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दुकानदारों का 'गोलमाल', 157 में बेच रहे हैं 100 रुपये की दाल

News18India
Updated: September 5, 2016, 10:40 PM IST

अभी तीन महीने भी नहीं हुए जब खुदरा बाजार में दाल के भाव आसमान पर थे। दाल की कीमत 200 रुपये प्रति किलो तक पहुंची थीं। जिसके बाद सरकार हरकत में आई और थोक में कालाबाजारी रोकने के साथ ही बफर स्टॉक बढ़ाने का भी फैसला किया।

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  • Last Updated: September 5, 2016, 10:40 PM IST
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नई दिल्ली। अभी तीन महीने भी नहीं हुए जब खुदरा बाजार में दाल के भाव आसमान पर थे। दाल की कीमत 200 रुपये प्रति किलो तक पहुंची थीं। जिसके बाद सरकार हरकत में आई और थोक में कालाबाजारी रोकने के साथ ही बफर स्टॉक बढ़ाने का भी फैसला किया। इसका असर ये हुआ कि थोक बाजार में दालों के भाव गिरने लगे, लेकिन क्या थोक बाजार में भाव गिरने का पूरा फायदा आम आदमी को नहीं मिला। इसका जवाब है नहीं जी हां, कड़वा सच यही है कि रीटेल मार्जिन के नाम पर फुटकर दुकानदार पिछले छह महीनों से जनता को लूट रहे हैं

अब दाल आम आदमी की पहुंच से बाहर है, इतनी महंगी है कि उसे खरीदना सबके बस का नहीं है। भले ही दाल हर घर की जरूरत हो, हर इंसान की आदत हो लेकिन इस दाल ने जमकर जेब काटी है। आसमान छूती महंगी दाल अब चुनावी मुद्दा बन रही है। जनता में हाहाकार मचा तो सरकार ने भी कोशिश की और दाल की थोक कीमत कम हुई लेकिन हमारी आपकी थाली में सस्ती दाल नहीं पहुंची।

एक अंग्रेजी अखबार की चौंकाने वाली रिपोर्ट के मुताबिक बीते छह महीनों के दौरान दिल्ली के थोक बाजार में अरहर दाल की कीमत में 30 फीसदी गिरावट आई है। लेकिन खुदरा बाजार में अरहर की कीमत सिर्फ 16 फीसदी घटी। यानी खुदरा दुकानदार यानि आपके मोहल्ले का दुकानदार ग्राहक तक पूरा नहीं बल्कि आधा फायदा ही पहुंचा रहे हैं। दाल के थोक कारोबारियों का कहना है कि दाल के असली विलेन खुदरा दुकानदार हैं, जो दाल की कीमत घटने पर भी ऊंचे भाव पर ही बेच कर मुनाफा कमा रहे हैं। दाल के दाम पिछले एक हफ्ते से बढ़ रहे हैं। हमें भी समझ नहीं आ रहा ये कैसे हो रहा है।

रिटेल के दाम ज्यादा होने की वजह दुकानदारों की मनमानी है। रिपोर्ट के मुताबिक दाल के थोक व्यापारियों ने सरकार के सामने अपना पक्ष भी रखा। उपभोक्ता मामलों ने मंत्रालय से मिलकर बताया कि दाल की बढ़ती कीमत के लिए वो जिम्मेदार नहीं हैं और सरकार को छोटे दुकानदारों की लगाम कसनी चाहिए। वैसे तो हर दुकानदार सामान पर कुछ मार्जिन यानी अपना मुनाफा वसूलता है, लेकिन खाने-पीने की चीजों को देखें तो दालों के मामले में ये मार्जिन कुछ ज्यादा ही है। रिपोर्ट के मुताबिक 31 अगस्त को दिल्ली में खुदरा व्यापारी अरहर दाल को 35.6 फीसदी के मुनाफे पर बेच रहे थे। यानि अगर अरहर दाल की कीमत थोक बाजार में 100 रुपए प्रति किलो थी तो आपको घर में 135-140 रुपए की बेची जा रही थी।



खुली दालों के मुकाबले पैकेट बंद दालों पर तो ये मुनाफा और भी ज्यादा था। उसी दिन एक सुपर मार्केट स्टोर में पैकेट बंद उड़द की कीमत 57 फीसदी ज्यादा थी।  यानि ये स्टोर अगर थोक बाजार से 100 रुपए में दाल खरीद रहा था तो पैकेटबंद कर उसे 157 रुपए प्रति किलो बेच रहा था। जानकारों के मुताबिक दाल पर थोक और खुदरा दामों का फर्क या कहिए मार्जिन 15 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए। साल 2012 में जब दालों की भारी कमी थी, तब भी दाल पर मुनाफा 13 फीसदी ही था।

पुरानी दिल्ली के नया बाजार में दालों की थोक मार्किट से वॉक, इसमें दुकानदार मनीष कुमार सभी दालों के आज के रेट बता रहे हैं। साथ ही ये भी बता रहे हैं कि पिछले एक हफ्ते से दाल की कीमतों में लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है। ये भी बताया कि सरकार की कोशिशों के बाद दाल के रेट 60 रूपए तक नीचे आ गए थे। दिल्ली दाल मिल्स एसोसिएशन के महासचिव दीपक गोयल का कहना है कि दाल के दाम पिछले एक हफ्ते से बढ़ रहे हैं। हमें भी समझ नहीं आ रहा ये कैसे हो रहा है।रिटेल के दाम ज्यादा होने की वजह दुकानदारों की मनमानी है।

वहीं दुकानदारों का कहना है कि रेट बहुत ज्यादा नहीं बढ़ते हैं। भाड़ा और पैकेजिंग का खर्च आता है, उसके हिसाब से ही रेट बढ़ाते हैं। थोक विक्रेता एक चीज की कई क्वालिटी लेकर चलते हैं इसलिए कई बार ज्यादा फर्ख नजर आता है। एक ही क़्वालिटी की दाल में 10-15 का फर्क आता है। थोक के भाव और सामान्य रीटेल मार्जिन के साथ खुदरा भाव पर नजर डालें तो आम आदमी की दाल में काफी कुछ काला नजर आ रहा है। थोक बाजार में अरहर का भाव 80 रुपए प्रति किलो है। जानकारों के मुताबिक ज्यादा से ज्यादा 15 फीसदी रीटेल मार्जिन जोड़ने पर खुदरा बाजार में इसकी कीमत 92 रुपए होनी चाहिए, जबकि यही दाल आम आदमी को 130 के हिसाब से मिल रही है।

मूंग धुली दाल की बात करें तो इसका थोक भाव 60 रुपए है और 15 प्रतिशत के रीटेल मार्जिन पर इसे 69 रुपए होना चाहिए लेकिन फुटकर में ये 90 रुपए में मिल रही है। मसूर का हाल देखें तो इसका थोक का रेट 65 रुपए प्रति किलो है और स्टैंडर्ड रीटेल मार्जिन जोड़ने पर इसका भाव 71 रुपए होना चाहिए, लेकिन आम आदमी को इसके लिए 120 यानी करीब दोगुनी कीमत तक चुकानी पड़ रही है।

उड़द की बात करें तो थोक में इसका भाव 100 रुपए प्रति किलो है, 15 प्रतिशत रीटेल मार्जिन पर इसकी कीमत 115 से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, लेकिन इसका खुदरा भाव 140 रुपए तक है।  वहीं चना दाल पर भी 15 फीसदी रीटेल मार्जिन से कहीं ज्यादा कीमत वसूली जा रही है। थोक में इसकी कीमत 80 रुपए है जबकि फुटकर में ये 120 रुपए प्रति किलो के हिसाब से मिल रही है। इन रेट को देखकर आप समझ सकते हैं कि आप जो दाल खरीद रहे हैं वो आखिर कितनी महंगी है।

(दिल्ली में कीमत रुपए प्रति किलो)

दाल         थोक भाव     खुदरा भाव (+15% रीटेल मार्जिन)     खुदरा भाव

अरहर        80          92                            130

मूंग धुली   60          69                            90

मसूर        65          71                            120

उड़द         100         115                           140

चना दाल     80          92                            120

रीटेल मार्जिन के नाम पर लूट का ये खेल आज कल का नहीं है बल्कि कई महीनों से चल रहा है। आपको तीन बड़े महानगरों में अरहर का हाल दिखाते हैं जहां रीटेल मार्जिन के नाम पर कैसे आम आदमी की जेब में डाका डाला गया।

दिल्ली की बात करें तो मार्च 2016 में अरहर का थोक भाव 129 रुपए प्रति किलो था जबकि फुटकर में ये 13 फीसदी रीटेल मार्जिन के साथ 146 रुपए के हिसाब से बिक रही थी, लेकिन अगस्त 2016 में जब थोक का भाव घटकर 90 रुपए हो गया तो फुटकर में अरहर का रेट 122 था जिसमें फुटकर दुकानदार 35 फीसदी से ज्यादा का फायदा ले रहा था।



मुंबई के आंकड़ों पर नजर डालें तो मार्च 2016 में अरहर का होलसेल रेट 109 रुपए था और फुटकर में ये 146 रुपए प्रति किलो की दर से बिक रही थी। करीब 34 फीसदी रीटेल मार्जिन के साथ। वहीं अगस्त 2016 में जब थोक का भाव घटकर 83 रुपए पर आ गया तो फुटकर रेट करीब 39 फीसदी रीटेल मार्जिन के साथ 115 रुपए था।



एक और महानगर चेन्नई की बात करें तो यहां मार्च 2016 में अरहर की कीमत 105 रुपए प्रति किलो थी जबकि फुटकर में 131 रुपए के हिसाब से बिक रही थी। करीब 25 फीसदी रीटेल मार्जिन के साथ। वहीं अगस्त 2016 में जब थोक का भाव घटकर 83 रुपए तक हो गया तब भी यहां फुटकर में अरहर की कीमत 133 रुपए प्रति किलो पर थी। यानी 60 फीसदी रीटेल मार्जिन के साथ फुटकर दुकानदारों ने बड़ा मुनाफा कमाया।

चेन्नई में अरहर का भाव

थोक में सस्ती       फुटकर में महंगी      रीटेल मार्जिन

(मार्च 2016)

रु. 105            रु. 131            24.8%

(अगस्त 2016)

रु. 83             रु. 133            60.2%

अब सवाल ये है कि आखिर आम आदमी की जेब इस मुनाफाखोरी का बोझ क्यों सहे।  और आखिर सरकार छोटे दुकानदारों की इस दाल की लूट पर क्यों खामोश है?

आखिर दाल का सिस्टम है क्या? थोक बाजार में दाम घटता है तो तमाम शहरों में इसका असर अलग अलग पड़ता है। सिर्फ एक राष्ट्रीय दाल नीती ही दाम तय नहीं करती बल्कि शहरों के स्थानीय कारण भी दाम के बढ़ने या घटने के जिम्मेदार होते हैं। लेकिन दिक्कत थोक से खुदरा के बीच के सिस्टम में है. अगर ये सिस्टम पारदर्शी नहीं होगा तो दाल फ्राई यूं ही लूट फ्राई बनती रहेगी।

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First published: September 5, 2016, 9:41 PM IST
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