोमीटर लंबे रूट की खुदाई। हरियाणा सरकार को उम्मीद थी कि सरस्वती के पानी से सूबे की किस्मत बदल जाएगी। 10 महीने खुदाई के बाद भी जब सरस्वती नदी का पानी नहीं मिला। तब सरकार ने सरस्वती नदी के रूट में पानी डालकर नदी को पुनर्जीवित करने की योजना बनाई।

इसी बीच बारिश का मौसम आया तो हरियाणा सरकार की योजना को पंख मिल गए। भारी बरसात के चलते नहर में पानी आ गया जिसे काफी मशक्कत के बाद सरस्वती नदी के रूट में छोड़ा गया लेकिन पानी कुछ दूर जाकर ही रुक गया। इस नाकामी के बावजूद खट्टर सरकार ने हार नहीं मानी है।

खट्टर खुद कहते हैं कि असली सरस्वती तो हम ला नहीं सकते। वो तो कब की खत्म हो चुकी है। हमारी कोशिश है कि सरस्वती नदी जिस रूट पर पौराणिक वक्त में बहती थी वहां इसकी शुरुआत फिर से की जाए और इस पानी का वहां रह रहे आसपास के लोगों को किसी भी तरह से फायदा मिले।

हरियाणा सरकार का दावा है कि पिछले साल जब सरस्वती नदी के प्रस्तावित रूट की खुदाई करवाई गई थी तब यमुनानगर, कुरुक्षेत्र और जींद में जमीन से कुछ फीट नीचे एक नदी के होने का प्रमाण मिला था। हरियाणा सरकार के मुताबिक जींद में बालू की बनावट और घनत्व से पता चला कि कभी यहां हिमालय को पार करती नदी बहती थी। कुरुक्षेत्र और यमुनानगर में बालू के रंग और मिट्टी की परत से एक पुरानी नदी होने का प्रमाण मिला था।

रिसर्च में ये भी पता चला कि 12 हजार साल पहले इस रूट पर हिमालय के ग्लेशियर से निकली नदी बहती थी लेकिन 5 हजार साल पहले एक भीषण प्राकृतिक आपदा के चलते उसका अस्तित्व मिट गया और वो एक बरसाती नदी बनकर रह गई।सरस्वती नदी पर शोधकर्ता कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ए आर चौधरी के मुताबिक अभी इस काम में रिसर्च की और जरूरत है। आरटीआई कार्यकर्ता पी पी कपूर ने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी कि हरियाणा सरकार ने सरस्वती नदी का रूट किस आधार पर तय किया है। इस पर हरियाणा सरकार का जवाब था कि जिले के रेवेन्यू रिकॉर्ड के आधार पर सरस्वती नदी का रूट बनाया गया है। हरियाणा सरकार का ये जवाब हैरान करने वाला है। सदियों पुरानी इस पौराणिक नदी की तलाश में न तो आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, ना ही जियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया और ना ही भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र की किसी रिपोर्ट की मदद ली गई। हरियाणा के सरकारी अफसर नासा की जिस रिपोर्ट का हवाला दे रहे हैं, उसका जिक्र भी केवल जिला प्रशासन की रिपोर्ट में है।

अब तक फ्लॉप शो साबित हुई सरस्वती योजना पर सियासत भी गरमाने लगी है। हरियाणा सरकार की दलील है कि अभी तक उसने सिर्फ 5 करोड़ रुपए ही खर्च किए हैं। वहीं विपक्ष का आरोप है कि खट्टर सरकार ट्यूबवेल के पानी से सरस्वती नदी बनाने की नाकाम कोशिश कर रही है।

कैबिनेट मंत्री अनिल विज कहते हैं कि सरस्वती नदी हमारी आस्था की प्रतीक है और जहां आस्था की बात होती है वहां साइंटिफिक बातें नहीं की जातीं। सरस्वती नदी हमारी पौराणिक मान्यताओं से जुड़ी है और हम उसके स्वरूप को फिर से जिंदा करने की कोशिश कर रहे हैं। अब हमें चाहें उसमें किसी और नदी, ड्रेन से पानी लेकर छोड़ना पड़े या फिर पंप लगाने पड़ें हम सरस्वती नदी के इस स्वरूप और अपनी आस्था को फिर से शुरू करके रहेंगे।

उधर विपक्ष ने सरस्वती नदी की तलाश में जुटी खट्टर सरकार पर जमकर निशाना साधा है। अभय चौटाला कहते हैं कि जब थोड़ी सी खुदाई में भी वहां पर पानी का चौव्वा निकला तो वहां सरकार के मंत्री और मुख्यमंत्री खुद पूजा-पाठ करने और उसे सरस्वती नदी का पानी बताने पहुंच गए जबकि वहां पर ग्राउंड वॉटर का लेवल काफी ऊंचा होने की वजह से इतनी खुदाई में पानी वैसे ही बोरिंग करने पर निकल आता। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा कहते हैं कि कोई भी नदी इस तरह से ट्यूबवेल लगा कर शुरू नहीं की जा सकती।

विपक्ष के हमलों से बेपरवाह खट्टर सरकार अपनी इस महत्वाकांक्षी योजना पर डटी हुई है। वो हर हाल में सरस्वती नदी को जिंदा करने की कोशिश में जुटी है। अब देखना है कि ये कोशिश कब तक और किस हद तक पूरी हो पाती है।

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First published: August 1, 2016, 9:48 PM IST
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