जयललिताः बचपन की 'अम्मू' जो अपने करोड़ों समर्थकों के लिए बन गई 'अम्मा'!

एमजीआर के निधन के बाद पार्टी में नेतृत्व की कुर्सी के लिए घमासान शुरू हुआ। एआईएडीएमके दो खेमों में बंट गई। एक खेमे की नेता एमजीआर की विधवा जानकी रामचंद्रन थीं और दूसरे की जयललिता थीं।

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नई दिल्ली। भारतीय राजनीति की सबसे करिश्माई शख्सियतों में से एक जयललिता चेन्नई के अपोलो अस्पताल में सोमवार रात 11.30 बजे निधन हो गया। उन्हें रविवार शाम को सीरियस कार्डियक अरेस्ट के बाद लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया था और तभी से उनके समर्थकों ने अस्पताल को घेरे रखा था, वो उनके ठीक होने की दुआएं कर रहे थे।

अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देख चुकीं जयललिता ने कभी हार नहीं मानी थी। वह हर परेशानी के आगे अडिग खड़ी रहीं और उनसे उभरीं, फिर चाहे वो आय से अधिक संपत्ति का मामला हो, दत्तकपुत्र की शादी का मामला हो या फिर तांसी भूमि घोटाला हो। छह बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुकीं जयललिता का जन्म 24 फरवरी 1948 को मैसूर पैलेस में हुआ था। उनके दादा यहां सर्जन हुआ करते थे। जयललिता का बचपन का नाम कोमलवल्ली था, लेकिन सब उन्हें प्यार से अम्मू कहते थे। महज 2 साल की आयु में जयललिता के पिता जयराम उन्हें छोड़कर चल बसे थे। उनका लालन-पालन उनकी मां संध्या ने किया।

जयललिता की शुरुआती शिक्षा पहले बेंगलुरू और फिर चेन्नई में हुई। उन्होंने 16 साल की उम्र में फिल्मों में अभिनय शुरू किया। उनकी पहली फिल्म कन्नड़ भाषा में थी। पहली हिंदी फिल्म 'इज्जत' थी जो 1968 में रिलीज हुई थी। जयललिता ने 140 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। हिंदी, अंग्रेजी, तमिल और कन्नड़ भाषाओं पर जयललिता की काफी अच्छी पकड़ थी।




जयललिता जब साउथ की टॉप अभिनेत्री थीं, तब उनका राजनीतिक सफर शुरू हुआ। 1965 में उनकी डेब्यू तमिल फिल्म ‘वेनीर अढ़ई’ आई। उस वक्त मारुदुर गोपालन रामचंद्रन यानी एमजीआर तमिल फिल्मों के सुपर स्टार थे। ‘वेनीर अढ़ई’ में जयललिता की एक्टिंग एमजीआर को इतनी पसंद आई कि उन्होंने जयललिता को अपनी अगामी फिल्म के लिए साइन कर लिया और 90 के दशक में दोनों ने 28 फिल्मों में एक साथ काम किया।

एमजीआर का जयललिता की जिंदगी में आना सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। उस दौर में एमजीआर फिल्मों के साथ-साथ राजनीति में भी सक्रिय थे। वो 1949 में बनी डीएमके के सदस्य थे।  डीएमके की स्थापना सीएन अन्नादुराई ने की थी। अन्नादुराई की मौत के बाद एम करुणानिधि पार्टी के प्रमुख बने। उस दौर में एमजीआर काफी लोकप्रिय थे। कहा जाता है कि उनकी इसी लोकप्रियता के चलते एम करुणानिधि उन्हें अपने लिए बड़ा खतरा मानते थे। दोनों के बीच मतभेद इतने बढ़ गए कि एमजीआर ने 1972 में डीएमके छोड़कर ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (अन्ना द्रमुक) यानी एआईएडीएमके नाम से एक नई पार्टी बना ली।

एमजीआर के कहने पर जयललिता राजनीति में आईं। 1982 में उन्होंने एआईएडीएमके ज्वॉइन की। 1993 में एमजीआर ने जयललिता को पार्टी का प्रोपगेंडा सेक्रेटरी बना दिया, जोकि एक महत्वपूर्ण पद था। 1983-84 में वह राज्यसभा के लिए नामित हुईं। 1984 में एमजीआर के बीमार होने के बाद जयललिता के जीवन में राजनीतिक उथल-पुथल का दौर शुरू हुआ। उनके विरोधी उन्हें पार्टी से हटाने की रणनीति बनाने लगे। लेकिन जयललिता ने परिस्थितियों को भांपते हुए खुद को संभाला। 1987 में एमजीआर के निधन हुआ।

एमजीआर के निधन के बाद पार्टी में नेतृत्व की कुर्सी के लिए घमासान शुरू हुआ। एआईएडीएमके दो खेमों में बंट गई। एक खेमे की नेता एमजीआर की विधवा जानकी रामचंद्रन थीं और दूसरे की जयललिता थीं, लेकिन जयललिता ने खुद को एमजीआर का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। 1989 में उनकी पार्टी ने राज्य विधानसभा में 27 सीटें जीतीं और वह तमिलनाडु की नेता प्रतिपक्ष बनीं।



इतिहास अपना रुख बदल रहा था। राजनीति में जयललिता का कद बढ़ रहा था। तभी अचानक वो हुआ जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। 25 मई, 1989 को जयललिता ने डीएमके विधायक दुरई मुरुगन पर विधानसभा में साड़ी का पल्लू खींचने का आरोप लगाया।

हालांकि ये विवाद काफी हंगामे के बाद थम गया। लेकिन, जयललिता कहां चुप रहने वाली थीं, उन्होंने इस मुद्दे को चुनाव में खूब हवा दी और वह चुनाव जीत गईं। 24 जून 1991-92 से मई 1996 तक वे राज्य की सबसे कम उम्र की मुख्यमंत्री रहीं। इससे बाद उन्होंने पलटकर नहीं देखा। 2001 में दूसरी बार, 2002 से 2006 के बीच तीसरी बार, 2011 में चौथी बार, 2014 में पांचवीं बार, आय से अधिक संपत्ति मामले में बरी होने के बाद 2015 में वह छठी बार मुख्यमंत्री बनीं।
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