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मोदी की इस रणनीति ने पाक को किया अलग-थलग, घेराबंदी में साथ आए ये देश!

डॉ. प्रवीण तिवारी | News18India
Updated: June 5, 2016, 9:09 PM IST

प्रधानमंत्री बनने के साथ ही नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की पहल की, लेकिन पाकिस्तान ने उलटे भारत को जख्म ही दिए।

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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री बनने के साथ ही नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की पहल की, लेकिन पाकिस्तान ने उलटे भारत को जख्म ही दिए। इसके बाद पीएम मोदी ने शुरू की आतंक के आका पाकिस्तान की चौतरफा घेरेबंदी,  जिसमें भारत का साथ अमेरिका, ईरान और अफगानिस्तान ने दिया।

पाक की घेराबंदी में भारत का पहला साथी- अमेरिका: भारत दशकों से पूरी दुनिया को बताता आ रहा है कि पाकिस्तान दुनिया के सबसे खूंखार आतंकियों की पनाहगाह है, लेकिन पाकिस्तान की दोस्ती में अंधे दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क अमेरिका ने एक न मानी। दरअसल, पाकिस्तान दशकों से अमेरिका का सबसे भरोसेमंद साथी था, लेकिन अमेरिका नहीं जानता था कि वो अपनी आस्तीन में दोस्त नहीं बल्कि सांप पाल रहा है। भारत के लगातार सबूत देने के बाद अब अमेरिका भी पाकिस्तान का असली चेहरा पहचान गया है।

2011 में अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में मारा गया। 2015 में तालिबान आतंकियों का सरगना मुल्ला उमर पाकिस्तान में ही मारा गया और 2015 मुल्ला उमर का वारिस मुल्ला मंसूर भी पाकिस्तान में ही मारा गया। इन तीनों हमलों की सबसे खास बात ये है कि इन तीनों को अमेरिकी फौज ने ही मारा और वो भी अपने पुराने साथी पाकिस्तान की सरहद में घुसकर।
अफगानिस्तान में सक्रिय तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के आतंकी अमेरिकी फौज को निशाना बनाने के बाद पाकिस्तान में ही पनाह लेते हैं। अपने कट्टर दुश्मनों को पाकिस्तान में पनाह मिलने की खबरों ने अमेरिका की आंखें खोल दी है।

अमेरिकी कांग्रेस ने भी पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के मुद्दे पर शरीफ सरकार को जमकर लताड़ा है। अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ F-16 लड़ाकू विमानों का सौदा रद्द कर दिया है। पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक मदद में भी अच्छी खासी कटौती की गई है। अमेरिका ने कहा है कि जब तक पाकिस्तान तालिबान और हक्कानी आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई का सबूत नहीं देगा उसे आर्थिक मदद नहीं मिलेगी। इस बीच भारत में आतंकी हमलों को अंजाम देने वाले लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के खिलाफ भी अमेरिकी रूख में सख्ती आई है।

अमेरिकी रक्षा विभाग ने आतंकवाद पर अपनी सालाना रिपोर्ट में कहा है कि पाकिस्तानी फौज ने अपने मुल्क में सक्रिय तहरीक-ए-तालिबान जैसे आतंकी संगठन के खिलाफ तो कार्रवाई की है, लेकिन भारत में आतंकी हमलों को अंजाम देने वाले लश्कर-ए-तैयबा और जमात-उद-दावा जैसे संगठनों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। ये आतंकी संगठन पाकिस्तान में बैठकर आतंकियों को ट्रेनिंग देते हैं, अपना नेटवर्क चलाते हैं। इतना ही नहीं ये चंदा जुटाते हैं खुलेआम रैलियां भी करते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका का मोस्ट वांटेड आतंकी हाफिज सईद न सिर्फ पाकिस्तान में बेरोकटोक घूमता है बल्कि वो खुलेआम रैलियों को संबोधित करता है, जिसकी कवरेज पाकिस्तान के तमाम मीडिया चैनल करते हैं। इस रिपोर्ट में ये भी लिखा है कि पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लगातार भारत में हमलों को अंजाम देते रहते हैं। इस रिपोर्ट में ये भी लिखा है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत और अमेरिका के रिश्ते मजबूत हुए हैं।भारत का कहना है अगर पाकिस्तान यूं ही आतंकियों को पालता-पोसता रहा तो एक दिन ऐसा भी आएगा जब वो खुद आतंक की इस आग में जलकर भस्म हो जाएगा। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाहौर जाकर पाकिस्तान को दोस्ती का पैगाम दिया था, लेकिन पाकिस्तान दोस्ती का हाथ थामने के बजाय बातचीत के सभी दरवाजे बंद करने में जुटा है।

अमेरिका पाकिस्तान से दूर हो रहा है लेकिन भारत के साथ उसके रिश्ते मजबूत हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो साल के भीतर अमेरिका की चौथी यात्रा पर हैं। जाहिर है अमेरिका दक्षिण एशिया में भारत को अपना सबसे भरोसेमंद साथी मान चुका है। अब अमेरिका भी समझ गया है कि ये वक्त पाकिस्तान पर मेहरबानी का नहीं  बल्कि उसकी धोखेबाजी और गद्दारी की सजा देने का है।

पाक की घेराबंदी में भारत का दूसरा साथी- अफगानिस्तान: शनिवार को अफगानिस्तान दौरे पर काबुल पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वहां के राष्ट्रपति अशरफ घानी ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा। तालिबान के चंगुल से निकलने के बाद अफगानिस्तान नवनिर्माण की राह पर है और इसमें हिंदुस्तान उसका सबसे भरोसेमंद साथी है वहीं पड़ोसी पाकिस्तान के साथ अफगानिस्तान के रिश्ते बेहद तल्ख हैं क्योंकि पाकिस्तान में बैठी कट्टरपंथ ताकतें तालिबान और हक्कानी आतंकियों की हिमायती हैं। ये किसी से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान इन आतंकियों को अपनी जमीन पर पनाह देता है।

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ती दूरियां भारत के लिए फायदेमंद हैं क्योंकि पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में उसे अफगानिस्तान की जरूरत है। यही वजह है कि भारत तमाम मुश्किलों के बावजूद अफगानिस्तान में तमाम निर्माण कार्य करा रहा है। इसी सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को हेरात में 1700 करोड़ रुपये की लागत से बने मैत्री बांध का उद्घाटन किया। इस बांध को भारत ने बनाया है और इसके निर्माण में लगे इंजीनियर भी भारतीय हैं। इस बांध इसे दोनों देशों की दोस्ती का प्रतीक माना जा रहा है। इस मौके पर पाकिस्तान का नाम लिए बगैर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि जब तक इस पूरे इलाके से आतंकवाद खत्म नहीं होता तब तक दोनों देश चैन से नहीं बैठेंगे।

अफगानिस्तान में तालिबान आतंकियों से लोहा लेने वाली अमेरिकी फौज के अफसर भी मानते हैं कि पाकिस्तान समर्थित तालिबान और हक्कानी आतंकी ही असल मुसीबत की जड़ हैं। कुछ दिन पहले अमेरिका ने तालिबान प्रमुख मुल्ला अख्तर मंसूर को पाकिस्तान के क्वेटा में मार गिराया। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने तालिबान को चेतावनी देते हुए कहा था कि वो अफगान सरकार से बातचीत करके तमाम मुद्दों का हल निकालें, अगर वो हथियार नहीं छोड़ेंगे तो उनका भी अंजाम वही होगा जो मुल्ला अख्तर मंसूर का हुआ है।

पाकिस्तान अफगानिस्तान का सबसे करीबी पड़ोसी है। अगर वो चाहता तो अफगानिस्तान के विकास का साथी बनता, लेकिन इसके बजाय उसने अफगानिस्तान की तबाही का सामान पसंद किया और आज हकीकत ये है कि पाकिस्तान कहने को तो अफगानिस्तान से सटा हुआ है लेकिन असल में वो उससे बहुत दूर जा चुका है।

पाक की घेराबंदी में भारत का तीसरा साथी- ईरान: ईरान पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटने के बाद भारत ने सबसे पहले उसकी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया। भारत ने ईरान से चाबहार बंदरगाह समझौता कर पाकिस्तान को पटखनी दे दी है। कुछ दिन पहले तक पाकिस्तान चीन के साथ ग्वादर बंदरगाह का समझौता करके इतरा रहा था, लेकिन चाबहार समझौते ने उनकी बोलती बंद कर दी है।

भारत-ईरान और अफगानिस्तान के बीच हुए इस समझौते के बाद भारत की सीधी पहुंच न सिर्फ ईरान और अफगानिस्तान तक बल्कि मध्य एशिया के अन्य देशों तक हो जाएगी। सबसे बड़ी बात ये कि इस प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद अफगानिस्तान जाने के लिए भारत को पाकिस्तान की जरूरत नहीं पड़ेगी। मई में ईरान दौरे पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेहरान में चालबाज चीन और उसकी शह पर आंखें तरेरने वाले पड़ोसी पाकिस्तान को करारा जवाब दिया।

पीएम मोदी और ईरानी राष्ट्रपति हसन रोहानी की मौजूदगी में दोनों देशों के बीच चाबहार बंदरगाह को लेकर करार हुआ। भारत के लिए चाबहार पोर्ट काफी अहम है क्योंकि इसे पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है, जिसे चीन विकसित कर रहा है। चाबहार पोर्ट को लेकर भारत-ईरान और अफगानिस्तान के बीच तिहरा करार हुआ है जिसके जरिए इन देशों के बीच सीधे तौर पर तेल और गैस की आपूर्ति हो सकेगी।

चाबहार पोर्ट भारत-ईरान और अफगानिस्तान के लिए बड़े फायदे का सौदा है। ये डील इसलिए अहम है क्योंकि चाबहार पोर्ट के लिए भारत 3350 करोड़ रुपए का निवेश करेगा। इस पोर्ट से अफगानिस्तान और ईरान तक भारत की सीधी पहुंच हो जाएगी।  चाबहार पोर्ट के तैयार हो जाने के बाद भारत और ईरान सीधे व्यापार कर सकेंगे।  भारतीय या ईरानी जहाजों को पाकिस्तान के रूट से नहीं जाना पड़ेगा।
इसके जरिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक के बाजार भारतीय कारोबारियों के लिए खुल जाएंगे।

दरअसल, ईरान और पाकिस्तान की लड़ाई को शिया और सुन्नी तबके की लड़ाई से जोड़कर देखा जाता है। ईरान शिया मुस्लिम बहुल देश है जबकि पाकिस्तान की सियासत में में सुन्नी मुसलमानों का असर है। लिहाजा दोनों मुल्क लंबे अरसे से वैचारिक तौर पर एक-दूसरे का विरोध करते आए हैं। अफगानिस्तान में सक्रिय तालिबान आतंकी भी सुन्नी ही हैं। यही वजह है कि जब से अफगानिस्तान में आतंकवाद बढ़ा है तब से ईरान की मुश्किल बढ़ी है।

ईरान का मानना है कि पाकिस्तान सरकार और आईएसआई तालिबान आतंकियों को बढ़ावा देते हैं और इसका नतीजा ये होता है कि आतंकवाद के डर से बड़ी तादाद में अफगानी नागरिक ईरान में घुस जाते हैं। अफगान शरणार्थी ईरान के लिए बड़ी मुसीबत हैं। यही वजह है कि ईरान पाकिस्तान से खार खाए हुए है और इसी नाराजगी का फायदा उठाते हुए भारत ने ईरान को अपने खेमे में कर लिया है यानी पूरे इलाके में पाकिस्तान एकदम अलग-थलग पड़ गया है।

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First published: June 5, 2016, 8:59 PM IST
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