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फिल्म समीक्षा: गे प्रोफेसर के दर्द को बयां करती है 'अलीगढ़'

फिल्म समीक्षा: गे प्रोफेसर के दर्द को बयां करती है 'अलीगढ़'

हंसल मेहता द्वारा निर्देशित फिल्म अलीगढ़ डॉक्टर श्रीनिवास रामचंद्र सिरस की सच्ची कहानी पर आधारित है।

मुंबई। हंसल मेहता द्वारा निर्देशित फिल्म अलीगढ़ डॉक्टर श्रीनिवास रामचंद्र सिरस की सच्ची कहानी पर आधारित है। एक मराठी प्रोफेसर जिन्हें 2010 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से सस्पेंड कर दिया गया था, जब ये पब्लिकली एक्सपोज हुआ कि वो होमोसेक्सुअल है। कुछ ही हफ्तों बाद कानूनी लड़ाई जीते और उनकी सस्पेंशन रद्द की गई, पर फिर अजीब परिस्थितियों में उनकी लाश मिली। अलीगढ़ एक ऐसे समय पर रिलीज हुई है, जब हमारे देश में आर्टिकल 377 और होमोसेक्सुएलिटी को डिक्रिमिनलाइज करने के मुद्दे पर जोर शोर से बहस चल रही है।

फिर भी ये फिल्म महज गे इशू से कहीं ज्यादा है। डायरेक्टर हंसल मेहता और राइटर अपूर्व असरानी, इस फिल्म के जरिए अकेलेपन, बढ़ती उम्र और एक आउटसाइडर होने के एहसास को बहुत खूबी से दर्शाते हैं। ग्रे हेयर और दाढ़ी और झुके हुए कंधों के साथ, मनोज वाजपेयी चौसढ़ साल के सिरस के किरदार को बखूबी निभाते हैं, वो अपने छोटे से फ्लैट में लता मंगेशकर के गाने सुनते हुए और व्हिस्की पीते हुए अपनी जिंदगी से संतुष्ट हैं।
सिरस अपने गहरे विचारों को अपनी कविताओं के जरिए व्यक्त करते हैं। उन्हें पसंद नहीं जब उन्हें गे का लेवल दिया जाता है, क्योंकि उनका मानना है कि किसी भी इंसान के जज्बातों को तीन शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। जोश से भरे यंग पत्रकार दीपू के किरदार में राजकुमार राव चार्मिंग हैं, जो सिरस को अपने वजूद की लड़ाई लड़ने को मजबूर करता है। उनकी परफॉमेंस फिल्म की एक और ताकत है।

दीपू, सिरस से बेहद अलग है, नौजवान उत्सुकता से भरा और आसानी से बदलती दुनिया में ढलने वाला। इन दोनों के बीच अच्छी दोस्ती हो जाती है, और उनके साथ बिताए पल इस फिल्म के सबसे बेहतरीन सीन हैं। सेंसटिव राइटिंग बारीक डायरेक्शन और इसके मुख्य किरदारों के शानदार अभिनय के साथ 'अलीगढ़' एक महत्वपूर्ण फिल्म है, लेकिन फिल्म की धीमी गति कहीं-कहीं आपको रेस्टलेस बना देगी। यही नहीं आप सिरस के बारे में और ज्यादा जानना चाहेंगे, जो फिल्म नहीं बताती।

अफसोस फिल्म का ट्रैजिक क्लाइमेक्स उतना प्रभावशाली नहीं है जितना चाहिए। फिल्म में वो इमोशनल पंच मिसिंग हैं। हंसल मेहता फिल्म में मेलेड्रामा बिल्कुल नहीं डालते, पर सिरस की इस कहानी के उस महत्वपूर्ण मोड़ पर इमोशनल होना तो जायज है। कभी-कभी महज आंसू ही काफी हैं केयर दिखाने के लिए। मैं अलीगढ़ को पांच में से 3.5 स्टार दूंगा।

Tags: Film review, Rajeev masand ki pasand, Rajkumar Rao

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